घनघोर अंधेरे में ज़रूरत है अब जलती मशालों की!

दीपोत्सव में दीपावली के दिन दिप-दिप करते दीप अमावस्या में रोशनी बिखेरने का जिस अदम्य साहस से मुकाबला करते हैं। वह देशवासियों को एक गहरा संकेत और प्रेरणा देने का काम करते हैं। कुछ लोग इसे मिथकों से जोड़कर राम की अयोध्या वापसी की खुशी से जोड़ते हैं तो कुछ इसे लक्ष्मी के आगमन की अगवानी की तैयारी मानते हैं। जबकि सच्चाई इतनी ही है कि एक नन्हा दीप हमें जीवन में अंधेरे को दूर करने का साहस देता है। रोशनी जीवन की प्रतीक है।

आज हम अपने जीवन में निरंतर अंधियारों से घिरते चले जा रहे हैं। हमारे जल, जंगल, ज़मीन हवा, पानी सब हमसे छीने जा रहे हैं। सब कुछ कॉरपोरेट के हवाले हो रहा है। प्रकृति प्रदत्त नि: शुल्क उपहार अब पूंजीपतियों की जागीर बनता जा रहा है। कमोबेश यह स्थिति अमूमन चंद देशों को छोड़कर सब जगह की है।

ऐसी स्थिति में राम और लक्ष्मी के मिथकों के सहारे भाग्य भरोसे पड़े रहना अनुचित है। मनुष्य ही है जो इस कायनात में सबसे समझदार प्राणी माना जाता है किंतु आज वह प्रकृति का सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ है।

उसने ही प्रकृति के साथ सबसे अधिक बेरुखी दिखाई है। इसलिए यदि उसे इन घनघोर अंधेरों से निजात पानी है तो इन अंधेरों के लिए गुनहगार लोगों से देश को बचाना होगा।

यहां यह भी स्पष्ट करना ज़रूरी है कि आज इंसानों के बीच हैवानियत बढ़ने का सबब अमीर और ग़रीब के बीच बढ़ती खाई है पशु पक्षी भी यदि इंसान के साथ रहते हैं तो भी उसके प्रेम के अधीन हो जाते हैं किंतु अमीर होने की चाहत ने आज तमाम निजी रिश्तों में भी खटास भर दी है। बड़े पैमाने पर देखें तो दुनिया में आज पूंजीवादी धारा बेगवती है जो समाजवादी विचारधारा को ख़त्म करने के लिए बेताब है। उसने, वियतनाम, इराक, अफ़ग़ानिस्तान, फिलीस्तीन जैसे देशों में लूट के लिए जो तबाही मचाई है वह हम देख चुके हैं और आने वाले कल में हम इसे और बड़े स्तर पर देखेंगे। इससे भले चंद लोग खुशहाल नज़र आएं किंतु बड़ी संख्या इस बात की गवाह है कि वह इन राष्ट्रों के बीच कितने संकटों में है। फासिस्ट और साम्राज्यवादी ताकतें जब तक पनपती रहेंगी। इंसानियत पर ख़तरे मंडराते रहेंगे।

अफसोसनाक तो यह है कि ये ताकतें प्रकृति प्रदत्त उपहारों जिनमें जल ,जंगल, ज़मीन और खनिज सम्पदा है उस पर आधिपत्य जमाने के लिए ही दूसरे देशों पर हमलावर होती रहती हैं। प्राकृतिक संसाधनों पर बपौती जमाना ये अपना अधिकार समझती हैं। आजकल ट्रेंड कुछ बदला है एक तरफ संसाधनों पर क़ब्ज़े का दौर चल रहा है तो दूसरी ओर उत्पादित माल के लिए बाज़ार भी चाहिए। अमेरिका जैसा देश सामयिक हथियारों के उत्पादन में अग्रणी रहा है इसलिए उसको दुनिया में कहीं ना कहीं युद्ध चाहिए ही है। पाकिस्तान और भारत के बीच भी जितने युद्ध हुए हैं उसमें अमेरिकी हथियारों का इस्तेमाल हुआ है।

अब इस होड़ में रुस और चीन भी शामिल हो चुके हैं। अपनी नई टेक्नोलॉजी की बदौलत सामयिक हथियारों के मामले में पिछले दिनों इज़राइल से फिलीस्तीन की मुक्ति के लिए जिन हथियारों का इस्तेमाल किया उससे अमेरिका चौंक गया। यूक्रेन और रुस युद्ध जो लंबे समय से चल रहा खनिज संसाधनों पर कब्ज़ा और हथियार बिक्री के लिए ही है। विचित्र बात यह है कि एक ओर अमरीका युद्ध की दौड़ बढ़ा रहा है दूसरी ओर शांति की बात करता है। सीज़फायर करवाने की बात कर अब शांति और समझौता के लिए डोनाल्ड ट्रम्प को नोबेल पुरस्कार की दरकार थी जबकि अमेरिकी नीतियां युद्धोन्माद की रही हैं। ऐसे युद्ध विभीषिका के समय दुनिया के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह शांति के लिए एकजुट हो।

युद्ध की विभीषिका का दौर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध दुनिया देख चुकी। बड़ी मुश्किल में जब देश अपने अवाम की तरक्की और विकास के रास्ते तलाश रहे थे तब भूमंडलीकरण के बहाने विश्व व्यापार बढ़ाया गया। राष्ट्र के विकास और स्वावलंबन का सपना चकनाचूर हुआ और अब बढ़ते टैरिफ वार ने फिर स्वावलंबन की राह पर ध्यान आकृष्ट किया है। किंतु अब इसकी सफलता संदिग्ध है क्योंकि एक बार विदेशी सस्ते सामान की जगह देशी माल की उपेक्षा को इतनी जल्दी संभाला नहीं जा सकता।

हम भाग्यशाली हैं कि हमारी कृषि  विदेशी हमले से बची हुई है। हालांकि देशीय उद्यमी गौतम अडानी ने मोदी राज में इसे समूल रूप से किसानों के हाथ से छीनने की कोशिश की किंतु किसान एकजुटता से वह कुछेक चीज़ें तक ही फिलहाल सीमित  रह गई। शुक्र है, कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस पर एकाधिकार की कोशिश की। मोदी-ट्रम्प की यारी यदि नहीं टूटती है, तो वो सब अमेरिकी हाथ में पहुंच जाएगा। जो भारत की जीवन रेखा है।

विदित हो दीपोत्सव का सबसे अधिक उल्लास किसानों के आभार मंडल पर ही दिखाई देता है। उनकी ख़रीफ फसल आती है इससे व्यापारी भी खुश होते हैं चूंकि खरीदारी भी बढ़ती है। किसान खुश हैं तो खुशी है। याद कीजिए उस दौर को जब दुनिया भर में मंदी छाई थी कल कारखाने बंद हो रहे थे। बेरोजगारी ने जीना दूभर कर दिया था तब कई मुल्क बर्बाद हो गए थे। तब भारत अपने कृषि उत्पादों की बदौलत ही इसे झेल गया था।

आज दुनिया की नज़र भारत के बड़े बाजार पर केंद्रित है इसलिए चीन जैसा शत्रु राष्ट्र पलक पांवड़े बिछा रहा है। इसे कितना महत्व देना है उस पर सोच विचार कर निर्णय की ज़रूरत है। आवेश में आकर दोस्ती के जुनून में अमेरिका जैसा धोखा ना हो जाए। इससे सावधान रहने की ज़रूरत है।

भारत देश जिसे दुनिया में सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश के रुप में सम्मान मिला हुआ था वह तिरोहित हो गया है। देश में लोकतांत्रिक रास्ते से वोट चोरी कर बनी सरकार पिछले बारह साल से देश के संविधान के साथ छेड़छाड़ कर रही है। वह भारत की धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी छवि पर प्रहार है। जिसका सीधा असर देश में फैल रही नफ़रत और बढ़ती पूंजीपतियों की संख्या से जाना जा सकता है।

मिथकों से विज्ञान के खिलाफ मोर्चा खोलकर शिक्षा को पंगु बनाने की मनुवाद की ओर ले जाने की मुनादी हो चुकी है। स्त्रियों के प्रति जो व्यवहार दिखाई दे रहा है वह संविधान प्रदत्त बराबरी के अधिकार पर काला धब्बा है। स्वास्थ्य, शिक्षा के केन्द्र, तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उद्यम कॉरपोरेट घरानों के नाम किए गए हैं जिससे महंगाई की मार तो पड़ी ही है। बेरोजगारी भी उफान पर पहुंच गई है। आज ना केवल प्रजातंत्र बल्कि देश की युवा पीढ़ी अंधेरे में दम तोड़ने के लिए मज़बूर दिखती है। लोग परेशान हैं किंतु उनमें ईमान अब भी बाकी है। यह बापू का देश है।राम रहीम का देश है।

बुद्ध, महावीर और नानक का देश है। जिसने घने अंधेरे में रास्ता बनाए हैं। नफ़रत को मोहब्बत से जीता है। गरीबों के पक्ष में जो हमेशा खड़े रहे हैं। जब-जब देश मुसीबतों से घिरा है देश को उबारने के लिए किसी न किसी ने जान जोखिम में डालकर प्रतिरोध की मशाल जलाई है। आज राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन के साथ इन तमाम अंधकारों के खिलाफ जो मशाल जलाकर मुहिम प्रारंभ की है वह भविष्य में निश्चित प्रकाश लाएगी।आइए इस बार दीपोत्सव में देश और दुनिया में व्याप्त अंधियारों से लड़ने के लिए नन्हें  दीप से प्रेरणा लेकर मशालें जलाएं। बल्ली सिंह चीमा की ये पंक्तियां हमें ऊर्जा से भरने के लिए काफ़ी हैं।

  ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा जीत लेंगे, लोग मेरे गांव के।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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