अली मदीह हाशमी ने अपने नाना फैज अहमद फैज की जीवनी लिखी है ‘‘लव एण्ड रिवोल्यूशन: फैज अहमद फैज’’। इसी का हिंदी अनुवाद ‘‘प्रेम और क्रांति- फैज अहमद फैज’’ के नाम से छपी है। अनुवाद अशोक कुमार ने किया है। सेतु प्रकाशन से छपी यह पुस्तक 400 पेज से थोड़ा अधिक है। इसमें फैज अहमद फैज की कुछ यादगार फोटो हैं जिनसे उनके परिवार से रूबरू हुआ जा सकता है।
यह जीवनी फैज अहमद फैज के उन निजी पक्षों को उजागर करती हुई चलती है जिसमें उनके परिवार के इतिहास का पन्ना खुलता है जो सहारनपुर से चलकर नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर के एक गांव में पनाह लेते हुए बड़ा होता है। बलोच पठानों के बीच एक गरीब परिवार में पैदा हुए उनके पिता ने अपनी पढ़ाई के बल पर परिवार की तकदीर बदल दी। वह अफगान राजा के सहयोगी और फिर उनके एक नुमाइंदे के तौर पर इंग्लैंड गये।
पठानी संस्कृति और अंग्रेजी जीवन के नीति-नियमों के बीच फैज अहमद फैज की परिवरिश हुई। कह सकते हैं उनके जीवन में इस परम्परा और आधुनिकता ने बड़ी भूमिका अदा की। फैज जैसे-जैसे बड़े हो रहे थे अपने आसपास शायरों और उनकी कविताओं की एक पूरी दुनिया देख रहे थे।
इस परिवेश में निश्चित ही इकबाल की उपस्थिति एक नये बयार और आदर्श की तरह थी। अंग्रेजी के यथार्थवादी साहित्य और अपने परिवेश की रूमानियत भरी ने शायरी फैज की शायरी के गढ़न में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
लेकिन, फैज अहमद फैज न रोमांस के कवि हैं, न यथार्थवाद के और न ही इन दो रास्तों के किसी मिलन वाले स्थल के वह कवि हैं। यह सच है कि कविताओं ने फैज का गढ़ा। जैसे जैसे फैज बड़े होते गये फैज ने कविताओं को गढ़ा, उसे आकार दिया, उसे अपने समय का रंग लेकर कहन कहने का रंग दिया और उसे एक ढंग दिया। फैज की कविताएं अपने समय का रंग, उसकी आवाज के साथ साथ फैज के व्यक्तित्व को भी लेकर आईं।
उनकी कविताओं का सम्मोहन शासक वर्ग के लिए इतना असहनीय और घातक था कि वे इन कविताओं को फैज अहमद फैज के बिना देख सकने की स्थिति में नहीं थे।
पाकिस्तान के फौजी तानाशाह जनरल जियाउल हक के सत्ता में आने के समय तक फैज अहमद फैज कराची में थे। संयोग से उस समय उनके पास विदेश जाने का वीजा था। वह वहीं से विदेश यात्रा पर निकल गये। यह निकलना आसान नहीं था, उस समय वह पूछताछ के शिकार हुए थे। फैज जानते थे कि 1950 के दशक की तरह एक बार फिर वे जेल में डाल दिये जाएंगे। उन्होंने फिलीस्तीन जाना तय किया।
फिलीस्तीन अपनी आजादी की लड़ाई के दूसरे दौर में प्रवेश कर चुका था और इजरायल पहले से कहीं अधिक हमलावर हो रहा था। उन्होंने फिलीस्तीन की आवाम के साथ खड़ा होने का रास्ता चुना। इधर पाकिस्तान में फैज की कविताएं इकबाल बानो, फरीदा खानम और उस समय के प्रख्यात अभिनेता महमूद अली खुले मंचों पर गा रहे थे।
उनकी कविताओं की गूंज इतनी अधिक थी कि जियाउल हक जैसा तानाशाह फैज अहमद फैज को ‘घर’ आ जाने की अपील करने लगा। वह भी खुले मंचों पर कहने लगा: ‘फैज को घर लौट आना चाहिए’। वह दौर बेहद भयावह था। फैज अहमद फैज के शब्दों में:
इस वक्त यूं लगता है अब कुछ भी नहीं है
महताब न सूरज, न अंधेरा न सवेरा
आंखों के दरीचों पे किसी हुस्न की चिलमन
और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा।।
फैज अहमद फैज को पाकिस्तान बनने के चंद वर्षों बाद ही ‘मुल्क का गद्दार’ घोषित कर दिया गया। उन पर देशद्रोह का आरोप था। उनके साथ कुछ और लोगों के साथ उनके गहरे दोस्त और भारत के प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सज्जाद जहीर भी थे। भारत और पाकिस्तान बनने के समय उस समय की एकीकृत भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने मुल्क के बंटवारे को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान में कम्युनिस्ट पार्टी के पुनर्निमाण की जिम्मेदारी सज्जाद जहीर को सौंपी थी।
लेकिन, इन पर आरोप पाकिस्तान में सरकार का ‘तख्तापलट’ करने का था। ये अरोप गलत साबित हुए। सभी बाहर आये, लेकिन फैज अहमद फैज को जल्दी ही फौजी तानाशाह ने जेल में डाल दिया।
जेल में फैज बीमार पड़े। उन्हें दांत में काफी तकलीफ थी। उन्हें तांगे से अस्पताल लाया गया। अली मदीह हाशमी की इस जीवनी में यह नहीं बताया गया है कि उन्हें उस तांगे में हथकड़ियां डालकर लाया गया गया था या नहीं। लेकिन, इस घटना को लेकर कई किस्से हैं। पहला तो यही कि उन्हें उस तांगे में हथकड़ियों से जकड़ दिया गया था। दूसरा यह कि उन्हें इस हालात में कोर्ट की पेशी में लाया गया था।
लोगों ने फैज को देखा और थोड़े से लोगों ने पहचाना। यह कहा जाता है कि इसी वाकये पर उन्होंने यह प्रसिद्ध कविता लिखी ‘आज बाजार में पा-ब-जौला चलो’। इसकी कुछ पंक्तियों को पढ़ते चलेंः
जश्म ए नम जान शोरीदा काफी नहीं
तोहमत ए इश्क पोशिदा काफी नहीं
आज बाजार में पा ब जौला चलो
दस्त अफ्शां चलो, मस्त ओ रक्सां चलो
खाक बर सर चलो, खू ब दामा चलो
राह तकता है सब शहर एक जाना चलो/
रख्त ए दिल बांध लो दिलफिगारो चलो
फिर हमी कत्ल हो आयें यारो चला
आज बाजार में पा ब जौला चलो।।
फैज अहमद फैज पर जब देशद्रोह का मुकदमा चल रहा था तब उनकी एक कविता का हवाला दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान बनने के साथ इन दोनों देशों को जो आजादी मिली थी उस पर उन्होंने गहरा सवाल उठाया था। उनकी कविता ‘सुबहे आजादी’ सवाल खड़ी करती हुई एक ऐसी मिनार है जिससे आंख चुराना मुश्किल थाः
ये दाग दाग उजाला, ये शब गजीदा सहर
वे इन्तजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं।।
फैज अहमद फैज कम्युनिस्ट थे, इस बात पर किसी को शक नहीं था। न तो धार्मिक कट्टपंथियों को और न ही सरकार के नुमाइंदों को। लेकिन, पाकिस्तान की हुकूमत को अपने नये बने देश में एक नई तरह की सस्ंकृति का निर्माण भी चाहिए था जो देश को एक नई शक्ल पेश कर सके।
हुकूमतें जानती थीं कि धार्मिक नेताओं के हाथ में इस छोड़ दिया गया तब बेड़ा गर्क हो जाएगा। फैज ने इस दिशा में योगदान देने का फैसला किया और जैसे जैसे इस दिशा में प्रयास किया उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। उन्होंने जुल्फिकार अली भुट्टो के शासन काल में ‘नेशनल आर्ट गैलरी’ और ‘तक्षशिला अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय’ की नींव रखी। उन्होंने तक्षशिला को पुनर्जीवन देने के लिए बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेषों, साहित्य, भाषा के संरक्षण की दिशा में काम करना शुरू किया।
इसके लिए उन्होंने यूनेस्कों मे भी अपना प्रस्ताव प्रस्तुत किया। धर्म से अंधे हो चुके कट्टरपंथियों ने उस समय उनका खूब विरोध किया और उनके खिलाफ कुत्सा प्रचार चलाया। फैज अहमद फैज ने शास्त्रीय संगीत के विकास के लिए संस्थान बनाये। इस दिशा में शहीद भगत सिंह के साथी ख्वाजा खुर्शीद अनवर, जो खुद एक बड़े संगीतकार थे, ने उनका खूब सहयोग किया। उनके इस कामों के दौरान उनके कई करीबी भी उन पर ‘सरकार के साथ मिलकर काम’ करने का आरोप लगाया।
उन पर ‘राष्ट्रवादी’ होने का आरोप भी लगा। ये बात कहते समय यह याद रखना भी जरूरी है कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच हुए 1965 के युद्ध का खुलकर विरोध किया था। जाहिर सी बात है कि यह विरोध उन्होंने पाकिस्तान में रहते हुए किया था
उन्होंने 1970 के समय में पूर्वी पाकिस्तान में इस्लामाबाद की ओर से की जा रही कार्यवाहियों का कड़ा विरोध किया। और, बांग्लादेश बन जाने के बाद उसे सिर्फ सहज स्वीकार ही नहीं किया, एक बार फिर से बंधुत्व का संदेश लेकर उस देश को गये और बेहद मार्मिक कविता लिखीः
थे बहुत बेदर्द लम्हें खत्म ए दर्द ए इश्क के
थीं बहुत बेमहर सुबहें मेहरबां रातों के बाद
डनसे जो कहने गये थे ‘फैज’ जां सदके किये
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद/
हम तो ठहरे अजनबी इतने मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आश्ना कितनी मुलाकातों के बाद।।
अली मदीह हाशमी ने फैज के धार्मिक विचारों और उसके व्यवहार को लेकर एक अलग से अध्याय लिखा है। इस मसले पर आम तौर पर चुप्पी रखी जाती है। उन्होंने हवाला देकर बताया है कि फैज खुद को रूमी का तरफदार बताते थे और खुद को रूमी के मजहब से जोड़ते थे। वह सूफी मजारों पर जाते थे और इसे अपनी संस्कृति का हिस्सा बताते थे।
फैज अहमद फैज पाकिस्तान के सबसे बड़े अखबार ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के संपादक बने और यह अखबार देखते-देखते आवाम की आवाज में बदल गया। इसने पत्रकारिता को एक नई ऊंचाई दी और शानदार पत्रकारों की परिवरिश दिया। जब फैज को जेल में डाला गया तब इस अखबार के दफ्तर पर छापा पड़ा और इसे बंद कर दिया गया।
बाद में इस अखबार के मालिक ने सरकार से समझौते का रूख लिया और यह अखबार दुबारा शुरू हुआ। लेकिन, फैज की पत्रकारिता ने एक नया मुकाम बना दिया था जिस दुबारा हासिल करना भी हुकूमत के साथ जंग लड़ने जैसा था।
फैज की कविताओं में न तो आदर्शवाद दिखता है और न ही हताशा से भरी पलायन की मानसिकता। उनका साफ मानना था कि आप आदर्शवाद पर जितना ही जोर देते हैं उतना ही आप संकीर्ण होते जाते हैं और जितना ही इससे दूर जाते हैं उतना ही पतित होते जाते हैं। ये दोनों ही बुरे हैं।
वह यथार्थ को रूमानियत की भाषा में लेकर आते हैं। उनकी कविताओं की बाहरी सतह पर रोमांस की रंगीनी सजी होती है और उसके भीतर उतरते हुए आप यथार्थ की ठोस जमीन खड़े होते हुए दिखते हैं। इसकी बानगी उनकी ‘हम देखेंगे’ कविता में खूब दिखती हैः
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका जिसका वादा है
जो लौह ए अजल में लिक्खा है
जब जुल्म ओ सितम के कोह ए गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल एक हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी।।
यह कविता आवाम को आवाज लगाते हुए बढ़ती है। यह कविता अपने शब्दों में जिस तरह की धमक पैदा करती है और पूरा परिदृश्य खड़ा करती है उसे आज भी हाल ही में हुए हुकूमतों की तानाशाही के खिलाफ आंदोलनों में देखा जा सकता है। यह कविता आने वाले समय की परिकल्पना नहीं थी। यह उनके अपने समय की ठोस जमीन से सृजित कविता थी।
किसी भी कवि के बारे में बात करते हुए उसकी रचना प्रक्रिया पर बात न करना उसे अधूरा छोड़ देने जैसा है। फैज ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में खुद ही लिखा है।
इसे हम इस पुस्तक से प्रस्तुत कर रहे हैंः ‘‘यह कोई एक रूप नहीं लेती। उन कविताओं को ले लीजिए, जो मैंने जेल में लिखीं। जाहिर है कि उस समय जो विषय मेेरे दिमाग में गूंज रहा था वह जेल की कोठरी का था, और यह इस तरह शुरू हुई- ‘निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन कि जहां …’। यह लाइन पहले आयी … दिमाग में एक अस्पष्ट सी बेचैनी शुरू हो गयी। एक मिसरा, या धुन या कोई सूत्र दिमाग में उभरता है और फिर उसके इर्दगिर्द नज्म बुनना शुरू हो जाता है।
पूरा स्वरूप एक बार में नहीं उभरता … कुछ समय बाद एक पैटर्न ठोस आकार लेने लगता है। एक तरह से यह एक सजग प्रक्रिया है। फिर इसके बाद इसे कई तरह से लिखा जाता है। गज़ल ज्यादा सीमित विधा है। यह इस पर लागू नहीं होता। मैं नज़्म की बात कर रहा हूं। गजल में ऐसी कोई बात नहीं होती, इसके लिए लय ज्यादा अहम है।
लेकिन नज़्म में ऐसा होता है कि आप कई मिसरे लिख डालते हैं। एक ढांचा बनाते हें, फिर दूसरा, और भी बनाते जाते हैं लगातार, इसके बाद विषय का विस्तार अपने आप तय हो जाता है और कभी कभी ऐसा होता है कि आप जो मुद्दा लेकर चलते हैं वह लिखने के दौरान दो बार, तीन बार बदल जाता है।
ऐसा इसलिए होता है कि आपने एक खास तरह से लिखने की योजना बनाई थी और फिर आपको लगता है कि यह बाकी से मेल नहीं खा रहा है … दिमाग में कोई विषय होता है लेकिन यह जो अंतिम स्वरूप लेता है वह शब्दों के साथ बदलता जाता है क्योंकि शब्द एक हद तक स्वायत्त होते हैं। कई बार वे हमारे काबू में नहीं होते है और वे ही तय करते हैं कि विषय किसी रूप में अभिव्यक्त होगा।(पृष्ठ: 395-96)।’’
विषय और शब्द के बीच की इस अंतक्रिया में लेखक सिर्फ यथार्थ का चुनाव ही नहीं करता है उसे परम्पराओं, शब्दों के साथ बंधकर चलना भी होता है। यह खूंटे की बंधन नहीं है। यह अपने परिवेश की देय स्थितियां हैं। रचना प्रक्रिया में शब्द जितना रूप देते हैं लेखक उसे उतना ही अंतर्वस्तु देता है। इस संदर्भ में ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग’ पढ़ना एक नये अर्थ की ओर ले जाता है।
अंत में। फैज अहमद फैज ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ‘फासीवाद के खिलाफ जनयुद्ध’ के नारे का पुरजोर समर्थन किया। वह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ थे। उन्होंने इस ‘जनयुद्ध’ में अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट बिरादरी द्वारा दिये गये आह्वान का शब्दशः पालन किया। वह ब्रिटिश राज की सेना में शामिल हो गये।
उन्हें रावलपिंडी और दिल्ली में मीडिया से जुड़ा कार्यभार सौंपा गया और कर्नल के पद से नवाजा गया। वह दुनिया में फासीवाद को हराने और सोवियत संघ की रक्षा में खड़ा होने के विचार पर चल रहे थे। सोवियत संघ ने हिटलर और फासिस्ट हुकूमतों के खिलाफ भारी जीत दर्ज की। हिटलर का खात्मा हो चुका था। वह फौज से बाहर हो गये। लेकिन, तब तक भारत-पाकिस्तान के बंटवारा सामने आ चुका था।
इस बंटवारे की विभिषिका के दौरान उन्होंने वही रूख अख्त्यिार किया जो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने तय किया। वह ताउम्र फौज में शामिल होने के सही होने पर टिके रहे। फैज अहमद फैज अपने समय पर अपने पैरों की गहरी छाप छोड़ गये जिसे आज भी आसानी से पढ़ा जा सकता है, लेकिन जिस पर चलना उतना ही चुनौतीपूर्ण है जितना उन्होंने इसे देखा और उससे जूझते हुए वह मौत के दम तक चलते रहे।
फैज अहमद फैज
लेखक: अली मदीह हाशमी
हिंदी अनुवाद: अशोक कुमार
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन, दिल्ली-92
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