“कैसे लिया झारखंड, लड़ के लिया झारखंड”, “विविधता में एकता, झारखंडी एकता”, “हमारी पहचान, झारखंडी एकता और सम्मान!”, “आज़ादी, दोस्ती, प्रकृति और समानता, इससे बने झारखंडी एकता”, “जल-जंगल-ज़मीन हमारी जान, हमारी पहचान” जैसे नारों के साथ झारखंड राज्य के 25वें स्थापना दिवस पर 15 नवम्बर को राज्य के सैकड़ों झारखंडी साथियों द्वारा अलग राज्य आंदोलन को याद करते हुए बिरसा समाधि स्थल, रांची के कोकर से अल्बर्ट एक्का चौक तक “झारखंडी एकता पद यात्रा” निकाली गई।
यात्रा का आयोजन पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत झारखंड जनाधिकार महासभा द्वारा किया गया।
पद यात्रा शुरू करने से पहले लोगों ने बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माला अर्पण कर उनके संघर्षों को याद किया। पद यात्रा में झारखंड के ऐतिहासिक क्रांतिकारियों जैसे – बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हो, फूलो-झानो, पोटो हो, तेलंगा खड़िया, नीलांबर-पिताम्बर आदि एवं अलग राज्य आंदोलन के क्रांतिकारियों जैसे – जयपाल सिंह मुंडा, हन्ना बोदरा, एन इ होरो, ए के रॉय, शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो, निर्मल महतो, महेंद्र सिंह, बी पी केशरी, राम दयाल मुंडा आदि के संघर्ष को याद किया गया।

पदयात्री उन क्रांतिकारियों की तस्वीरों के बड़े बड़े प्लैकार्ड व पोस्टर लेकर चले। साथ ही, झारखंडी एकता और संघर्षों को याद करने वाले अनेक नारों के प्लेकार्ड भी यात्रा में रहे। साथ ही, राम दयाल मुंडा द्वारा झारखंडी एकता और संघर्ष पर बनाए गए गानों को भी लगातार बजाया गया।
यात्रा की शुरुआत व अंत में वक्ताओं ने अपने अपने ढंग से झारखंड आंदोलन को याद किया।
अवसर पर वक्ताओं ने बताया कि झारखंड राज्य का बनना एक लंबे संघर्ष का नतीजा था। सभी समुदायों के जनहितैषी लोगों ने इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। कई लोगों ने इसके लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। उनका सपना था कि झारखंड बनने से इस इलाके के आदिवासी-मूलवासी अपने मूल्यों के अनुसार विकास कर पाएंगे।
आज़ादी, समानता, दोस्ती और प्रकृति के साथ तालमेल के मूल्यों के साथ-साथ झारखंड की आज़ादी से बाहरी लोगों के शोषण का भी अंत होना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इसके साथ ही, यात्रा में एक प्रमुख सवाल उठाया गया – “झारखंड के 25 साल – कौन खाया, कौन खोया ?” इस विषय पर बने संलग्न पर्चे को यात्रा के दौरान लोगों में बांटा गया।
पर्चा में झारखंड के राजनैतिक वर्ग को आंदोलन के सपनों को याद दिलाते हुए राज्य की दुर्दशा के लिए उनसे गंभीर सवाल किए गए हैं।

वक्ताओं ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि झारखंड में ज़्यादातर लोग आज पच्चीस साल पहले के मुकाबले थोड़ी बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन लाखों लोग आज भी घोर गरीबी में जी रहे हैं और झारखंड वैसा नहीं है जैसा उसे होना चाहिए था।
वहीं छोटानागपुर और संथाल परगना की खूबसूरत सभ्यता खत्म होने के खतरे में है, क्योंकि ताकतवर कंपनियां इसकी ज़मीन, खनिज और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों पर नज़र गड़ाए हुए हैं। झारखंड के आज़ाद और स्वाभिमानी किसान, मज़दूर बन रहे हैं और बदहाल शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
पर्चे में बताया गया है कि राजनीतिक वर्ग झारखंड आंदोलन के दिग्गजों से प्रेरणा और सीख लेने और आम लोगों के लिए काम करने की बजाय खुद को अमीर बनाने के लिए शोषकों के साथ हाथ मिला लिया है। स्थानीय लोगों की कीमत पर झारखंड के कीमती संसाधनों को लालची कंपनियों और व्यापारियों को बेचा जा रहा है।
नेताओं ने सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद होने दिया है, जिससे लाखों युवाओं को प्रवासी मज़दूर बनने पर मजबूर होना पड़ा है। पच्चीस सालों में भी राज्य पेसा के लिए नियम बनाने में नाकाम रहा है। सीएनटी-एसपीटी एक्ट और वन अधिकार अधिनियम का घोर उल्लंघन होने दिया है।
साथ ही, कुछ नेताओं ने झारखंड के लोगों को आपस में बांटा भी है और अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ भड़काया है। जहां “धन नहीं, एकता सही” झारखंड संघर्ष के लोकप्रिय नारों में से एक था वहीं आज इस एकता का बहुत कम हिस्सा बचा है।
अपने संबोधन में वक्ताओं ने कहा कि 25वें स्थापना दिवस पर हमें उम्मीद है कि राजनीतिक नेतृत्व की एक नई पीढ़ी सामने आएगी, जिसमें ऐसे पुरुष और महिलाएं होंगी जो लोगों के हितों को दिल से समझेगी।
झारखंडी एकता और मुद्दों के लिए संघर्ष करने के संकल्प के साथ यह यात्रा अल्बर्ट एक्का चौक पर समाप्त की गई।
यात्रा में अजय सिंह, अमित गाड़ी, अंबिका यादव, अशोक वर्मा, अफजल अनीस, अपूर्वा, अलोका कुजूर, अलका आइंद, आकांक्षा बिहान, आशीष रोशन, एलिना होरो, किरण, लीना, जॉन पंकज कुजूर, ज्यां द्रेज, जोनाथन बोदरा, जेनी टोप्पो, टॉम कावला, धरम वाल्मीकि, नंदिता, नेमहा, प्रवीर पीटर, भरत भूषण, मंथन, मनोज भूइयां, मेघनाथ, रिया तूलिका पिंगुआ, रूपेश, रोशन होरो, विवेक, शबनम केरकेट्टा, शिल्पा कुमारी, सिराज, सिरोन गुड़िया, संजय बसु मल्लिक, सुचित्रा, सुशीला तिग्गा सहित सैंकड़ों लोग शामिल थे।