तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि देश में अब ईवीएम के बजाय ‘सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम’ के जरिए वोटर लिस्ट में हेरफेर कर वोट चोरी की जा रही है।
अभिषेक बनर्जी ने कहा कि टीएमसी के 10 सांसदों और पश्चिम बंगाल सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की और करीब ढाई घंटे बातचीत की। इस दौरान उठाए गए सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाया।
उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार आप मनोनीत हैं, जबकि हम निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। हम किसी के दास या गुलाम नहीं हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा हमला करते हुए कहा कि उन्हें इस संस्था और देश को बर्बाद करने के मिशन पर भेजा गया है । उन्होंने ढाई घंटे चली बैठक की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की चुनौती भी दी और दावा किया कि बैठक में वही बोलते रहे।
पश्चिम बंगाल में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया को लेकर टीएमसी और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं। इस प्रक्रिया के तहत अब तक 58.2 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। इसी को लेकर टीएमसी का 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल, अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में, नई दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मिला।
बुधवार को तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की चुनाव आयोग के साथ एसआईआर के मुद्दे पर ढाई घंटे बैठक हुई । इस दौरान केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए । उन्होंने कहा, ‘पिछली बार जो पांच सवाल पूछे थे, उनका जवाब नहीं मिला है । दो तीन मुद्दों को छोड़कर किसी का जवाब नहीं मिला । एक करोड़ 36 लाख लोगों का नाम संदेह में है, हमने उसको लेकर सवाल पूछा, लेकिन उसकी लिस्ट अब तक नहीं दी गई ।.’
उन्होंने कहा, ’60 से ऊपर जिसकी उम्र है और बीमार है, उसको भी चुनाव आयोग के दफ्तर में ना बुलाकर, उसके घर भी जाकर वेरिफिकेशन किया जा सकता है । जो बीजेपी की तरफ से आरोप लगाया जा रहा है, कहा जाता है 1 करोड़ रोहिंग्या और बांग्लादेशी है, 58 लाख जो नाम हटाए जा रहे हैं, उसमें कितने बांग्लादेशी और रोहिंग्या हैं?, इसका जवाब मांगा है । ‘
उन्होंने कहा, ‘ईआरओसे बिना पूछे जो नाम हटाए जा रहे हैं । उस पर सवाल पूछा कि जिस फार्म नहीं भरा उसका नाम हटाना चाहिए, लेकिन जिसने फॉर्म भरा उसका नाम कैसे डिलीट हो रहा है?’
अभिषेक बनर्जी ने कहा, ‘जिसको चुनाव कराना आता है, वो वोटर लिस्ट में चोरी कर रहा है. वोटर लिस्ट में चोरी हो रही है । अगर कांग्रेस ने ये पकड़ लिया होता तो हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार चारों जगह भाजपा हारती । सरकार, सरकारी सर्कुलर और नोटिफिकेशन से चलती है, लेकिन भारत सरकार भारत को वॉट्सएप से चलाना चाहती है ।
उन्होंने कहा, ‘चुनाव आयोग देश को चुनाव आयोग से चलाना चाहता है। ये कोई नोटिफिकेशन इसलिए जारी नहीं करना चाहते क्योंकि ये जानते हैं कि ऐसा करने के बाद सारी राजनीतिक पार्टियों को उसे कोर्ट में ले जाने का और चुनौती देने का अधिकार है ।
उन्होंने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बनने से पहले कोऑपरेटिव मंत्रालय में कोऑपरेटिव सचिव थे । अचानक उनको मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया जाता है । उनको यहां भेजा गया जिससे कि वह देश को बर्बाद कर सकें. इस संवैधानिक संस्था को बर्बाद कर सकें।
उन्होंने कहा, ‘इससे पहले कभी मतदाताओं को संदेह के घेरे में नहीं डाला गया था । पहले वोटर तय करता था कि सरकार किसकी बनेगी प्रधानमंत्री कौन बनेगा, लेकिन अब सरकार और प्रधानमंत्री तय करते हैं कि कौन वोटर बनेगा ।
पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर बढ़े सियासी टकराव के बीच अब चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर सख्त रुख अपनाया है । टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के तीखे आरोपों और चुनाव आयोग पर लगाए गए हमलों के बाद आयोग ने साफ शब्दों में कहा है कि चुनावी ड्यूटी में लगे किसी भी कर्मचारी को धमकाने या डराने की कोशिश बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी ।
चुनाव आयोग का यह पलटवार ऐसे वक्त आया है, जब टीएमसी प्रतिनिधिमंडल और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच हुई ढाई घंटे लंबी बैठक के बाद बयानबाजी तेज हो गई है । एक तरफ अभिषेक बनर्जी वोटर लिस्ट को ‘हथियार’ बनाए जाने का आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर जोर देते हुए सख्त चेतावनी जारी की है ।
इस बीच रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसका डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर दोषपूर्ण है और इसे 2023 के बाद इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। लेकिन अब, 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची की विशेष गहन संशोधन (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन – एसआईआर) प्रक्रिया के बीच में ही आयोग ने इस सॉफ्टवेयर को फिर से सक्रिय कर दिया है। साथ ही, एक दूसरा अज्ञात एल्गोरिदम भी लागू किया गया है, जो मतदाताओं की मैपिंग करता है।
दोनों ही मामलों में कोई लिखित प्रोटोकॉल, मैनुअल या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया (एसओपी) जारी नहीं की गई है। ईसीआई का ऐसा झूठ लगातार पकड़ा जा रहा है लेकिन वो अपने ढंग से सफाई पेश कर देता है। बीएलओ मामले में ही उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़े, जब अंतिम तारीख को दो बार बदलना पड़ा।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट में कहा गया है कि नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट को ईसीआई ने बताया था कि डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर की सटीकता बदलती रहती है और यह प्रभावी नहीं है। आयोग ने मैनुअल तरीके से बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) पर निर्भर रहने का फैसला किया था। लेकिन नवंबर के अंत में, एसआईआर के चौथे सप्ताह में, इस सॉफ्टवेयर को फिर से चालू कर दिया गया। इसमें मैनुअल में बताई गई कड़ी ग्राउंड वेरिफिकेशन प्रक्रिया को भी छोड़ दिया गया। अब बीएलओ अपनी जानकारी के आधार पर एंट्री को ‘वेरिफाइड’ या ‘अनकलेक्टेबल’ मार्क कर रहे हैं, बिना किसी लिखित दिशानिर्देश के।
इसके अलावा, एक दूसरा एल्गोरिदम मतदाताओं को 2002-2004 की पुरानी मतदाता सूची से जोड़ने (मैपिंग) के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यह ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसे नाम में अंतर, उम्र में असंगति आदि को फ्लैग करता है। दिसंबर 18-20 के आसपास उत्तर प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बीएलओ ऐप पर ऐसी सूचियां आने लगीं, जब ड्राफ्ट मतदाता सूची की डेडलाइन नजदीक थी। उत्तर प्रदेश में इस कारण ड्राफ्ट सूची प्रकाशन की तारीख 31 दिसंबर तक बढ़ा दी गई।
यूपी में एक जिला चुनाव अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “एसआईआर के हर दिन बीएलओ ऐप पर नए टेक प्रोटोकॉल और सूचियां आ रही थीं। इससे लगता है कि एल्गोरिदम चलाते समय ईसीआई की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी।” एक अन्य अधिकारी ने बताया कि डुप्लीकेट मामलों को बीएलओ “जैसा ठीक समझें” हल कर रहे हैं, बिना फील्ड वेरिफिकेशन या मतदाता को नोटिस के।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अक्टूबर 2025 में एसआईआर की घोषणा करते हुए कहा था कि डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं होगा। लेकिन अब इन एल्गोरिदम के अचानक इस्तेमाल से अफरातफरी मच गई है। एसआईआर में अब तक 11 राज्यों में 86.46 लाख लोग ‘अनमैप्ड’ चिह्नित हो चुके हैं और 3.7 करोड़ नाम ड्राफ्ट सूची से हटा दिए गए हैं।
चुनाव आयोग ने प्रोटोकॉल की कॉपी मांगने पर कोई जवाब नहीं दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि बिना पारदर्शिता के ऐसे एल्गोरिदम का इस्तेमाल मतदाता सूची की अखंडता और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाता है। एसआईआर प्रक्रिया अभी जारी है और इसके परिणाम आने वाले चुनावों पर असर डाल सकते हैं।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट के अनुसार, ईसीआई ने 12 राज्यों में मतदाता सूचियों के संशोधन के दौरान बीच में ही एक दूसरा एल्गोरिदम-आधारित सॉफ्टवेयर सक्रिय कर दिया है। यह भी बिना किसी लिखित निर्देश, नियमावली, रिकॉर्ड में दर्ज मानक संचालन प्रक्रियाओं या नागरिकों को सूचना दिए बिना किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार चूंकि एल्गोरिदम को अंतिम समय में लागू किया गया था, इसलिए पुन: सत्यापन के लिए कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल या चेकलिस्ट स्थापित नहीं की गई थी, जिससे बूथ-स्तरीय अधिकारियों और चुनावी पंजीकरण अधिकारियों को चिह्नित त्रुटियों को हल करने के लिए मशक्कत करनी पड़ी।
बिना किसी प्रोटोकॉल के अलिखित एल्गोरिदम के उपयोग से अस्पष्टता और अराजकता की एक और परत जुड़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने ईसीआई को पत्र लिखकर इन सॉफ्टवेयरों के उपयोग से संबंधित सभी लिखित निर्देशों और प्रोटोकॉल की प्रतियां मांगीं। ईसीआई ने कोई जवाब नहीं दिया।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)