क्या चौखुटिया के स्वास्थ्य मिशन के आंदोलन से उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों की हालत सुधार पाएगी?
पिछले करीब एक महीने से चौखुटिया में सरकारी अस्पताल की बदहाली को लेकर चल रहे जनता के आंदोलन को देखते हुए यह सवाल बहुत ज़रूरी हो गया है।
इस बीच और आंदोलन से पहले अखबारों और सोशल मीडिया में उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों और पूरे हैल्थ सिस्टम की बुरी हालत के बहुत से किस्से बाहर आए हैं। जिनमें प्रसव सेवा, एक्सीडेंट, ट्रामा और आकस्मिक चिकित्सा को लेकर बहुत सी शिकायतें थीं। साथ ही यह बार बार कहा गया कि पहाड़ के छोटे बड़े अस्पताल रेफेरल हाथी सेन्टर बने हुए हैं।
यह रिपोर्ट अक्सर आती रहती है कि आमजन और गरीब लोगों के लिए बीमार अस्पताल हैं और वीआईपी के लिए महंगे निजी अस्पताल।
कुछ दिन पहले एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बीमार होने पर जब उनको राजधानी के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया तो लोगों ने उत्तराखंड की पूरी चिकित्सा व्यवस्था को सवालों के घेरे में ले लिया था।
अक्टूबर के पहले हफ्ते में जिस समय आंदोलन चल रहा था। उसी दौरान मेरी तबियत खराब हो गई। पिछले साल कैंसर के इलाज में, महीनों के इलाज के बीच मेरे साथ ऐसे इमरजेंसी वाले हालात होते जा रहे थे।
शाम के करीब आठ बजे सीने में दर्द की शिकायत हुई तो मुझे घर वाले फौरन बेस हस्पताल हल्द्वानी ले गए, वहां इमरजेंसी में जब हम पहुंचे तो इमरजेंसी भरी हुई थी।
वहां देखा तो लगा कि इमरजेंसी में कोई सीनियर या रेग्युलर डाक्टर नहीं हैं, तीन-चार मेडीकल कालेज के स्टूडेंट्स लग रहे थे। जो भी हों बहुत जल्द मेरा नंबर आ गया और मुझे अटेंड कर लिया गया। ब्लड प्रेशर नापा गया जो सामान्य ही था, मुझे प्राइमरी दवा और इंजेक्शन दे दिया गया। कुछ देर बाद मेरा दर्द कम हो गया।
मैं उम्मीद कर रहा था कि अब मेरा आगे इन्वेस्टीगेशन होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कहा गया कि मुझे ईसीजी कराने के लिए शहर के दूसरे अस्पताल सुशीला तिवारी अस्पताल जाना पड़ेगा।
जबकि बेस अस्पताल अस्पताल में 10 बेड का आधुनिक आईसीयू पिछले कुछ सालों से बनकर बंद पड़ा हुआ है। बताते हैं कि स्टाफ/ज़रूरी सुविधाएं न होने से यह आईसीयू चलाया नहीं जा सकता।
तब मुझे महसूस हुआ कि उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों में नेता और अफसर अपना इलाज कराने क्यों नहीं जाते, और क्यों उनके लिए सरकारी स्तर पर बड़े प्राइवेट अस्पतालों और एम्स में विशेष सुविधा क्यों कराई जाती है।
तो मजबूरी में मुझे लेकर मेरे परिवार वाले सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचे। जबकि मैं पिछले साल सुशीला तिवारी अस्पताल में भर्ती रहकर वहां की बदहाली देख चुका था। जब हम वहां पहुंचे तो इमरजेंसी में भी बड़ी भीड़ दिखी । वहां भी जूनियर डाक्टर दिखाई दिए। कोई सीनियर या रेग्युलर डाक्टर दिखाई नहीं दे रहा था।
मौजूद जूनियर डाक्टर ने मेरे पर्चे देखे और कैंसर डायबिटीज और हार्ट के इलाज की जानकारी ली, और फिर बेस में हुए इलाज की जानकारी ली। उन्हें मुझे फौरन दवा वगैरह देने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई। और आगे जांच के लिए मुझे एक बेड पर लिटा दिया जो उसी वक्त खाली हुआ था। मैंने पूछा तो पता लगा कि ईसीजी होना है, जिसके लिए मशीन का इंतजार है।
जो एक मशीन यहां है वो अभी इमरजेंसी वार्ड में गई है। मुझे अजीब लगा क्योंकि मैंने यहां कमसे कम दो मशीनें देखी थीं फिर इमरजेंसी के चारों बैड पर भी इमरजेंसी मशीन मानीटर के साथ लगी देखी थी।
खैर मैं इंतज़ार करने लगा, तभी बाहर से स्ट्रेचर पर एक बेहोश मरीज़ को लाया गया। कोई बेड खाली नहीं था तो। उसका स्ट्रेचर ठीक मेरे बगल की खाली जगह में लगा दिया गया।
मैं इमरजेंसी में तो था, छाती में हल्का दर्द भी बना हुआ था, लेकिन मैं होशोहवास में था।
मौजूदा स्टाफ उस मरीज़ की जांच में जुट गया पता लगा कि उसका ब्लड शुगर लेवल बहुत लो यानि मरताऊ हालत में पहुंच गया है। मरीज़ को फौरन ग्लूकोज़ लगाकर उसका इलाज शुरू कर दिया गया।
मैं यह सब देख रहा था मैंने मरीज़ के साथ आए तीमारदार से पूछा कहां से आए हो मरीज़ कहां का है, जवाब मिला, चौखुटिया से।
मैं सन्न रह गया। चौखुटिया में उन दिनों वहां अस्पतालों की बद्तर हालत के ख़िलाफ़ मूवमेंट चल रहा था। और वो मरीज़ उत्तराखंड की बद्तर हैल्थ सिस्टम का ज़िंदा सबूत दे रहा था।
वो मरीज़ करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर दूसरे ज़िले से हल्द्वानी लाया गया था। जबकि रास्ते में करीब आधा दर्जन सरकारी अस्पताल पड़े होंगे।
यह इलाका उत्तराखंड के करीब करीब बीच में पड़ता है। वहां से उत्तराखंड की गर्मियों की राजधानी गैरसैंण करीब चालीस किलोमीटर दूर है।
तभी मुझे वो सारी घटनाएं और खबरें याद आ गईं जो पिछले कुछ वक्त से उत्तराखंड के बदहाल हैल्थ सैक्टर के बारे में पढ़ी थीं। और देखी भी थी।
बहुत से पत्रकार जिनमें मेरे युवा पत्रकार उत्तराखंड की बदहाली पर लिखते रहते हैं।
उत्तराखंड के दूरवर्ती इलाकों की बात छोड़िए राज्य के हर शहरों कस्बो में हर सरकारी अस्पताल बदहाल है।
ऐसा ही एक इलाका चौखुटिया है जो कुमाऊं में बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा रूट पर पुराना शहर है इसी के हिस्से पर गनाई है, जहां पूर्वी भारत के पैदल तीर्थयात्री पड़ाव डालते थे जिन्हें जात्री कहा जाता था और जो कर्ण प्रयाग होकर बद्रीनाथ जाया करते थे।
यह स्थान उत्तराखंड में कितना महत्वपूर्ण है यह इसी से पता चलता है कि यहीं से गढ़वाल के हिस्से कुमाऊं होकर गढ़वाल के गैरसैंण, कर्णप्राग और बद्रीनाथ से जुड़ते हैं।
यहां पर उत्तराखंड सरकार ने स्वास्थ्य सेवा की घोर अनदेखी की हुई है।
ग्रामीण चिकित्सा का पूर्ववती ढांचा योजनाकारों ने आबादी के हिसाब से बनाया था, 20-50 हजार से लेकर 1 लाख से 5 लाख की आबादी के लिए अलग-अलग माड्यूल बनाए जो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर जिला स्तर तक के लिए निर्धारित थे। जिसमें चौबीस घंटे और इमरजेंसी चिकित्सा सेवा के लिए चिकित्सक से लेकर तकनीशियन तक की व्यवस्था बनाई गई थी।
समय रहते आवश्यकता बढ़ी, आबादी बढ़ी उत्तर प्रदेश के समय लापरवाही बढ़ी तो बहुत से प्राथमिक, सामुदायिक उपजिला और जिला अस्पतालों की या तो बिल्डिंग पुरानी और अपर्याप्त हो गईं या खराब हो गईं। जो बची थी उत्तराखंड के लोगों की ज़रूरत के लिए काफ़ी नहीं है।
उत्तराखंड बनने से पहले यही शिकायत थी कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर जिला अस्पतालों तक में अस्पतालों में न तो डाक्टर मिलते था और न इलाज मिलता था। यानि स्थिति यह थी कि पहाड़ के करीब करीब सभी क्षेत्रों में चिकित्सा का भौतिक ढांचा तो था लेकिन ना तो सहायक सुविधाएं थी और ना ही मानव संसाधन उपलब्ध थे।
2000 में राज्य बनने के बाद बहुत “क़ाबिल” लोग सरकार में आए और लेकिन उन क़ाबिल लोगों ने इस मसले पर ध्यान नहीं दिया कि उत्तराखंड के दूरवर्ती इलाकों की इलाज की ज़रूरतों को कैसे पूरा किया जाएगा।
सब कुछ एडहाक या तदर्थ आधार पर चलाया जाने लगा। उस जगह डाक्टर नहीं है, तो डाक्टर भेज दो वहां एक्स-रे मशीन की ज़रूरत है वहां वो मशीन भेज दो।
2001 में नारायण दत्त तिवारी की सरकार सत्ता में आई तो उनके सामने बड़ा मसला पढ़े लिखे बेरोजगारों को रोजगार देकर पलायन रोकना था। उनके सामने ही बड़े बांधों का मसला भी दरपेश आया। आंदोलनकारियो की पैरवी के अभाव में स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा और कृषि के मामले खामोश रहे।
उत्तराखंड के आंदोलकारियों ने इस स्थिति को समझने की कोई कोशिश नहीं कि की उत्तराखंड के सबसे निचले स्तर पर गुजर बसर करने वाले सबसे कमज़ोर लोगों की प्राथमिकताएं क्या होती हैं।
आंदोलनकारियों ने अपने आपको पहले उत्तराखंड का नाम उत्तरांचल से उत्तराखंड करने पर, फिर सारा जोर जिले और ब्लाक बनाने पर लगाया फिर गैरसैंण को राजधानी बनाने का झंडा बुलंद रखा, राज्य की मूलभूत समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रेशर ग्रुप बनाने या राजनैतिक दबाव बनाने के लिए कोई सफल प्रयास नहीं किए। राजनैतिक दलों की नीति व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में बदल गई।
आंदोलनकारी आपस में ही दो दो हाथ करते रहे, तो दूसरी तरफ बिना राज्य की दशा को समझे राजनैतिक पार्टियों के सरकारी घोड़े दिशा हीन होकर दौड़ते रहे, बजट बनता रहा, फील्ड में आधा अधूरा लगता रहा, सत्ताधारी राजनैतिक पार्टियों के नेता चमकते रहे।
एक तरफ लोअर डिविजन बाबू क्लर्क और सुपरवाइजर कैडर वाले छोटे साहब धीरे धीरे जिले, मण्डल और राज्य के अफसर डायरेक्टर बनते रहे। तो दूसरी तरफ ग्रामपंचायत और नगर पंचायत में हार जाने वाले नेता राज्यस्तर के सम्मानित नेता बनकर मुख्यमंत्री की लाइन में लगते रहे,।
सरकारी ठेकेदार भी यथायोग पुरस्कार पा गए पहले गांव में “खडंजा” और “लैट्रिन” बनाते थे अब पेट्टी/पट्टीदार बनके हाइवे बनाते हैं और शहरों में माल बनाते कमाते हैं।
इधर उत्तराखंड की दुर्दशा गम्भीर होती गई।
अब ज़रा एक समस्या को समझा जाए। इसके साथ ही इस सवाल का जवाब खोजा जाए कि क्या चौखुटिया के सामुदायिक अस्पताल को जिला स्तरीय करने की घोषणा से समस्या हल हो जाएगी?
चौखुटिया के लिए स्वास्थ्य मिशन की मुहिम चलाने वाले आंदोलनकारियों की मांग और लगातार चल रहे आंदोलन को देखकर लगता है कि जनता को सरकार की इस घोषणा के अमल पर संदेह है। क्योंकि यह साफ हो गया है कि सामुदायिक अस्पताल अगर मानकों के अनुसार चलाया जाता तो जनता को आंदोलन करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
चौखुटिया एक उदाहरण है नमूना है उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का, वैसे तो सुदूर इलाकों में हर सरकारी व्यवस्था भगवान भरोसे है लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था तो खुद मरीज़ बनी हुई है।
अक्टूबर के तीसरे हफ्ते उत्तराखंड के एक पिछड़े इलाके चौखुटिया में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली पर बहुत बड़ा विरोध प्रदर्शन आरम्भ हुआ। यह स्थान उत्तराखंड के केन्द्रीय इलाके में है, और यहां से गैरसैंण 35 किलोमीटर है।
स्वास्थ्य व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग को लेकर विभिन्न संगठनों, जनप्रतिनिधियों और आम जनता ने पहले आंदोलन स्थल में धरना दिया और सभा की. स्वास्थ्य केंद्र के उच्चीकरण, विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति सहित अल्ट्रासाउंड सहित अन्य संसाधनों की मांग को लेकर आक्रोश रैली निकाली।
जिसमें हजारों लोग शामिल हुए हैं। यह विरोध प्रदर्शन डॉक्टरों की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता और अस्पताल की बदहाली के विरोध में किया गया था। इस प्रदर्शन में स्थानीय लोग, महिलाएंऔर युवा शामिल हुए हैं, जिन्होंने सरकार से स्वास्थ्य व्यवस्था में तुरंत सुधार की मांग की ।
राजनैतिक दलों ने मतभेद भुलाकर इसमें भागीदारी की। कुछ लोगों ने इसमें अपना दूसरा एजेंडा फिट करना चाहा लेकिन जनता ने ऐसे लोगों की नहीं चलने दी। इस रैली की मीडिया रिपोर्ट को पढ़कर यह भी पता लगा कि इस आंदोलन को नफ़रती तत्वों ने भटकाने की भी कोशिश की, मीडिया रिपोर्ट में भी ऐसे लोगों को कोई अटेंशन नहीं मिला।
इस रैली की गूंज राजधानी दिल्ली और देहरादून में पहुंची या पहुंचाई गई, क्योंकि रैली का व्यापक प्रभाव राज्य के पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति में पड़ने का खतरा सत्ता दल को हो गया था। तो लोगों का ग़ुस्सा ख़त्म करने के लिए आनन-फानन में चौखुटिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीएचसी को अपग्रेड करके उसे उपजिला अस्पताल के समकक्ष करने का सरकारी आदेश हो गया।
कुछ लोगों ने इसे आंदोलन की सफलता बताया तो सत्ता दल ने सरकारी आदेश पर संतोष करते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि इससे चौखुटिया की स्वास्थ्य समस्या हल हो जाएगी।
लेकिन आंदोलनकारियों का मानना था, कत्तई नहीं,…..चौखुटिया में सामुदायिक अस्पताल का अपग्रेडेशन करके उप जिला स्तर का करने से समस्या हल नहीं होगी।
क्योंकि सामुदायिक अस्पताल अगर राष्ट्रीय मानक के अनुसार चलाया जाता रहा होता तो वहां समस्या ही नहीं आती।
पिछले कुछ सालों की घटनाओं के आधार पर आंदोलनकारियों का मानना था कि चौखुटिया का अस्पताल सरकारी लापरवाही का जीता जागता सबूत है। राज्य में कमोबेश सभी प्राथमिक/सामुदायिक/उपजिला और जिला अस्पताल एक ही समस्या से जूझ रहे हैं वो हैं स्वास्थ्य के राष्ट्रीय मानको का पालन न करना।
यहां पहले एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चला आ रहा था। उत्तराखंड बनने के बाद 2005 में यूपीए/ कांग्रेस की केन्द्रीय सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अन्तर्गत 2005-2006 में इसे कवर किया गया था, जिसमें चार छः बैड की व्यवस्था की गई थी। बाद में यह अस्पताल लापरवाही का शिकार होता चला गया।
चौखुटिया सीएचसी में अगर ‘भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों’ का पालन किया गया होता तो आज वहां कम से कम चार विशेषज्ञ डॉक्टर, एक जनरल ड्यूटी मेडिकल ऑफ़िसर, 20 बेड के लिए 15-20 नर्स व सहायक स्टाफ होता। 24×7 आपातकालीन सेवाएँ मिलती, हर समय ऐंबुलेंस तैयार रहती, विभिन्न जांच की मशीनों और लैब के साथ, लैब तकनीशियन, फार्मासिस्ट, रेडियोग्राफर, और अन्य सहायक कर्मचारी तैनात होते ।
चौखुटिया ब्लाक में स्वास्थ्य सेवाओं की कुकरगति बटलोई में दाल का नमूना है। पूरे चौखुटिया ब्लाक की सेवाओं को देखें तो सरकार की नाअहली और नाकामी साफ दिखाई देगी।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि चौखुटिया ब्लाक के कुछ इलाके मैदान के शहरी अस्पतालों से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर पड़ते हैं। ऐसा पहाड़ के बहुत से इलाकों में होता है जहां जिला अस्पताल भी, 100-150 किलोमीटर दूर है इसलिए निचले स्तर पर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की मज़बूती बहुत ज़रूरी थी, लेकिन पूरे पहाड़ की तरह या यों कहिए, चौखुटिया की तरह पूरे पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं में घोर लापरवाही लम्बे समय से चली आ रही है।
अगर चौखुटिया में फील्ड लेबल पर मौजूद इकाइयाओं की सरकारी सेवाओं को देखा जाए तो पता लगेगा कि कागज़ में सुनहरी तस्वीर है पर फील्ड में काली बनी पड़ी है।
चौखुटिया विकासखण्ड के 3 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, में 3 डाक्टर + 12 नर्स/सपोर्ट स्टाफ होना चाहिए, लेकिन फील्ड में 1 या 2 डाक्टर हैं कभी वो भी नहीं रहते, 5–6 नर्स और स्टाफ है, तीनों सेन्टरों में कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नही हैं, जब डाक्टर ही नहीं तो ओपीडी क्या चलती होगी , दवा सप्लाई अनियमित है।
चौखुटिया एक नमूना है ऐसा पहाड़ों में होता ही रहता है, कभी कभी (महीनों तक) प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सहायक स्टाफ के भरोसे चलते हैं, ऐसी खबरें भी अक्सर छपती हैं कि कोई अस्पताल वार्ड ब्वाय के सहारे चलता है, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों/अस्पतालों में चौबीस घंटे सेवा या आपातकाल सेवा और रोगियों की भर्ती जैसी सुविधाओं की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
चौखुटिया में एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 6 डाक्टर + 30 नर्स वगैरह का स्टाफ होना चाहिए था जो कभी नहीं रहा। कभी भी 2–3 डाक्टर से ज्यादा नहीं रहे , 15–18 स्टाफ रहे कभी उससे भी कम अस्पताल में कभी भी भरोसेमंद आईसीयू /ओटी सुविधाएँ नहीं रहीं, जो भी था सब आधा अधूरा । जब सर्जन और महिला चिकित्सक नहीं होगी तो हर समय यानि हफ्ते में सातों दिन चौबीस घंटे जिसे तकनीकी भाषा में 24×7 लिखा जाता है, आपातकालीन सेवा या प्रसव सेवा मिल जाएं ऐसा कैसे हो सकता था।
इसी तरह एम्बूलैंस सेवा औरआपातकालीन ट्रॉमा सेवा नहीं थी। एम्बूलैंस न मिलने से एक रोगी की मौत ने चौखुटिया के लोगों के गुस्से में घी डालने का काम किया था।
पहाड़ के सरकारी अस्पतालों (सीएससी से लेकर डीएच तक) में अल्ट्रासाउंड साउंड, एक्स-रे मशीन, ईसीजी मशीन वगैरह के वर्किंग कंडीशन में होने की कल्पना करना बेकार है। या तो मशीनें नहीं हैं अगर हैं तो या तो बंद पड़ी हैं खराब है और या फिर उसके आपरेटर नहीं है।
यह बताना बड़ा दिलचस्प होगा कि चौखुटिया के अस्पताल में चार साल पहले अल्ट्रासाउंड मशीन पहुंची थी लेकिन आपरेटर नहीं पहुंचा था। (मशीनें क्यों जल्दी खरीद ली जाती हैं, बिल्डिंग क्यों बन जाती है इसका एक गणित है जो सरकारी अमले मंत्री, संत्री ,ठेकेदारों को बख़ूबी पता है) चौखुटिया के लोगों ने जब अल्ट्रासाउंड के आपरेटर के लिए मांग उठाई तो सरकार ने ये किस्सा खत्म करते हुए अल्ट्रासाउंड मशीन ही अस्पताल से उठवा ली थी। चौखुटिया के नमूने को देखते हुए सीटी/एमआरआई मशीनों का पीएचसी/सीएचसी में होना कल्पना से परे है।
चौखुटिया का अस्पताल सुविधाएं और विशेषज्ञ डॉक्टर न होने से रेफेरल सेन्टर बनके रह गया था।
कुल मिलाकर डाक्टर और आवश्यक सुविधाएं न होने के कारण मरीजों को 50-60 किलोमीटर दूर रानीखेत में निजी या सरकारी अस्पताल में जाना पड़ता है या फिर 150 किलोमीटर दूर रामनगर काशीपुर हल्द्वानी के सरकारी या निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है।
अब अगर लोग यह सोचते हैं कि चौखुटिया के सामुदायिक अस्पताल को एक सरकारी आदेश से अपग्रेड करके अस्पताल में इलाज बढ़िया मिलने लगेगा तो यह ख़्वाब हक़ीक़त में बदलने वाला नहीं है इसके लिए सरकारी/राजधानी स्तर पर नीतिगत बदलाव की ज़रूरत है।
कुल मिलाकर चौखुटिया का सरकारी अस्पताल बिना राष्ट्रीय मानको के ज़बरदस्ती चलाया जा रहा था। यही नियति पहाड़ के हर अस्पताल की मानी जा सकती है।
डॉक्टरों की कमी, भर्ती में देरी, पहाड़ी क्षेत्र में कार्य करने की अनिच्छा, मेडिकल उपकरणो की अनुपलब्धता, बजट की कमी, पुरानी मशीनों का रखरखाव नहीं, आपातकालीन ट्रॉमा सुविधा नहीं, ट्रॉमा सेंटर का कागज़ी अस्तित्व, (फील्ड में संचालन नहीं) प्रशासनिक देरी, और जवाबदेही की कमी, स्वास्थ्य अधिकारियों और ब्लॉक प्रशासन का सही समन्वय न होना। चौखुटिया सहित पूरे पहाड़ के अस्पतालों को सफेद हाथी बनाए हुए हैं।
कुल मिलाकर चौखुटिया विकासखण्ड में डाक्टरों/विशेषज्ञ डॉक्टरों की 60-70 प्रतिशत कमी थी/है 25-30 डाक्टरों की आवश्यकता के सापेक्ष 7-10 डाक्टरो से काम चलाया जा रहा था। सपोर्टिंग स्टाफ भी आधा था। स्टाफ की कमी से सामान्य या आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की वास्तविक स्थिति यह थी कि आईसीयू/ओटी का या तो सीमित संचालन हो रहा था/ या फिर अकुशल संचालन करने की मजबूरी थी।
चिकित्सा के लिए ज़रूरी अल्ट्रासाउंड, सीटी, एमआरआई मशीनें अनुपलब्ध नहीं थी।
एम्बूलैंस जो थी वो या तो ख़राब रहती थी या फिर अक्सर ईंधन की कमी का रोना रोया जाता था।
इसीलिए गंभीर मरीज हल्द्वानी, रामनगर काशीपुर, बरेली, देहरादून और दिल्ली जाने को मजबूर थे।
इस हालत में जनता की प्रमुख मांगें जायज थी कि, आवश्यकतानुसार विशेषज्ञ डॉक्टरों की तत्काल तैनाती (सर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक, गायनाकौलोजिस्ट ) हो ।सपोर्टिंग स्टाफ खासकर मशीनें चलाने वाला पूरा हो। 24×7 ट्रॉमा और आपातकालीन सेवाएँ मिलनी चाहिए। पुराने उपकरणों और मेडिकल मशीनरी का अपडेट होना चाहिए।
एम्बुलेंस और आपातकालीन हेलिकॉप्टर सेवाएँ फील्ड में उपलब्ध कराई जाएं। दवाओं और अन्य मेडिकल सप्लाई की नियमित उपलब्धता होनी चाहिए। एक और ज़रूरी मांग स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों की तैनाती की भी थी क्योंकि बाहरी कर्मचारी अक्सर भागने की कोशिश में लगे रहते हैं।
अगर पूरे उत्तराखंड के अस्पतालों की पड़ताल की जाए तो पता लगेगा कि चौखुटिया के अस्पताल की ही दुर्दशा नहीं है बल्कि सारे अस्पताल गम्भीर बीमारी से लम्बे समय से पीड़ित हैं।
डॉक्टरों की कमी है, समय से भर्ती नहीं होती या भर्ती में देरी होती है, यहां यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि डाक्टरों का चयन कैसे होता है जो डाक्टर पहाड़ी क्षेत्र में कार्य करने की अनिच्छा दिखाते हुए नौकरी छोड़ देते हैं। अगर वो अनिच्छुक हैं तो सेवा शर्तें लाभ वगैरह क्यों नहीं सुधारे जाते।
मेडिकल उपकरणों की कमी तो ग्रामीण क्या बड़े शहरो के अस्पतालों में यहां तक मेडीकल कालेजों तक में भी है। पुरानी मशीनों का रखरखाव नहीं है मरम्मत का कोई समयबद्ध तरीका अभी तक काबिल सरकारी मशीनरी नहीं निकाल सकी है।
आपातकालीन ट्रॉमा सुविधा का ड्रामा होता है ज़्यादातर ट्रॉमा सेंटर या कागज़ी हैं या संचालन के क़ाबिल नहीं है। अस्पताल के किसी निर्णय में प्रशासनिक देरी की जवाबदेही तो कहीं से कहीं तक नहीं है।
इन समस्याओं का सबसे बड़ा कारण शासन स्तर पर सोच का अभाव है।
स्वास्थ्य के परम्परागत ढांचे में सबसे बड़ा दख़ल या परिवर्तन केन्द्र की यूपीए की सरकार ने 2005 में किया जब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन आरंभ हुआ और भारी केन्द्रीय बजट से अस्पतलों के भवनों से लेकर एम्बुलेंस सेवाओं तक का प्रावधान किया गया था।
तब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी बड़ी जोशो ख़रोश से मिशन आरम्भ हुआ तो लगा कि अब पहाड़ में सरकारी अस्पताल कुछ अच्छा इलाज कर सकेंगे, 108 एम्बूलैंस और खुशियों की सवारी जैसी एम्बुलेंस सेवाएं आरम्भ हुई, नए अस्पताल और पुराने अस्पताल खुलने सुधरने की प्लानिंग हुईं, यूपीए सरकार की यह भी प्लानिंग थी कि हर जिला अस्पताल मेडीकल कॉलेज बने या उसमें वो सभी सुविधाएं हों।
लेकिन 2016 के बाद जो राष्ट्रवादी सरकार आई उसकी प्राथमिकताएं बदली हुई थीं, जनता के लाभ के लिए चलाईं गई हर स्कीम को शक से देखना और सरकारी स्कीमों पर चौकड़ी मारना ही एकमात्र काम रह गया। बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बजट को ठिकाने लगाने के लिए राज्य सरकार ने बिल्डिंग तो बना लीं लेकिन उनमें झाड़ियां उगने तक इलाज की सुविधाएं नहीं मिल पाईं।
एक मूल सवाल था कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और शहरी स्वास्थ्य मिशन जैसा या उसको पहाड़ के अनुकूल बनाने का प्लान उत्तराखंड में क्यों नहीं बनाया गया। इसके लिए उत्तराखंड की सरकारों और राजनैतिक दलों के साथ साथ उत्तराखंड राज्य के हितैषी, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और राज्य के आंदोलनकारी भी जिम्मेदार हैं।
राजनैतिक दलों उसके कार्यकत्ताओं की भूमिका का विश्लेषण किया जाए तो पता लगेगा, कि एक खास विचारधारा से प्रभावित राजनैतिक दल और उसकी सरकार की प्राथमिकता प्रचार से सत्ता पर पकड़ बनाए रखना है। जिसके लिए तमाम तरह के टोटम और टोटके अपनाए जा रहे हैं।
यदि नहीं तो सवाल एकदम सीधा है कि स्वास्थ्य सेवाएं घोषित राष्ट्रीय मानकों के अनुसार क्यों नहीं चलाई गई। होना तो यह चाहिए था सरकार कुछ नया सोचती कुछ नया करती, लेकिन सरकार तो बहुसंख्यक जनता को मूर्ख बनाने में लगी हुई है। राष्ट्रवादी राज्य सरकार की सोच सकारात्मक होती तो सालाना बजट में स्वास्थ्य का बजट बढ़ाती। जो अभी तक 6 प्रतिशत के आसपास (नीचे) अटका हुआ है। आदर्श स्थिति तो 8 प्रतिशत के स्वास्थ्य बजट की मानी जाती है, सरकार ने यह क्यों नहीं किया?
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी का रोना रोने वाली सरकार चाहती तो अपने यहां पीजी कोर्स की फीस में कमी करके डाक्टरों से राज्य में सेवा का अनुबंध करवाकर डाक्टरों की कमी पूरी कर लेती। यहां तो स्थिति यह है कि पांच साल सरकारी फीस में पढ़ने वाले डाक्टर सेवा अनुबंध तोड़कर रफूचक्कर हो जाते हैं और सरकार काग़ज़ी घोड़े दौड़ाती रहती है।
स्थिति यह है कि चौखुटिया के अस्पताल की दशा सुधारने के लिए जनता का अभी भी आंदोलन चल रहा है। सरकारी आदेश से अपग्रेड हुए अस्पताल की घोषणा से आंदोलन बंद नहीं हुआ। क्योंकि लोग जानते हैं कि सरकार की रीति नीति और नीयत ठीक होती तो चौखुटिया का सीएचसी सही काम कर रहा होता और लोगों को आंदोलन करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
उत्तराखंड के मेडीकल कालेजों से निकलते डाक्टर/विशेषज्ञ और सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी की विडंबना
उत्तराखंड सरकार अपने राजकीय अस्पतालों और मेडीकल कालेजों में डाक्टरों की कमी का रोना रोती रहती है।
ऐसा माना जाता है कि राज्य में जितने डाक्टरों की ज़रूरत है, या जितने पद स्वीकृत हैं उसके सापेक्ष 60 प्रतिशत से कम पद भरे हुए हैं। विशेषज्ञ डाक्टरों के मामले कुछ जिलों की स्थिति चिंताजनक है,
उदाहरण के लिए अल्मोड़ा में स्वीकृत 127 पदों के विपरीत 49 विशेषज्ञ डाक्टर कार्यरत हैं।
पौड़ी में विशेषज्ञ डाक्टरों के 152 पद स्वीकृत है जबकि 42 कार्यरत हैं इसी तरह हरिद्वार में विशेषज्ञ डाक्टरों के 105 पद है लेकिन सिर्फ 40 विशेषज्ञ डाक्टर कार्यरत हैं, जब हरिद्वार जैसे सुविधाजनक स्थान में विशेषज्ञ डाक्टरों की इतनी कमी है तो दूरवर्ती इलाकों की क।या हालत होगी इसकी कल्पना की जा सकती है।
वैसे, राज्य में आधा दर्जन मेडीकल कालेजों से हर साल 822 डाक्टर बनके निकलते हैं, अगर केन्द्र सरकार के आधीन एम्स ऋषिकेश से पढ़ने वाले डाक्टरों की गिनती न करी जाए तब भी सरकारी मेडीकल कालेजों से 700 डाक्टर निकल रहे हैं।
इनमें बहुत से डाक्टर बहुत कम सरकारी फीस देकर पढ़ाई करते हैं। जिनके साथ सरकार इस बात का अनुबंध करती है कि वो पढ़ाई पूरी करने के बाद राज्य में सेवा देंगे लेकिन वो डाक्टर रफूचक्कर हो जाते हैं सरकार हवा में लट्ठ चलाती रहती है।
पिछले दिनों खबर आई कि सरकार बांड तोड़ने वाले डाक्टरों से सम्बधित जिले के जिलाधिकारी के माध्यम वसूली की कार्रवाई करेगी। यह खबर चले हुए भी सात आठ महीने हो गए रिजल्ट क्या हुआ पता नहीं।
राज्य में ऐसे 234 डॉक्टरों को बर्खास्त किया गया है, जो अपनी डिग्री पूरी करने के बाद सरकार की सेवा करने में विफल रहे। इनमें से 56 डॉक्टरों को अंतिम चेतावनी के बाद भी ड्यूटी पर न लौटने के कारण बर्खास्त कर दिया गया है। सरकार इन डॉक्टरों से बॉन्ड राशि की वसूली शुरू कर रही है और उनके नाम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भी भेजे जा रहे हैं।
ये डॉक्टर सरकार द्वारा कम खर्च में कराई गई पढ़ाई के बाद अनिवार्य सेवा बॉन्ड की शर्तों को पूरा नहीं कर पाए और निर्दिष्ट सरकारी अस्पतालों में सेवा देने के लिए हाजिर नहीं हुए। और बर्खास्त किए गए। ये डॉक्टर दून मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज और श्रीनगर मेडिकल कॉलेज से हैं
सरकार ने इन डॉक्टरों को कम खर्चे में बॉन्ड के तहत मेडिकल की पढ़ाई करवाई थी। पढ़ाई पूरी होने के बाद डॉक्टरों को उत्तराखंड के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में तैनाती भी दे दी गई, लेकिन ये बॉन्ड धारक डॉक्टर अपनी तैनाती स्थल पर नहीं गए। अब मेडिकल कॉलेज प्रशासन अब इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने जा रहा है।
इन डॉक्टरों में 28 पीजी और 90 एमबीबीएस डिग्री धारक डॉक्टर शामिल हैं। इनसे 20 लाख से लेकर 2.5 करोड़ रुपए तक की वसूली की कार्रवाई की जानी है जाएगी। इन सभी डॉक्टरों ने पढ़ाई के दौरान रियायती फीस के एवज में जो बॉन्ड भरा गया था, उन शर्तों का उल्लंघन किया।
इन डॉक्टरों के नाम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को भी भेजे जा रहे हैं।
यहां यह बताया जाना ज़रूरी है कि यह समस्या पहले से ही चली आ रही है और पिछले सात आठ साल से सरकार कोई एक्शन नहीं ले पा रही है। हर बार सख़्त से सख़्त एक्शन की घोषणा होती है लेकिन नतीजा डाक के तीन पात होता है।
इधर स्वास्थ्य मंत्री का बयान सोशल मीडिया में आ रहा है कि राज्य में इतने डाक्टर हो गए है कि डाक्टर मरीज खोज रहे हैं। अब ऐसे बयान से जमीनी हकीकत मिलाई जाए तो सरकारी मसखरेपन पर हंसी आती है।
इस पूरे मामले में यह सवाल बिना जवाब के रह जा रहा है कि राज्य के मेडीकल कालेजों से पढ़कर निकल रहे विशेषज्ञ डाक्टरों को राज्य सरकार इतने सालों से रोक क्यों नहीं पा रही है, या फिर सस्ती फीस से पढ़कर अनुबंध तोड़कर भागने वाले डाक्टरों के खिलाफ़ फौजदारी एक्शन क्यों नहीं ले पाई।
उधर ऐसे भी किस्से हैं जब उत्तराखंड में काम करने वाले डाक्टरों के साथ भेद-भाव किया गया या फिर ऐसे हालात पैदा किए गए जिससे उन्होंने मजबूरी में उत्तराखंड छोड़ना पड़ा।
सहायक स्टाफ नर्स वगैरह के चयन नियुक्ति की कहानियां और किस्से बहुत से हैं, जिसमें नियुक्ति में देरी से लेकर पोस्टर और ट्रांसफर के फंडे और हथकंडे शामिल हैं और जिनका स्वास्थ्य समस्या या समाधान से कोई लेना-देना नहीं है।