मैं देश नहीं बिकने दूंगा के आह्वान पर बनी भाजपा सरकार ने पिछले अपने एक दशक से अधिक के कार्यकाल में वन्दे भारत नारे को जिस तेजी से फैलाया उससे अधिक तीव्र गति से देश के जल, जंगल और जमीन को बेचने का काम किया है। यह कैसी भारत वंदना है?
हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि ये सब प्रकृति प्रदत्त नि: शुल्क उपहार हैं। किंतु आज जल बिक रहा है, जंगल कट रहे हैं वहां के जीव-जंतु और इंसान उजाड़े जा रहे हैं।हाल ही में सिंगरौली मध्य प्रदेश में अडानी कोल माइनिंग के लिए लाखों पेड़ कटने की ख़बर है। उस जगह पर प्रवेश वर्जित है वह पूरी तरह अडानी लैंड बन चुका है। ये तब पता चला जब कांग्रेस नेताओं को भी वहां जाने नहीं दिया गया। वे येन-केन प्रकारेण आदिवासियों की मदद से चोर दरवाजे से वहां पहुंचे तथा वहां से जो तस्वीरें सामने आई हैं वे हृदय विदारक हैं।
महुआ के अनेकों पेड़ जो आदिवासी समाज के लिए बेशकीमती वृक्ष हैं। राजकीय आय का जरिया हैं उन्हें जंगल के लुटेरों ने नेस्तनाबूद कर दिया है। ऐसा ही छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल के साथ हुआ है। वहां आदिवासी समाज के प्रतिरोध के एवज में जो ज़ुल्म ज्यादतियां हुई हैं वह हमारे सामने हैं। देश में कारपोरेट के लिए ऐसी भयावह व्यवस्थाएं कई जगह की जा रही हैं।
जहां तक जमीन की बात है वह तो एक रुपए में दिलाई जा रही है भले ही उस शहर या गांव में जमीन का रेट कुछ भी क्यों ना हो। बुल्डोजर संस्कृति के पीछे यही राज छुपा हुआ है इस कीमती जमीन का इस्तेमाल सिर्फ कारपोरेट के लिए ही होगा। अयोध्या, बनारस, उज्जैन और केदारनाथ जैसे कई महत्वपूर्ण तीर्थ इसके प्रमाण हैं।
ये सिलसिला अभी चल ही रहा था कि अब देश का सबसे प्राचीनतम पर्वत अरावली इनके लिए सुगमता से मिलने की कार्ययोजना तैयार हो चुकी है। सूत्र बता रहे हैं कि अरावली की सौ मीटर तक की पर्वत श्रृंखला को अरावली पर्वत ना मानते हुए उसका खनन किया जा सकेगा। वजह साफ़ है इसमें अमूल्य खनिज भंडार है। जिनमें मुख्य रूप से सीसा, जस्ता (जिंक), तांबा, संगमरमर, ग्रेनाइट, अभ्रक (Mica), डोलोमाइट, सोपस्टोन, क्वार्ट्ज, रॉक फॉस्फेट, एस्बेस्टस, साल्ट और बेरिल जैसे खनिज शामिल हैं, जो क्षेत्र के आर्थिक और भूवैज्ञानिक महत्व को दर्शाते हैं।
अरावली को भूवैज्ञानिक लगभग दो अरब साल पुराना बताते हैं। इसलिए इसकी श्रृंखलाएं वर्तमान में पठारी स्वरूप में शेष हैं लेकिन अभी भी इसमें 1722 मीटर सर्वोच्च चोटी गुरु-शिखर है जो माउंट आबू में स्थित है।
अरावली पर्वतमाला से कई महत्वपूर्ण नदियां निकलती हैं, जिनमें प्रमुख हैं बनास, साबरमती, और लूनी, जो अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं; बनास यमुना की सहायक है, साबरमती खंभात की खाड़ी में गिरती है, और लूनी कच्छ के रण में समाप्त होती है। इनके अलावा, बेराच, वागली, वैगन, और गंभीरी जैसी कई अन्य सहायक नदियाँ भी अरावली से निकलती हैं या इसके बेसिन का हिस्सा हैं।
इसके अलावा अरावली पर्वतमाला की देन
राजस्थान की नक्की झील (माउंट आबू), सांभर झील, पिछोला झील (उदयपुर), और जयसमंद झील; वहीं हरियाणा में दमदमा झील, बड़खल झील और सूरजकुंड जैसी झीलें भी अरावली के जल पर निर्भर हैं।
यह सब बताना इसलिए ज़रूरी है कि अरावली पर्वत जो जल संचय का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है उसे यदि नष्ट होने से नहीं रोका गया तो ये नदियां, झीलें सब ख़त्म हो जाएंगी।
भारत को थार के रूप में एक मरुस्थल भी मिला है जो पुराने अरावली की ही देन है जो भारत को वैविध्य पूर्ण बनाता है। जैसलमेर के पीले पत्थर, किला और ऊंट की सेवाएं इस बहुलता को बढ़ाते हैं। कंटीले वन, बबूल, कीकर भी अनूठे हैं। यहां खेजड़ी महत्वपूर्ण वृक्ष है।
बहरहाल, इस खूबसूरत अरावली की लगभग सात सौ किलोमीटर लंबी परिधि को यदि नष्ट किया जाता है तो थार रेगिस्तान संपूर्ण राजस्थान, गुजरात का उत्तरी क्षेत्र, हरियाणा, दिल्ली यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भी अपनी चपेट में ले लेगा। जल संचयन केंद्र के ख़त्म होने से क्षेत्र जबरदस्त सूखाग्रस्त क्षेत्र बन जाएंगे। इससे अज़मेर शरीफ, पुष्कर, खाटू श्यामजी के साथ-साथ जैसलमेर, जोधपुर, उदयपुर, माउंट आबू के देशी विदेशी पर्यटन पर भी असर होगा। भरतपुर में दिखने वाली जैव विविधता भी समाप्त होगी। पनाली के धुएं से परेशान राजधानी दिल्ली की आगे क्या दुर्दशा होगी। सोचकर घबराहट होती है।
कहने का आशय यह कि अरावली के विनाश से भारत का भौगोलिक स्वरूप बदलेगा जिससे हज़ारों वर्षों से बनी बनाई सभ्यता और संस्कृति भी विनष्ट होगी।
यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं कि निजीकरण के जरिए पिछली सरकारों द्वारा निर्मित बड़े-बड़े संस्थानों मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य, रेल, हवाई यात्रा वगैरह के दुखद परिणाम सामने आने लगे हैं। लेकिन हमारे जंगल यानि हवा, पानी और जमीन के बाद अब अरावली पर्वत सम्बंधी यह निर्णय सबसे ख़तरनाक होने वाला है। हम सभी को अरावली बचाने का अभियान प्रारंभ करना चाहिए ताकि देश सुजलाम, सुफ़लाम शस्य श्यामला भूमि से वंचित ना होने पाए। सिर्फ राष्ट्रीय गीत गाने और वन्दे भारत कहने से काम चलने वाला नहीं है।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)