कश्मीर का नया “सत्यापन अभियान” फर्जी पत्रकारों को निकाल बाहर करने का दावा करता है लेकिन इसकी नौकरशाही मांगें उन स्वतंत्र फ्रीलांसरों को किनारे कर रही हैं जो सिकुड़ते मीडिया माहौल में भी रिपोर्टिंग की हिम्मत कर रहे हैं। घाटी पर अल सुबह कोहरे की तरह छाया परेशान करने वाला सवाल यह है कि बिना संस्थानिक ढालों के खबरें देने वालों को मैदान से बाहर कर दिया गया तो फायदा किसे होगा?
श्रीनगर। घाटी में निजी मीडिया सेक्टर को देखने वाले कश्मीर के सूचना एवं जन संपर्क विभाग ने हाल में कथित “फर्जी पत्रकारों” की शिनाख्त के लिए बड़े पैमाने पर सत्यापन अभियान शुरू किया है, जिससे कई प्रतिष्ठित स्वतंत्र पत्रकार (फ्रीलांसर) परेशानी में पड़ गए हैं।
कश्मीर सरकार के सर्कुलर के अनुसार पत्रकारों को कई दस्तावेज़ जमा कराने हैं जिनमें आधार (12 डिजिट वाली पहचान संख्या) अथवा पैन कार्ड, कार्यालय से मिला परिचय पत्र, नियुक्ति पत्र, संपर्क विवरण, छह महीने के वेतन का अथवा बैंक स्टेटमेंट और जिस मीडिया संस्थान के लिए वह काम कर रहे हैं, उसके डिजिटल अथवा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, यूट्यूब और एक्स (ट्विटर) लिंक।
सर्कुलर का दावा है कि इस कदम का उद्देश्य पत्रकारिता को सुरक्षित करना, फर्जी पत्रकारों को रोकना और वास्तविक मीडिया पेशेवरों के लिए जिले में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
वेतनभोगी समाचार कक्षों के लिए बनाया गया सत्यापन अभियान
आधार कार्ड 12 डिजिट की एक अनूठी पहचान संख्या है जो सभी भारतीय नागरिक अपने बायोमेट्रिक्स और डेमोग्राफिक डाटा के आधार पर प्राप्त कर सकते हैं। यह अमेरिका के सोशल सिक्योरिटी नंबर की तरह है। दूसरी तरफ, पैन कार्ड कर (टैक्स) पहचान संख्या है, जो वित्तीय सौदों और आयकर फाइलिंग के लिए आवश्यक होती है। दोनों दस्तावेज़ भारत में अपरिहार्य हैं।
जहां मुख्यधारा के मीडिया अथवा नियमित अखबारों में काम कर रहे घाटी के पत्रकारों ने मांगे गए दस्तावेज़ तुरंत जमा करवाने शुरू किए, स्वतंत्र पत्रकारों को दिक्कतें पेश आईं। जिन संसाधनों के लिए वह काम करते हैं, वहाँ से उन्हें नियमित वेतन पर्ची (सैलरी स्लिप) या औपचारिक पत्र नहीं मिलते।
कश्मीर के तीन विश्वविद्यालयों से हर साल लगभग 150 छात्र मीडिया अध्ययन में स्नातक अथवा मास्टर्स डिग्री के साथ निकलते हैं। हालांकि मुख्यधारा के मीडिया में ढंग की नौकरी न मिलने के कारण अधिकांश फ्रीलांसिंग यानि स्वतंत्र पत्रकारिता करने लगते हैं।
27 वर्षीय जुनैद अहमद बताते हैं, “मीडिया स्टडीज में मास्टर्स करने के बाद मैंने एक प्रतिष्ठित अखबार में काम शुरू किया लेकिन वह मुझे केवल छह हजार रुपये मासिक वेतन के तौर पर दे रहे थे। मुझे यह शोषण लगा, और मैंने एक महीने में नौकरी छोड़ दी।” उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू की और पर्यावरणीय संकट पर एक महीने में दो रिपोर्ट तैयार कीं, और 30 हजार रुपये कमाए। इससे उन्हें विश्वास मिला कि वह स्वतंत्र पत्रकारिता कर सकते हैं।
जुनैद ने बताया कि वह सूचना विभाग गए और अपनी अंतर्राष्ट्रीय बाइलाइन के स्क्रीनशॉट दिखाए पर उन्हें कहा गया कि जो दस्तावेज़ मांगे गए हैं, जमा करवाएं अन्यथा उन्हें कश्मीर में किसी भी सरकारी कार्यक्रम को कवर करने नहीं दिया जाएगा। उन्हें बताया गया कि विभाग के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता वैध नहीं है।
स्वतंत्र पत्रकारों को हाशिये पर धकेल दिया गया है
दो साल से काम कर रहे इलहाक अहमद (26) जैसे युवा पत्रकारों के लिए यह नीति परेशान करने वाली है क्योंकि स्वतंत्र पत्रकारों को मांगे गए दस्तावेज़ तुरंत प्राप्त करना आसान नहीं है।
इलहाक कहते हैं, यह कदम मीडिया में मूल समस्याओं का समाधान नहीं करता बल्कि जमीन पर काम करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों को बाधित करता है।
वह कहते हैं, “एक फ्रीलांसर के तौर पर, अब मैं कोई भी खबर करने से पहले दो बार सोचूँगा क्योंकि यदि सवाल किया गया तो मेरे पास यह साबित करने के लिए कुछ नहीं रहेगा कि मैं मीडिया से हूँ।” उन्होंने कहा कि प्रशासन को नीति की समीक्षा करनी चाहिए और ऐसी न्यायोचित प्रणाली लानी चाहिए जो क्षेत्र से असत्यापित लोगों के मुद्दे के निबटारे के साथ वास्तविक पत्रकारों की मदद करे।
एक और पत्रकार सज्जाद लोन ने कहा कि सत्यापन अभियान को शैक्षणिक पृष्ठभूमि पर फोकस करना चाहिए। जैसे वकीलों को एलएलबी और डॉक्टरों को एमबीबीएस की डिग्री होनी चाहिए, मीडिया पेशेवरों को मीडिया अध्ययन करना आवश्यक होना चाहिए ताकि मूल्यों, जवाबदेही, प्रमाणिकता, संतुलित रिपोर्टिंग सुनिश्चित हो। इसके लिए समुचित प्रशिक्षण और शिक्षा जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जो पेशे को नुकसान पहुँच रहे हैं, गैर पेशेवर पत्रकार हैं जिनमें मूल्यों के प्रशिक्षण का अभाव है। सत्यापन अभियान में प्रशासन को उन पर फोकस करना चाहिए। कश्मीर ने कई स्वतंत्र पत्रकार दिए हैं जो पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण जीवन पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं और जिन्होंने वैश्विक मीडिया मंचों को कई अनकही कहानियाँ दी हैं।
लोन ने कहा कि कश्मीर पहले से मीडिया संकट झेल रहा है जो स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सिकुड़ते स्पेस, वित्तीय और राजनीतिक दबाव और भय व स्व सेन्सरशिप के माहौल के कारण है। इस संकट के कारण नौकरी की असुरक्षा, कम पारिश्रमिक और पेशे से कई योग्य पत्रकारों के निकलने के हालात पैदा हुए हैं।
सिकुड़ते स्पेस में प्रेस की आजादी
भारत विश्व प्रेस आजादी सूचकांक 2025 में 180 देशों में 151वें नंबर पर था। रिपोर्टर्स विदाऊट बॉर्डर्स (आरएसएफ) के अनुसार 2024 की रैंकिंग के मुकाबले सुधार है लेकिन फिर भी यह रैंकिंग प्रेस की आजादी के लिए “बहुत गंभीर” श्रेणी है। 2020 में जम्मू एवं कश्मीर मीडिया नीति ने अनुपालन को सरकारी विज्ञापनों से जोड़ते हुए सरकार को “देश द्रोही गतिविधियों” और “फर्जी खबरों” के लिए समाचार सामग्री की निगरानी की शक्तियां दीं। इसकी काफी आलोचना हुई कि अधिकारियों को पहले से संवेदनशील क्षेत्र में समाचार कक्षों में वित्तीय दबाव डालने और नैरेटिव गढ़ने में सक्षम बनाया गया।
व्यापक तौर पर नीति को स्वतंत्र पत्रकारिता पर अंकुश लगाने के प्रयास और संघर्ष ग्रस्त क्षेत्र में फ्री स्पीच को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया था। क्षेत्र ने एक लोकतंत्र में विश्व की सबसे बड़ी इंटरनेट बंदी देखी थी।
प्रेस की आजादी के लिए कार्यरत संगठनों जिनमें आरएसएफ शामिल है, ने नीति को “ऑरवेलियन” और “पूर्व सेन्सरशिप” करार दिया था और चेतावनी दी थी कि आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए सिकुड़ी जगह को यह और संकुचित करेगी।
सुरक्षा बलों और उग्रवादी समूहों के बीच मुठभेड़ों को कवर करने वाले युवा पत्रकार अक़ीब अहमद खान के लिए फ्रीलांसिंग शुरू करने के बाद चुनौती और जटिल हो गई है। वह बताते हैं कि ऐसी घटनाओं के दौरान उनसे लगातार परिचय पत्र दिखाने को कहा जाता है जो कि फ्रीलांसर होने के कारण उनके पास अब नहीं है। वह कहते हैं, “कश्मीर में सुरक्षा बलों के लिए फ्रीलांसर नहीं होते। आपके पास संवेदनशील स्थलों पर रिपोर्टिंग के लिए परिचय पत्र होना चाहिए।”
अब प्रशासन स्वतंत्र पत्रकारों को पूरी तरह खारिज कर और बुरा कर रहा है। खान कहते हैं कि “फर्जी पत्रकारों” पर कार्रवाई की जानी चाहिए पर वर्तमान रवैया वास्तविक समस्या को लक्षित करने में विफल है।
जम्मू कश्मीर में, प्रशासन ऐसे व्यक्ति को “फर्जी पत्रकार” के रूप में परिभाषित करती है जो खुद को बिना अथराईजेशन, पंजीकरण या पेशेवर परिचय पत्र के, मीडियाकर्मी बताता है और अक्सर अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त होता है।
खान पूछते हैं, “लेकिन एक वास्तविक स्वतंत्र पत्रकार क्या कर सकता है अगर वह प्रशासन के मांगे दस्तावेज़ पेश नहीं कर सकता है तो? उनके पैमाने पर मैं भी फर्जी हूँ महज इसलिए कि मैं उनकी प्रक्रिया में फिट नहीं होता।”
रशीद अंदराबी कहते हैं कि एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में वह कई संस्थानों के लिए काम करते हैं क्योंकि स्वतंत्र पत्रकारिता ऐसे ही होती है। सरकार की नई आवश्यकता के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि हर पत्रकार एक नियोक्ता के लिए काम करता है।
रशीद कहते हैं कि यह स्वतंत्र पत्रकारों को निकाल बाहर करता है।
वह कहते हैं, “यह आवश्यकता बताती है कि यदि हम तय ढांचे में फिट नहीं होते तो हमारे कार्य का कोई महत्व नहीं है।”
वह मानते हैं कि पत्रकार के तमगे का कश्मीर में दुरुपयोग लेकिन कहते हैं कि समाधान स्वतंत्र पत्रकारों से वह दस्तावेज़ मांगना नहीं हो सकता जो उनके पास हैं ही नहीं।
वह कहते हैं, “बुनियादी कसौटी सरल है : “खबरें, नाम से छपी खबरें और संपादक जो उनके कार्य की पुष्टि कर सकें। यदि किसी के पास की हुई रिपोर्टिंग का प्रमाण नहीं है, छपी हुई खबरें नहीं हैं, संपादकीय ट्रेल नहीं है, तो समस्या पहले से स्पष्ट है।”
रशीद जो पहले जाने-माने साप्ताहिक कश्मीर लाइफ के साथ उप संपादक थे और अब स्वतंत्र पत्रकार हैं, ने कहा कि यदि उद्देश्य फर्जी पत्रकारों की शिनाख्त करना है तो प्रणाली उनके सत्यापित किए जा सकने वाले कार्य पर आधारित होनी चाहिए।
वह कहते हैं, “देखेँ कि उन्होंने पिछले समय में क्या काम किया है। इससे आप दिखावा करने वालों को तेजी से बेनकाब कर पाएंगे। स्वतंत्र पत्रकारों की अनदेखी करने वाली नीति कोई फ़िल्टर नहीं है यह सिर्फ पेशे को कमजोर करती है।”
रशीद, कई मीडिया संस्थानों में जिनकी नाम से छपी खबरें हैं और जो नियमित तौर पर कार्य कर रहे हैं, वह कहते हैं कि प्रशासन को मीडिया जगत की इस सच्चाई को पहचानना चाहिए।
इस बीच, कश्मीर में एक केंद्र में दस्तावेज़ जमा करने वाले एक अधिकारी ने नाम न छपने की शर्त पर बताया कि स्वतंत्र पत्रकारों को मिलकर एक संयुक्त ज्ञापन लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा को देना चाहिए, जो 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद नई दिल्ली द्वारा शीर्ष प्रशासक के रूप में नियुक्त किए गए थे।
(तौसीफ अहमद और साजिद राणा की रिपोर्ट अल जज़ीरा से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत। मूल अंग्रेजी रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।)