“इन पैंतीस वर्षों को जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो अनेक महान व्यक्तित्व सामने आते हैं, परंतु संभवतः कोई भी एक व्यक्ति ऐसा नहीं रहा जिसने इन वर्षों के इतिहास को उतना अधिक गढ़ा, प्रभावित किया और दिशा दी हो जितना कि मार्शल स्टालिन ने।”
“एक बात पर कोई असहमति नहीं होगी कि वे एक महान कद-काठी के व्यक्ति थे, ऐसे व्यक्ति जिन्होंने अपने युग की नियति को गढ़ा और दिशा दी—ऐसे व्यक्ति जो चाहे युद्ध में अत्यंत सफल रहे हों, पर अंततः अपनी महान देश-रचना के लिए भी स्मरण किए जाएंगे।”
-जवाहर लाल नेहरू (भारतीय संसद में, 1953)
“रूसी समाज के हर वर्ग में शिक्षा को जिस व्यापकता और ऊर्जा से बढ़ावा दिया जा रहा है, उसकी प्रशंसा करनी होगी। शिक्षा का मापदंड केवल संख्या नहीं है, बल्कि उसकी संपूर्णता और लोगों पर उसके प्रभाव में है। यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत उत्साह और गहन चिंतन है कि कोई भी बिना मदद और रोज़गार के न रहे।
यह केवल श्वेत रूस तक ही सीमित नहीं है, वे मध्य एशिया की आदिम जनजातियों में भी शिक्षा की इस वास्तविक बाढ़ को फैला रहे हैं; विज्ञान के नवीनतम विकास को उन तक पहुँचाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं है। यहाँ थिएटरों में महान ओपेरा और नाटक देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़ते हैं, लेकिन दर्शकों में उल्लेखनीय रूप से किसान और मज़दूर होते हैं।”
-रवींद्रनाथ टैगोर (स्टालिनकालीन रूस के बारे में)
यह सच है कि लेनिन मेहनतकशों की महान रूसी क्रांति के केंद्रीय व्यक्तित्व और अगुवा थे, उतना ही बड़ा सच है कि सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण के केंद्रीय व्यक्तित्व और अगुवा जोसेफ स्टालिन थे। उन्होंने धरती पर समाजवाद को साकार रूप दिया। मार्क्स के क्रांति के स्वप्न को यदि लेनिन साकार किया तो, क्रांति के बाद समाजवाद के निर्माण के स्वप्न को स्टालिन ने जमीन पर उतार दिया।
सोवियत गणराज्य के मुखिया के रूप में अपने करीब 29 वर्ष के कार्यकाल में उनके नेतृत्व में सोवियत संघ ने वे कारनामे कर दिखाए जिसकी कल्पना करना कभी नामुमकिन सा लगता था।
यूरोप-अमेरिका सम्राज्यवादी लूट और सैकड़ों वर्षों के पूंजीवाद विकास के बाद भी वह सबकुछ नहीं कर पाया, जो सोवियत संघ ने करीब 35 वर्षों में कर दिखाया। बहुसंख्य निरक्षर आबादी सौ प्रतिशत साक्षर हो गई। सबके लिए स्वास्थ्य सेवा की एक ऐसी मुकम्मल उन्नत व्यवस्था कर दी कि जो बिना किसी शुल्क के सबसे लिए उपलब्ध थी। भूख-गरीबी का नामोनिशान मिटा दिया गया। बेरोजगारी जैसा शब्द शब्दकोष से गायब हो गया।
कृषि आधारित अर्थव्यवस्था एक उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्था में तब्दील हो गई। जब पूरी दुनिया 1929 की मंदी का शिकार होकर पस्त हिम्मत हो गई थी, तो रूस विकास की छलांगे लगा रहा था। पिछड़े रूस ने विज्ञान और तकनीकी में कई क्षेत्रों में यूरोप-अमेरिका को पीछ़े छोड़ दिया। वेश्यावृत्ति का नामोनिशान मिट गया, जिसके बारे में कहा जाता था कि दुनिया से कभी वेश्यावृत्ति खत्म नहीं हो सकती है।
शराब तो लोग पीते थे, लेकिन शराबखोरी खत्म हो गई। शिक्षा व्यवस्था ऐसी बन गई, जिसे देखकर रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा कि यह अद्वितीय और आश्चर्यजनक है। तथ्यात्मक बात को रूपक में कहें तो सोवियत समाज चांद पर पहुंच गया। साहित्य, संस्कृति और सिनेमा की दुनिया में ऐसी सृजनात्मक पहल हुई कि दुनिया उसकी ओर देखने लगी।
पेरिस कम्यून के बाद दुनिया में पहली बार सच्चे अर्थों में उन मेनतकशों मजदूरों-किसानों का राज्य कायम हुआ, जिनके बारे में यही माना जाता है कि वे गुलामी करने और किसी तरह जिंदा रहने के लिए ही पैदा हुए हैं। खटना ही उनका धर्म है और यही सिर्फ उनके बस की बात है, देश-दुनिया कैसे चलानी है, राजनीति किसे करना है और राज्य किसे चलाना है, इससे उनका सरोकार नहीं होना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा वे वोट दे सकते हैं।
यह सबकुछ स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत संघ के मेहनतकशों ने उस हालात में किया जब पश्चिमी-यूरोप और अमेरिका सोवियत संघ को खत्म करने की चौरतरफा हर संभव कोशिश कर रहे थे। हिटलर को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा था कि वह अपने फासीवादी हमले की दिशा पूरी तरह सोवियत संघ की ओर मोड़ दे। रूसी समाजवाद को नेस्तनाबूत कर दे।
आखिरकार पश्चिम यूरोप और अमेरिका को भी फासीवाद को परास्त करने के लिए हिटलर के विजय अभियान को रोकने के लिए स्टालिन की शरण में जाना पड़ा। आखिर स्टालिन ने हिटलर रूपी शैतान और उसकी सेना को शिकस्त दी। आखिर समाजवादी रूस ने ही अंतिम और निर्णायक तौर पर फासीवाद को शिकस्त दी। हिटलर को आत्महत्या करनी पड़ी। दुनिया ने राहत की सांस ली।
लेनिन की मृत्यु के बाद रूसी क्रांति को मूर्त रूप देने, उसे सच्चे अर्थों में बहुसंख्यक मेहनतकशों का राज्य बनाने, हर तरह के शोषकों-उत्पीड़कों का सफाया करने (व्यक्तिगत सफाया नहीं, उनके शोषण-उत्पीड़न के भौतिक और वैचारिक आधारों का सफाया करने), समाजवाद और उसके बाद साम्यवाद की स्थापना करने का ठोस कार्यभार था।
इतना ही नहीं दुनिया भर में क्रांतियों के सिलसिले को आगे बढ़ाने, हर तरह के क्रांतिकारी संघर्षों को मदद करने, हर तरह साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी और सामंतवाद विरोधी संघर्षों को मदद करने का कार्यभार था। बहुत ही सीमित समय में रूसी क्रांति ने महान सफलताएं हासिल कीं। खुद को दुनिया के उन्नत से उन्नत पूंजीवादी देशों से बेहतर देश में बदल लिया।
बहुसंख्यक आबादी की जिंदगी में जिस तरह की खुशहाली पैदा की, जैसा उनको गरिमामय जीवन मिला। यह सब कुछ कॉमरेड स्टालिन के नेतृत्व में हुआ।
इतना ही नहीं, जर्मनी, इटली और जापान के फासीवादी गिरोह को निर्णायक शिकस्त रूसी जनता ने कॉमरेड स्टालिन के नेतृत्व में ही दी। पूंजीवादी दुनिया रूस के बिना हिटलर और अन्य फासीवादी पिशाचों को पराजित करने के बार में सोच भी नहीं सकती थी।
अमेरिका (यूएसए) इस फासीवाद विरोधी युद्ध में अंतिम समय तक हथियार बेचकर और ऋण देकर मुनाफा कमा रहा था। वह हिटलर और उसके फासीवादी हमलों के खिलाफ अंतिम समय में शामिल हुआ, जापान पर अपने परमाणु बम का परीक्षण करके। यूरोप तबाह और बर्बाद हो चुका था। रूस करीब-करीब अकेले हिटलर मुकाबला कर रहा था।
सच यह है कि स्टालिन ही वह व्यक्ति थे। पूरी पश्चिम दुनिया और पूंजीवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने। उन्होंने अपने करीब 29 वर्षों में सोवियत रूस को उन्नति के उन शिखरों पर पहुंचा दिया, जिसकी किसी के लिए कल्पना करना भी मुश्किल था।
वह अकेले न केवल यूरोप-अमेरिका के साम्राज्यवादियों-पूंजीपतियों के हर तरह के हमलों से जूझे, बल्कि हिटलर और उसके फासीवादी गिरोह के खिलाफ भी उतने ही मजबूती से खड़े हुए। उन्होंने मानव जाति के इतिहास में वह कर दिखाया, जो एक असंभव सी कल्पना लगती थी।
समाजवादी रूस का खात्मा साम्राज्यवादी-पूंजीवादी दुनिया के लिए जीवन-मरण का प्रश्न था। यदि समाजवादी रूस और उससे प्रेरित क्रांतियों का सिलसिला उसी तरह आगे बढ़ता रहता, जैसे कॉमरेड स्टालिन के नेतृत्व में बढ़ रहा था, तो साम्राज्यवाद और पूंजीवाद इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया गया होता।
ऐसे स्टालिन को उनके जीते जी हत्यारा, क्रूर, जालिम और तानाशाह ठहराने के लिए हजारों किताबें लिखी गईं। झूठ का पुलिंदा खड़ा किया गया। स्टालिन पर इस हमले के बहाने मेहनतकशों के सोवियत राज्य को बदनाम किया किया। समाजवाद को बदनाम किया गया। क्रांति और क्रांति के स्वप्न को बदनाम किया गया। कम्युनिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों को बदनाम किया गया। मार्क्स और मार्क्सवाद को बदनाम किया गया। इस तरह से लुटेरे पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को बचाने की कोशिश की गई।
स्टालिन जिसने बड़े संगठनकर्ता थे, रणनीतिकार थे, मजदूरों के दोस्त थे, उतने ही बड़े सिद्धांतकार और लेखक भी थे। उनकी किताबों में ‘लेनिनवाद की बुनियादें’ , ‘लेनिनवाद के प्रश्न’, ‘मार्क्सवाद और भाषा विज्ञान’, ‘सोवियत संघ में मार्क्सवाद की आर्थिक समस्याएं’, ‘अक्टूबर क्रांति और रूसी कम्युनिस्टों की रणनीति’, ‘मार्क्सवाद और राष्ट्रीय प्रश्न’, ‘अनार्किज्म और समाजवाद’ आदि शामिल थीं।
स्टालिन राष्ट्रीयताओं के प्रश्न के सबसे बड़े अध्येता और जानकार थे। वे खुद जार्जिया में पैदा हुए थे, जो एक स्वतंत्र राष्ट्रीयता रही है। स्टालिन ने भाषा के प्रश्न जिस तरह से प्रस्तुत किया है, दुनिया के लोग उसके मुरीद हैं।
यही संक्षेप में सही लेकिन इस पर ध्यान देना जरूरी है कि स्टालिन किस वर्ग में पैदा हुए थे, उनके मां-बाप कौन थे और उनका पेशा क्या था? स्टालिन किस स्कूल में पढ़े थे, उनके पास कोई डिग्री थी या नहीं?
स्टालिन का जन्म जार्जिया में हुआ था। उनके पिता पेशे से मोची थे। मां दूसरों के घरों में काम करने और लोगों के कपड़े धोने का काम करती थीं। परिवार बदत्तर गरीबी में जी रहा था। घर की आर्थिक हालात यह थी कि खाने के लाले पड़े रहते थे। स्टालिन से पहले पैदा हुए उनके भाई-बहन गरीबी, इलाज के अभाव और कुपोषण के चलते बचपन की दहलीज भी नहीं पार कर पाए। बचपन में ही उनकी मृत्यु हो गई।
पिता भी स्टालिन के बचपन में ही मर गए। स्टालिन के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई। जैसा जिक्र किया जा चुका है कि मां लोगों के घरों में काम करके और बर्तन और कपड़ा धुलकर परिवार चलाती थीं। वे स्टालिन को किसी अच्छे स्कूल में भर्ती नहीं करा सकती थीं। स्टालिन की शिक्षा-दीक्षा एक खैराती ईसाई धार्मिक स्कूल में हुई। उनके पास कोई डिप्लोमा या डिग्री नहीं थी। क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सेदारी के चलते उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया।
उन्होंने स्वाध्याय से ही ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में और भाषाओं में महारत हासिल की। क्रांति और क्रांतिकारी पार्टी ही उनका असली स्कूल और शिक्षक बनी। मेहनतकश मां-बाप का बेटा होने के चलते उनका सहज मेहनतकशों से जुड़ाव था। वे उनके बीच के ही थे।
बोल्शेविक पार्टी और क्रांति ने तमाम मजदूरों के बेटे-बेटियों को दुनिया के बड़े-बड़े प्रोफेसरों और बुद्धिजीवियों से बड़ा बुद्धिजीवी बना दिया, बस उनकी बुद्धि और ज्ञान की सारी प्रतिबद्धता मेहनतकशों और क्रांति के प्रति थी। सिद्धांत को व्यवहार में बरतने और उतारने के लिए थी।
स्टालिन के व्यक्तित्व, सोवियत समाजवाद के निर्माण और इतिहास में उनकी भूमिका को जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में ज्यादा ठीक तरीके से रखा जा सकता है-
“जब हम मार्शल स्टालिन के विषय में सोचते हैं तो अनेक प्रकार के विचार मन में आते हैं—कम से कम मेरी दृष्टि में—और पिछले पैंतीस वर्षों का इतिहास हमारी आँखों के सामने से गुजर जाता है। हम सब इसी युग की संतान हैं और उससे अनेक रूपों में प्रभावित हुए हैं। हम न केवल इस देश के अपने संघर्षों में सहभागी रहे हैं बल्कि संसार के महान संघर्षों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े रहे हैं और उनसे प्रभावित हुए हैं।
इन पैंतीस वर्षों को जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो अनेक महान व्यक्तित्व सामने आते हैं, परंतु संभवतः कोई भी एक व्यक्ति ऐसा नहीं रहा जिसने इन वर्षों के इतिहास को उतना अधिक गढ़ा, प्रभावित किया और दिशा दी हो जितना कि मार्शल स्टालिन ने।
वह धीरे-धीरे लगभग एक किंवदंती बन गए—कभी रहस्यमय व्यक्ति के रूप में, तो कभी ऐसे व्यक्ति के रूप में जिनका केवल कुछ लोगों से नहीं बल्कि असंख्य लोगों से गहरा और आत्मीय संबंध था। उन्होंने शांति और युद्ध—दोनों में अपनी महानता सिद्ध की। उनमें अदम्य इच्छाशक्ति और साहस था, जैसा बहुत कम लोगों में होता है। संभव है कि जब इतिहास लिखा जाएगा तो उनके बारे में बहुत कुछ कहा जाएगा और भावी पीढ़ियाँ उनके संबंध में विविध प्रकार के मत प्रकट करेंगी।
परंतु एक बात पर कोई असहमति नहीं होगी कि वे एक महान कद-काठी के व्यक्ति थे, ऐसे व्यक्ति जिन्होंने अपने युग की नियति को गढ़ा और दिशा दी—ऐसे व्यक्ति जो चाहे युद्ध में अत्यंत सफल रहे हों, पर अंततः अपनी महान देश-रचना के लिए भी स्मरण किए जाएंगे।”