दिल्ली में वायु प्रदूषण को खत्म करने के लिए लंबे समय से किया जा रहा कृत्रिम बारिश कराने का दावा अंततः असफल रहा।
इस दौरान आसमान में बादल बने हुए हैं और हवा में धुंए की मात्रा बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। प्रदूषण की मात्रा एक्यूआई में खतरे से ऊपर बनी हुई है। प्रदूषण से फिलहाल कोई राहत मिलती दिखाई नहीं दे रही है।
पिछले, लगभग एक दशक से अक्टूबर-नवम्बर के मध्य, खासकर दीपावली के चंद दिनों पहले से ठंड की हल्की सी दस्तक के साथ ही दिल्ली की हवा खराब होनी शुरू हो जाती है। दीपावली के दिन तक रही-सही कसर दिल्ली और एनसीआर के लोग दीपावली उत्सव मनाते हुए पूरा कर देते हैं। इसके बाद प्रदूषण का अंधेरा और भी गाढ़ा हो जाता है।
यह नवम्बर के मध्य तक ऐसे ही बना रहता है। इस दौरान यदि हवा के बहाव की गति बढ़ जाती है, या थोड़ी बारिश हो जाती है तब थोड़ी राहत जरूर मिल जाती है। लेकिन, प्रदूषण का मानक नवम्बर के बाद अगले दो महीने कोहरा और धुंए के धुंध के साथ प्रदूषण मानक को थोड़ा बेहतर और कई बार तो और भी बदतर बनाये रखता है।
दिसम्बर-जनवरी की बारिश ही, जो अमूमन पश्चिमी विक्षोभ से होती है और अपने साथ हवा का बहाव ले आती है, राहत दे पाती है। हम कह सके हैं कि दिल्ली में अक्टूबर के मध्य से शुरू होने वाला प्रदूषण सिर्फ एक पखवारे तक नहीं रहता है, यह कम से कम अगले दो महीनों तक बना रहता है।
इस साल दिल्ली में बहुप्रतिक्षित कृत्रिम बारिश का, जो पिछले समय से कई बार टलते हुए आ रहा था, कराने का निर्णय सामने आया और दावा किया गया कि दीपावली के बाद दिल्ली में बढ़ गये प्रदूषण को कम करने के लिए इसका प्रयोग किया जाएगा।
27 अक्टूबर, 2025 को आईआईटी, कानपुर की मदद से बारिश के लिए जरूरी रसायनों को बादलों के ऊपर डाला गया जिससे बादलों में संघनन की प्रक्रिया तेज हो सके और बारिश कराई जा सके। इस पर दोनों तरह के दावे आये।
दिल्ली सरकार की ओर से ‘कुछ बारिश होने’ के बारे में बताया गया और परीक्षण को संतोषजनक बताया गया। लेकिन, जहां बारिश होनी थी, वहां ऐसी सफलता के प्रत्यक्षदर्शी नहीं मिले। बारिश हो, और लोगों को पता न चले, ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन, सरकारी हिसाब है, वे इसे संतोषजनक मान रहे थे जबकि दिल्ली की हवा और भी गहरे रंग में बदलती गई और प्रदूषण सूचकांक इसे संतोषजनक बताने की बजाय खतरनाक और अत्यंत खराब की स्थिति की ही बताते रहे।
खतरनाक माने जाने वाला 2.5पीएम पार्टिकल दिल्ली की हवा में सामान्य से 20 से 30 गुना तक बढ़ा हुआ है और यह बहुत आसानी से हमारी सांस से होते हुए फेफड़े में घुसता है।
सरकारी दावों में भी यह साफ था कि जितनी बारिश होने की उम्मीद थी उतनी इस कृत्रिम तरीके से हुई नहीं। इसके पीछे एक बड़ा कारण हवा में नमी कम होना बताया गया। इस बारिश के लिए जिन रसायनों का प्रयोग किया जाता है उसमें सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड का प्रयोग किया गया।
यहां यह बात रेखांकित करने वाली है कि जब यह क्लाउड सीडींग की जा रही थी तब चक्रवाती तूफान से दिल्ली की हवा में नमी की मात्रा बढ़ी थी। इसके बावजूद बारिश नहीं हुई। संभवतः दिल्ली के ऊपर छाये बादलों का मिजाज को समझने में कहीं दिक्कत हुई है।
एक बड़ा कारण यह भी माना जा रहा है कि दिल्ली में बादलों की ऊंचाई लगभग 10 हजार फिट के आसपास होती है जबकि कृत्रिम बारिश के लिए इसकी ऊंचाई 5 हजार फिट तक होनी चाहिए। यदि हम इन तकनीकी बातों को छोड़ भी दें तब भी यह साफ है कि इस बारिश को लेकर बादलों के मिजाज को समझने में दिक्कत रह गई। लेकिन, जिन रसायनों का प्रयोग बादलों पर हुआ है वे बादलों की बारिश के साथ घुलकर नीचे आने पर आसानी से जीवों के शरीर में घुसते हैं और स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं।
इन सब बातों के साथ, एक और महत्वपूर्ण बात कृत्रिम बारिश से प्रदूषण कम या खत्म करने का दावा है। क्या इससे प्रदूषण पर असर पड़ेगा? ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर सीमित और बेहद कम अवधि तक ही रह सकता है। इससे प्रदूषण जैसी समस्या का हल संभव नहीं है।
दिल्ली की हवा में जो रसायन तैरते हैं उसमें कुछ ही हैं जो हवा के साथ घुल सकते हैं। दिल्ली की हवा में उड़ने वाली धूल में सीलिका और सल्फेट हवा की नमी को अवशोषित करते हुए हमारे सांस लेने के स्तर पर बने रहते हैं। प्रदूषण के संदर्भ में और भी कई ऐसे रसायनिक कण हैं जो बारिश के चंद दिनों बाद ही तेजी से हवा में तैरने लगते हैं।
दिल्ली की हवा को साफ करने में बहुत अहम भूमिका हवा के बहाव की होती है। हालांकि इससे दिल्ली वालों को भले ही राहत मिल जाए, लेकिन यह प्रदूषण अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
ऐसा नहीं है कि दिल्ली में कृत्रिम बारिश का यह पहला प्रयास था। इसका इतिहास 1957 से शुरू होता है। इसे 1972 में दुहराया गया। दिल्ली में सन् 2000 के बाद से इस दिशा में सोचने की प्रक्रिया शुरू हुई जिसे व्यवहार में इस अक्टूबर में लाया गया जिसके परिणाम सफलता की श्रेणी में फिलहाल नहीं आ पाया है।
दिल्ली में कृत्रिम बारिश से संभव है कि चंद दिनों की राहत मिल जाए लेकिन प्रदूषण से राहत की संभावना नहीं दिखती है। दिल्ली में पर्यावरण का संकट सिर्फ हवा तक सीमित नहीं है। यह यहां के पानी के साथ भी जुड़ा हुआ है। यहां के विशाल नाले उद्योगिक और घरेलू कचरे को यमुना में ले जाकर गिराते हैं। इन्हें साफ करने की जितनी व्यवस्था करने की जरूरत है, वह नदारद है।
इसी तरह हवा में टनों गैस उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत यहां के रहन-सहने से पैदा हो रही है, खासकर वाहनों का प्रयोग एक बड़ी भूमिका निभाता है।
इसी तरह एनसीआर के उद्योग इसमें अहम हिस्सेदारी करते हैं। जब तक प्रदूषण को जन्म देने वाली व्यवस्था का तार्किक हल नहीं होता, दिल्ली का प्रदूषण खत्म होने की ओर नहीं जा सकता। यह आने वाले दिनों में और भी दमघोंटू होता जाएगा। हवा का प्रदूषण ठीक करने के लिए कृत्रिम बारिश ठीक वैसा ही प्रयास था जैसा यमुना के किनारे वासुदेव घाट बनाकर किया गया।