‘हिमालय दलित है’-1: दलित, जिसके नाम को ही बना दिया गया गाली 

(‘हिमालय दलित है’ कवि और साहित्यकार मोहन मुक्त का बेहद चर्चित काव्य संग्रह है। इसकी समीक्षा कई पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में प्रकाशित हो चुकी है। जनचौक ने भी इसके प्रकाशन के समय एक समीक्षा प्रकाशित की थी। इस बीच दरभंगा स्थित मिथिला विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के एक शोध छात्र रूपक कुमार ने भी एक समीक्षा लिखी है। जिसको यहां दो हिस्सों में दिया जा रहा है-संपादक)

शोध सारांश: भारतीय समाज के लिए सबसे कड़वा सच यह है कि यह जाति-प्रधान समाज है। इसी जाति व्यवस्था को तोड़ने के लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अथक प्रयास किए और इसके लिए उन्होंने संघर्ष भी किए एवं उन्होंने ‘जाति का विनाश’ नामक पुस्तक भी लिखी। इसके बावजूद कई दशकों बाद भी आज भारतीय समाज जाति से मुक्त नहीं हो पाया है। भारतीय समाज को जाति व्यवस्था से मुक्त करने के लिए और सभी को समान रूप से रहने के साथ आजादी से जीवन जीने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने संविधान का निर्माण किया। भारतीय समाज को जाति व्यवस्था से मुक्त करने के लिए और समता, समानता एवं भाईचारे के साथ रहने के लिए बुद्ध से लेकर कबीर, रैदास, फुले, पेरियार, भगत सिंह आदि महापुरुषों ने विद्रोह किए तथा कई लड़ाइयाँ लड़ीं।

दलितों की पीड़ा एवं उनकी अभिव्यक्ति को सदियों तक साहित्य में जगह नहीं मिली, जिस पीड़ा को दलित ने दिन-रात, सोते-जागते, उठते-बैठते यहाँ तक कि जीवनभर भोगते रहे। सदियों से दलितों को स्वर्णों के इशारे पर जीवन जीने को विवश किया गया। समाज में स्वर्णों और धर्मग्रंथों ने दलितों को बस्ती से बेदखल रखा और उनके दर्द एवं पीड़ा को साहित्य के दायरे से बाहर रखकर यथार्थ को दूर रखा या इस यथार्थ को कलमबद्ध नहीं किया तथा नहीं करने दिया। विद्वान कहते हैं कि “साहित्य समाज का दर्पण होता है।” बाद में अगर कुछ साहित्यकारों ने उस दर्द को बयाँ किया भी तो उसे अपशिष्ट साहित्य कहकर मुख्य धारा से बाहर रखा। हिंदी के वरिष्ठ आलोचक रामचन्द्र शुक्ल ने समाज सुधारक, सामाजिक चिंतक और क्रांतिकारी कवि कबीर को भी ऊटपटाँग भाषा कहकर मुख्य साहित्य से अलग कर दिया।

बीज शब्द: ब्राह्मणवादी, मनुवादी, सामंती, तानाशाही, पितृसत्तात्मक, वर्चस्ववादी, भेदभाव, मानवता, दलित, संस्कृति, साहित्य, समाज।

भारतीय समाज की सच्चाई है जाति व्यवस्था। तमाम हिंदू संस्कृति तथा धार्मिक ग्रंथ देखने से पता चलता है कि समाज को चार वर्णों में बाँटा हुआ है और कई जातियों में बाँटा हुआ है। भारतीय समाज में हर जाति वाले अपने से नीचे की जाति वाले को खोज लेते हैं, इसे ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। इस समाज में अगर किसी जाति के साथ सबसे ज्यादा अमानवीय सुलूक, भेदभाव, छुआछूत जैसा व्यवहार हुआ है तो वह है दलित। ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था में दलितों के साथ पिछड़ों का भी यही हाल है, लेकिन दलितों के साथ हद से भी ज्यादा अमानवीय सुलूक किया गया है और यह जाति व्यवस्था सदियों से लेकर अभी तक चली आ रही है। आए दिन हम देखते रहते हैं कि दलितों के साथ किस-किस तरह अमानवीय सुलूक किया जाता है और उन्हें कैसे-कैसे प्रताड़ित किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों में स्त्री का भी स्थान दलित के समान ही है।

इस ब्राह्मणवादी, मनुवादी व्यवस्था में श्रेष्ठ और सभ्य तो वो हैं जो सिर्फ स्वर्ण हैं। तमाम समाज सुधारकों के निरंतर प्रयास करने के बावजूद भी भारतीय समाज में यह जाति व्यवस्था खत्म नहीं हो पाई है। कारण है कि यह ब्राह्मणवादी व्यवस्था जाल की तरह फैली हुई है। इसका पोषक कदम-कदम पर है। भारतीय समाज और देश की बेहतरी के लिए बुद्ध, कबीर, फुले, पेरियार, भगत सिंह, डॉ. भीमराव अम्बेडकर आदि समाज सुधारकों ने कठिन संघर्ष, मेहनत एवं प्रयास किए, जिनके बावजूद मामूली सुधार ही हो पाया है। उन्हीं सभी महापुरुषों और समाज सुधारकों की मेहनत का परिणाम है जो आज भारतीय समाज में दलित, स्त्री और अन्य शोषित वर्ग अपने हक और अधिकार को जान पाए हैं। मगर हाल के कुछ वर्षों में ब्राह्मणवादी, मनुवादी व्यवस्था को मजबूती प्रदान की जा रही है।

‘हिमालय दलित है’ मोहन मुक्ति का कविता-संग्रह है जिसमें कवि जनपक्ष की बात करते हैं और शोषितों-पीड़ितों की आवाज को बुलंद करते हैं। यह प्रतिरोध की परंपरा का प्रमाणिक और साक्ष्य के रूप में ऐतिहासिक दस्तावेज है, जो ब्राह्मणवाद, वर्चस्ववाद, सामंतवाद, जातिगत श्रेष्ठता की परंपरा को चुनौती देता है। मोहन मुक्ति साहित्य के मठाधीशों, समाज के सभ्य लोगों, जातीय श्रेष्ठताबोध, सवर्णवादी, सामंती वर्चस्वों, पितृसत्तात्मक सोच और विचार का न सिर्फ पर्दाफाश कर रहे हैं बल्कि उनकी रेशे-रेशे कर धज्जियाँ भी अपनी कविता और विचारों के माध्यम से उड़ाते हैं तथा उस विचार को चुनौती भी देते हैं। उसे जड़ से खत्म करने के लिए एक सशक्त माध्यम भी देते हैं। इसमें ‘हिमालय दलित है’ शीर्षक कविता में मोहन मुक्ति लिखते हैं—

“कहते हैं ईश्वर का घर है पवित्र है

मैं कहता हूँ दलित है

गुस्से में काँपते हैं पूछते हैं कैसे?

मेरा जवाब

अगर इंसान दलित हो सकते हैं

तो पहाड़ क्या चीज है”¹

इसमें जो पहाड़ प्रतीकात्मक रूप से लिया गया है। हिमालय जिसे हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में पवित्र माना जाता है जहाँ देवता यानी भगवान शिव निवास करते हैं। महाभारत में इसे आध्यात्मिक शक्ति के केंद्र के रूप में भी देखा गया है और जब युद्ध खत्म होने के बाद पांडव स्वर्ग प्राप्ति के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं।

तमाम हिंदू ग्रंथों में देवी-देवताओं को मिथक या काल्पनिक रूप देकर या उसे आधार बनाकर ये धार्मिक ग्रंथ लिखे गए। प्राचीन दौर में अगर देखें तो खासकर मनुस्मृति, रामचरितमानस आदि को देखते हैं तो इसमें दलितों के साथ अत्याचार, अमानवीय व्यवहार, छुआछूत का शिकार बनाने के उपदेश दिए गए हैं। दलितों को समाज में सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, शिक्षा, सम्मान, आजादी आदि तमाम विचारों और जरूरतों से, जो एक मानव के लिए जरूरी हैं, उनसे एक साजिश की तरह दूर रखा। ब्राह्मणवादी, मनुवादी व्यवस्था ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को चार वर्णों में बाँटकर विषमता की गहरी खाई खोद दी और यह खाई अभी तक नहीं भरी जा सकी है। समाज से ये सब तमाम असमानता, विषमता, भेदभाव, छुआछूत आदि व्याप्त हैं, ना जाने ये कब दूर होंगे!

हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में इतना तक लिखा हुआ है कि यदि ये दलित लोग धर्मग्रंथ के श्लोक को सुन लें तो उसके कान में शीशा पिघलाकर डाल देना चाहिए, अगर श्लोक का उच्चारण कर लें तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए। इनके साथ अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार हद पार तक किया गया। रास्ते में यदि स्वर्ण चल रहा हो तो उस रास्ते पर दलितों को चलना पूर्ण प्रतिबंधित था। इस हिन्दू धर्मग्रंथ में दलितों का स्थान सिर्फ सेवा और जुल्म सहने के लिए रखा है।

अपना वर्चस्व स्थापित करने और शोषण करने के लिए सिर्फ दलित को रखा है। इसके सामाजिक अवस्था को अगर देखा जाए तो देश की आजादी के पूर्व से लेकर आजादी के कुछ दशक बाद भी बल्कि आज तक समाज में दलितों का स्थान एक अछूत का ही है, उन्हें गाँव के बाहर बसाया गया। मोहन मुक्ति ने अपनी तीखी भाषा-शैली से उत्पीड़न की आवाज को बुलंद किया है और अपनी लेखनी से साहित्य में एक चुनौती के साथ दलितों और शोषितों के विमर्श को मजबूत किया है। दलित शब्द का प्रयोग समाज में उन तमाम लोगों के लिए किया जाता है, जिनका सदियों से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रूप से शोषण हुआ है यानी जिन्हें अछूत माना जाता रहा है एवं समाज में उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया था।

संस्कृत ग्रंथों की रचना का मतलब और उद्देश्य था समाज को चार वर्णों में बाँटकर रखना। यही धर्म और धर्मग्रंथ कहता है कि शूद्र अछूत है, नीच है। इसी धार्मिक ग्रंथ में स्वर्णों को दलितों को छूने से पाप लगता है और धर्म भ्रष्ट हो जाता है। “जाति का विनाश” शीर्षक से डॉ. अम्बेडकर जी ने 1936 में एक किताब लिखी। इस पुस्तक को निरंतर पढ़ने की जरूरत है और इसमें कही गई बातों एवं विचारों को जीवन में अमल करने की जरूरत है।

दलित शब्द मुख्यतः भारत में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े सदियों से समुदायों को उल्लेखित करता है। दलित शब्द का अर्थ देखें तो इसका अर्थ होता है—दबा हुआ, कुचला हुआ, दबाया हुआ यानी जो हाशिए पर, जो समाज की सामाजिक संरचना में हाशिए पर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जिन्हें सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। “दलित पैंथर के घोषणा-पत्र में दलित की यह परिभाषा दी गई है—दलित कौन हैं? अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बौद्ध, श्रमिक जनता, कामगार, भूमिहीन गरीब किसान, घुमंतू जनजाति, आदिवासी”²।

जिन्हें समाज में हर प्रकार से शोषण किया गया हो। कुछ का मानना है “जिसके पैर न फटी बिवाई हो वह क्या जाने पीर पराई।” मेरी दृष्टि में समाज में वो दलित हैं जिनके साथ सदियों से छुआछूत और भेदभाव का व्यवहार किया गया और किया जा रहा है, जो गाँव एवं शहर की बस्ती से एकदम बाहर नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। संविधान में जिन्हें ‘अनुसूचित जाति’ कहा गया है, वे दलित हैं। भारतीय समाज की चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था में हाशिए पर व सबसे निचले पायदान के व्यक्ति हैं जिनके साथ घोर अन्याय, अमानुषिक व्यवहार व अत्याचार स्वर्णों द्वारा किए गए हैं।

जिसकी दास्ताँ भले ही इतिहास के पन्नों पर दर्ज न हुई हो, लेकिन आधुनिक युग में जब ज्ञान और विज्ञान की आँधी चली, तो सदियों से संतप्त मानवता को अपने हक और अधिकारों का अहसास हुआ। दलित साहित्य की पहचान को अगर देखें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि दलित वर्ग की पीड़ा पर आधारित है। हिंदी साहित्य में प्रेमचंद, नागार्जुन और राहुल सांकृत्यायन, अमृतलाल नागर जैसे प्रगतिशील लेखकों ने गहरी संवेदना से साहित्य की रचना की और इस वर्ग की व्यथा मुखरित की। किंतु यह भी सत्य है कि दलित साहित्य को सही पहचान दलित वर्ग में जन्मे लेखकों ने दी।

दलित चिंतक कँवल भारती का मानना है कि “दलित साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से है, जिसमें दलितों ने स्वयं अपनी पीड़ा को रूपायित किया है। अपने जीवन-संघर्ष में दलितों ने जिस यथार्थ को भोगा है, दलित साहित्य उनकी उसी अभिव्यक्ति का साहित्य है। यह कला के लिए कला नहीं, बल्कि जीवन का और जीवन की जिजीविषा का साहित्य है। इसीलिए कहना न होगा कि वास्तव में दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य की कोटि में आता है।”³ और दलित लेखक तथा चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि का विचार है कि “दलित साहित्य जन साहित्य है, यानी मास लिटरेचर (MASS LITERATURE)। सिर्फ इतना ही नहीं; लिटरेचर ऑफ एक्शन (literature of action) भी है, जो मानवीय मूल्यों की भूमिका पर सामंती मानसिकता के विरुद्ध आक्रोशजनित संघर्ष है। इसी संघर्ष और विद्रोह से उपजा है दलित साहित्य।”⁴

तथा दलित साहित्य के संबंध में शरण कुमार लिंबाले का कहना है— “दलितों का दुख, परेशानी, गुलामी, अधःपतन और उपहास के साथ ही दरिद्रता का कलात्मक शैली से चित्रण करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है। आँह का उदात्त स्वरूप, अर्थात् साहित्य। हर एक मनुष्य को स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और भयमुक्त सुरक्षा मिलनी चाहिए, इसी पृष्ठभूमि पर निर्मित एक प्रवृत्ति साहित्य में अभिव्यक्त हो रही है। इस प्रवृत्ति का नाम दलित साहित्य है। दलित साहित्य मनुष्य को केंद्र मानता है। मनुष्य के सुख-दुख से समरस होता है। मनुष्य को महान मानता है। मनुष्य को सम्यक् क्रांति की ओर ले जाता है।”⁵

संविधान में दलितों को पढ़ने-लिखने और आम आदमी जैसा स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार मिला तथा उसके बाद से दलित साहित्य लिखा जाने लगा या पहचान में आया। दलितों का साहित्य यथार्थ का साहित्य है, दलितों पर सदियों से हो रहे अत्याचार और शोषण को दर्ज किया है। दलितों का साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है। इसने अपने प्रतिरोध को शब्दों के माध्यम से दर्ज किया है। सामाजिक कुरूतियों, असमानताओं, शोषण-उत्पीड़न पर मुक्तिबोध की ये कविता बहुत तीखा और करारा प्रहार करती है। नारी मुक्ति, दलित मुक्ति, मानवीयता के तमाम बाधकों और व्यवस्था पर प्रहार करते हुए मुक्तिबोध कहते हैं—

“अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे।

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार

तब कहीं देखने को मिलेंगी हमको”⁶

इसी अभिव्यक्ति के खतरे को उठाकर दलितों ने वर्ण व्यवस्था के मठों व गढ़ों को तोड़ने का काम किया। अपनी असहनीय पीड़ा, दर्द और वेदना को प्रकट किया। जिसकी परिणिति दलित साहित्य के रूप में हुई है। इसी क्रम में डॉ. सी. बी. भारती का कहना है कि “दलित साहित्य लेखन दलित-अस्मिता की तलाश है, यह सामाजिक परीक्षण व उनके छिन्न-भिन्न कर देने की एक अनबुझी प्यास है। वर्ण-व्यवस्था से उपजी अमानवीय त्रासदी से मुक्ति की छटपटाहट ही दलित साहित्य का मूल स्वर है। जाति-विहीन, वर्ग-विहीन समाज की संरचना ही इसका मूल प्रतिपाद्य है।”⁷ सदियों से दलित भारतीय समाज में यातना शिविर में अपना जीवन जीने को विवश रहे हैं, जहाँ उनके लिए दुःख और अपमान के अलावा कुछ भी नहीं रहा है।

इसलिए “दलित साहित्य उन अछूतों का साहित्य है, जिन्हें सामाजिक स्तर पर सम्मान नहीं मिला। सामाजिक स्तर पर जाति भेद के जो लोग शिकार हुए हैं, उनकी छटपटाहट ही शब्दबद्ध होकर दलित साहित्य बन रही है।”⁸ दलितों की स्थिति अगर देखें तो आज भी कदम-कदम पर निरंतर शोषण हो रहा है। वह क्षण-क्षण शोषित और प्रताड़ित हो रहा है। रूढ़ि परंपरा के नाम पर तो कभी धर्म का भय दिखाकर दलितों का खून चूसा जा रहा है। समाज में अगर दलितों की स्थिति को देखें तो एक बैल के समान है जो निरंतर मेहनत करने के बावजूद भी उसे कुछ नहीं मिलता, वही हाल आज भी है। लगातार मेहनत और कठिन परिश्रम करने के बावजूद भी यही हाल है। ये लोग उस काम को करने पर आज भी मजबूर हैं और वो काम करते भी हैं, जो समाज के लोग करना पसंद नहीं करते, फिर भी इनका जीवन अभावग्रस्त ही है। न उन्हें भरपेट खाने के लिए रोटी मिल पाती है न तन ढकने के लिए कपड़ा मिल पाता है। अधिकांश दलितों की यही स्थिति है। वर्ण, जाति व्यवस्था भारतीय समाज की धुरी है और व्यक्तिगत संबंधों को भी नियंत्रित करती है।

प्रेमचंद लिखते हैं कि “जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है चाहे वह व्यक्ति हो या समूह। उनकी वकालत करना साहित्यकार का दायित्व है।”⁹ दलित की समस्याओं को अपनी रचना में जगह देने वाले हिंदी के महान कथा सम्राट प्रेमचंद ने अपनी महान कृति ‘गोदान’ (1936) में भी इस जाति व्यवस्था का जिक्र किया है। भारत देश में जो समस्याएँ थीं जिनमें महाजनी सभ्यता, गरीबी, शिक्षा, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक और जातीय समस्याओं के साथ दलित समस्याओं को भी उन्होंने जगह दी है। धर्म के नाम पर और नरक का डर दिखाकर एवं स्वर्ग की लालच देकर तथा मोक्ष की काल्पनिक बात करके दलितों का शोषण हुआ है। दान करने वाली प्रथा को देख सकते हैं। दान यानी मनुष्य को मोक्ष के लिए ब्राह्मण को दान करना पड़ेगा तभी उसका यह मनुष्य जीवन सफल होगा और ऐसा करने के बाद ही उसे मोक्ष मिलेगा। यह बात छोटी है मगर जीवन में उतारने पर यह बहुत बड़ी बात है। जिससे भारतीय समाज आज तक भी पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो पाया है।

‘गोदान’ उपन्यास में ‘गोदान प्रथा’ को लेकर ही होरी का जीवन नष्ट हो जाता है। होरी के साथ उसके परिवार की भी स्थिति बद से बदतर हो जाती है। ब्राह्मण की चालाकी और साजिश का शिकार भोले-भाले अज्ञानी लोग हो रहे हैं। इस उपन्यास में हम देखते हैं कि दलित पात्र और परिवार का चित्रण मिलता है। सिलिया और उसके पिता हरखू हैं। सिलिया (दलित) और मातादीन (उच्च वर्ण यानी ब्राह्मण) के बीच के प्रेम प्रसंग की बात है। इन दोनों को एक होने के लिए बीच में जाति आग की तरह है जो दोनों को एक होने नहीं दे रही है यानी जाति की वजह से एक नहीं हो पा रहे हैं, एक होना बहुत मुश्किल है। जबकि सिलिया गर्भवती भी हो जाती है फिर भी एक होने में जाति दीवार की तरह खड़ी है। किस तरह जाति व्यवस्था ने उन्हें प्रताड़ित किया कि वह और उसका परिवार विद्रोह करने को तैयार हो जाता है और करना ही एकमात्र राह बच जाती है।

इसमें एक प्रसंग है “चमार जाति की नाक कटती है क्योंकि ब्राह्मण के पास जाने के साथ ही वह चमारिन कहलाती है।” इस उपन्यास में सिलिया की माँ मातादीन के पिता से कहती है कि “हम सिलिया को अकेले न ले जाएँगे। उसके साथ मातादीन को भी लेकर जाएँगे, जिसने उसकी इज्जत बिगाड़ी है। तुम बड़े नेमी धर्मी हो। उसके साथ सोओगे, लेकिन उसके हाथ का पानी न पीओगे। यही चुड़ैल है कि सब सहती है। मैं तो ऐसे आदमी को माहुर दे देती।”¹⁰ सिलिया का पिता ललकारते हुए कहता है और फिर सिलिया के पिता ने खुलेआम समाज में इन ढोंगी पाखंडी प्रेम के दुश्मनों को कड़ी आवाज में ललकारते हैं— “आज हम मातादीन को चमार बनाके छोड़ेंगे या उनका और अपना रक्त एक कर देंगे। सिलिया कन्या जात है, किसी न किसी के घर जाएगी ही। इसपर हमें कुछ न कहना है, मगर उसे जो कोई भी रखे, हमारा होकर रहे। तुम हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते तो मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते हैं। हमें ब्राह्मण बना दो। हमारी सारी बिरादरी बनने को तैयार है। जब यह समर्थ नहीं है तो तुम भी चमार बन जाओ। हमारे साथ खाओ, पिओ, हमारे साथ उठो-बैठो, हमारी इज्जत लेते हो तो अपना धर्म हमें दो।”¹¹

दुनिया के साथ भारत में भी वर्चस्व का एक लंबा दौर रहा है। इतिहास में नाजी तानाशाह शासक हैं और शासक हमेशा अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है। नाजी उसी वर्चस्व का प्रतीक है। भारतीय संदर्भ में नाजी कौन-कौन हैं जिन्होंने अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए हर हथकंडा अपनाया है। उसकी कवि पहचान करते हैं और वो ‘नाजी’ कविता लिखते हैं—

“नाजी मर्द होते हैं/नाजी ब्राह्मण होते हैं

नाजी कमांडर होते हैं/नाजी श्वेत होते हैं

नाजी पुरोहित होते हैं / नाजी ज्योतिष होते हैं

नाजी व्यापारी होते हैं /नाजी अमीर होते हैं”¹²

समाज में जो अक्सर गाली सुनते हैं उसके केंद्र में कौन है। उस गाली के केंद्र में स्त्री है या लिंग है। उसमें भी अधिक निम्न जातियों को ही केंद्र में रखकर गाली का ईजाद किया गया है। इसके पीछे की मानसिकता को अगर देखें तो हमें ब्राह्मणवादी, मनुवादी, पितृसत्तात्मक सोच या विचार नजर आता है। दरअसल ये वर्चस्व की संस्कृति की सोच की दरिद्रता है जो स्त्रियों और पराजित या शोषित समुदायों के नाम पर गाली ईजाद करती है और उसे प्रयोग करती है। हम अगर ‘औरत’ शब्द पर गौर करें यह औरत एक बिलकुल सामान्य शब्द है लेकिन समाज में यह सामान्य शब्द तब गाली बनकर चुभता है जब किसी पुरुष को ‘औरत’ कह दिया जाए। यह पुरुष के लिए सबसे बड़ी गाली होगी। यह प्रसंग पितृसत्ता और वर्चस्वशाली सामाजिक संरचना से तैयार होता है। औरत को लेकर किस-किस तरह गाली का ईजाद किया है और उसे कैसे-कैसे संबोधित किया है उसकी पहचान करते हुए कवि मोहन मुक्ति लिखते हैं—

“उसे एक ही गाली दी गयी/उसे कहा गया पातर

सभी संस्कृतियों में/सभी सभ्यताओं में

सभी भाषाओं में/सभी औरतों को

दी जाती है एक ही गाली/वो गाली एक औरत का नाम है

वो एक नीची जात की/नाचने वाली औरत का नाम है…”¹³

इसी गाली को लेकर कवि कहते हैं कि गाली देना न उसकी सभ्यता है और न गाली देना उसकी भाषा है क्योंकि यह सब तो स्वर्णों ने अपने कब्जे में ले रखा है। कवि कहते हैं—

“ओह… /मेरे पास/

मेरी अपनी कोई भाषा नहीं

जिसमें अपनी बददुआ को शब्द भी दे सकूँ

मैं जिस भाषा में गाली देना चाहता हूँ

उसमें सबसे भद्दी गाली तो मेरा ही नाम है

ये भाषा तो फिर मेरी भाषा नहीं होगी”¹⁴

मोहन मुक्ति की कविता और विचार ब्राह्मणवादी, मनुवादी, वर्चस्ववादी, सामंतवादी की आँखों में खटकने जैसा है और इनसे आँख से आँख मिलाकर ये सवाल करती है। जिससे इन सामंतवादों की जड़ें हिलने लगती हैं। लेखक, कवि और साहित्यकार के साथ अक्सर यही होता है, जितने भी प्रतिरोध करने वाले कवि, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार होते हैं। उन्हें ये लोग सवाल करने वाले पसंद नहीं करते। इसलिए उन्हें जेल में बंद कर देते हैं या फिर मौत के घाट उतार देते हैं। यह समय है कि इस ब्राह्मणवादी, सामंतवादी, वर्चस्ववादी संस्कृति को चुनौती देने की और उसका प्रबल विरोध करने की। मोहन मुक्ति कहते हैं—

“मैं गड़ता रहूँगा/तुम्हारी आँखों में

मैं चुभता रहूँगा/तुम्हारे जबड़ों में

तुम्हारे हर मजे को/मैं बेमजा कर दूँगा

घृणा से जब थूक दोगे तुम मुझे

तो मैं थालियों में संगीत बनकर बज उठूँगा

जिसकी आवृत्ति

ज्वालामुखी के गहरे हृदय को झकझोर देगी

कंकड़ हूँ मैं।।।”¹⁵

मोहन मुक्ति लोक से जुड़े हुए व्यक्ति हैं और वो लोक की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने इस संग्रह में लोक संस्कृति शीर्षक से लंबी कविता-शृंखला लिखी हैं। इसमें उन्होंने दर्ज किया है किस तरह लोक में समतावादियों, ब्राह्मणवादियों का कठिन विरोध किया है। “लोक संस्कृति को लेकर जो रवैया आदिवासी, पहाड़ी, मूलनिवासी समुदायों के इर्द-गिर्द निर्मित हो चुके हेजेमनी के समाजों का बन चुका है, मोहन बहुत बेबाकी और तीक्ष्णता से ही नहीं बल्कि एक शोधपरक निरीक्षण, अध्ययन और सजगता के साथ उसकी तफसील सामने रखते हैं। लोक संस्कृति शृंखला की शुरुआत से पहले मोहन ने एक छोटा सा नोट भी दिया है।”¹⁶

जारी…

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