भारत में बैंकों का नया सिद्धांत-2: मुनाफे का निजीकरण और घाटे का सामाजीकरण

कुणाल कामराः इसके अलावा किसानों के लोन का संकट भी है। जब किसान लोन नहीं चुका पाते और सरकार लोन माफ़ करती है तो आम जनता नाराज़ होती है, कि किसानों के लोन क्यों माफ़ किए जा रहे हैं? लेकिन अगर तुलना करें तो कॉर्पोरेट्स के लोन माफ़ करने की रकम किसानों के लोन माफ़ करने से कहीं ज़्यादा है। 

थॉमस फ़्रेंकोः कृषि क्षेत्र का कुल ऋण 18% है। लेकिन जैसा मैंने बताया, अब मानदंड बदल दिए गए हैं। एक तरफ़ आम के बाग़ हैं, हज़ारों एकड़ के, उन्हें भी कृषि ऋण माना जाता है। दूसरी तरफ़ धान का खेत, जिसे सिर्फ़ एक लाख का लोन मिलता है, वह भी कृषि ऋण कहलाता है। पहले यह नियम था कि कम से कम एक 14% लोन सीधे वास्तविक कृषि के लिए होना चाहिए। बाकी अप्रत्यक्ष हो सकते थे, जैसे फ़ूड प्रोसेसिंग आदि। लेकिन इस सरकार ने वह नियम हटा दिया।

तो अब अगर आप कोई ऐसा काम भी कर रहे हैं जिसे कृषि कहा जा रहा है लेकिन वह असली कृषि नहीं है, वह भी इस श्रेणी में आ जाता है। अगर हम सचमुच छोटे लोन देखें, मान लीजिए दो लाख से कम, तो वे कुल बैंकिंग ऋण का मुश्किल से 5 से 6% ही हैं। अगर इन्हें माफ़ भी कर दिया जाए तो बैंकिंग सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यूपीए सरकार ने एक बार ऐसा किया था, तब बैंकिंग सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ा। सरकार ने रकम वापस कर दी थी। सरकार ऐसा कर सकती है क्योंकि अगर कृषि ऋण बढ़ता है तो रोज़गार भी बढ़ता है। आज भी 55% कामकाजी आबादी कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। यानी आप रोज़गार पैदा कर रहे हैं, लोगों की जीवनशैली सुधार रहे हैं, उन्हें ग़रीबी से बाहर ला रहे हैं। अगर इसके लिए थोड़ा-बहुत लोन माफ़ कर दिया जाए तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। 

पिछले दस सालों में, संसद को दी गई उनकी अपनी रिपोर्ट के अनुसार, 16.5 लाख करोड़ रुपये माफ़ किए गए हैं और उसमें से 83% कॉर्पोरेट्स को गया है। तो अगर सिर्फ़ छोटे लोन, दो लाख से कम, माफ़ किए जाएं तो बैंकिंग सिस्टम पर कोई असर नहीं होगा। किसानों के लोन माफ़ करने की मांग सही है और इसे लागू किया जाना चाहिए।

लेकिन आज की स्थिति यह है कि किसान को नया ऋण नहीं मिल रहा, जबकि कृषि ऋण आंकड़ों में बढ़ रहा है। हर बजट में वित्त मंत्री लक्ष्य देती हैं कि किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा बढ़ाई जाए। अगर वह कहती हैं कि इस साल 11% बढ़ाएं, तो बैंक क्या करते हैं? अगर किसी ने पहले से एक लाख का लोन लिया है तो उसके खाते में सिर्फ़ 10,000 रुपये और जोड़ देते हैं। लेकिन यह सिर्फ़ सीमा बढ़ाना है। उसे 10% ब्याज देना पड़ता है। यानी उसका बकाया एक लाख दस हज़ार हो जाता है। असल में उसके हाथ में एक रुपया भी नहीं आता। सिर्फ़ खातों की किताबों में लोन बढ़ जाता है।

इसलिए जब तक पुराने लोन माफ़ नहीं किए जाते और नया ऋण नहीं दिया जाता, तब तक असली असर नहीं दिखेगा।

कुणाल कामराः एक और बात मैं पूछना चाहता हूं, बहुत से लोग छोटे व्यवसाय शुरू करने या बाइक ख़रीदने या कहीं आने-जाने के लिए साधन लेने के लिए लोन नहीं पा रहे। आज अगर किसी को छोटी नौकरी भी मिलती है तो उसे परिवहन की ज़रूरत होती है। लेकिन भारत में आंतरिक परिवहन की सुविधा तैयार नहीं हुई है। तो सरकार या बैंकिंग सेक्टर क्या कर सकते हैं ताकि वाहन स्वामित्व बढ़े? 

थॉमस फ़्रेंकोः पहले, लिबरलाइज़ेशन से पहले, दोपहिया और चार पहिया लोन सार्वजनिक क्षेत्र में बहुत आम थे। अब उनकी मात्रा घट गई है। जैसा कि मैंने बताया, एक हज़ार लोगों को दस लाख का लोन देने के बजाय अगर किसी एक को एक करोड़ का लोन दे दिया जाए तो बैंकों के लिए आसान हो जाता है, क्योंकि स्टाफ़ की कमी है। इसी वजह से वाहन लोन, ख़ासकर दोपहिया लोन, बैंकिंग सिस्टम से लगभग गायब हो गए हैं।

आज आप किसी से पूछिए, वे कहेंगे कि उन्होंने लोन बजाज फ़ाइनेंस, SRM फ़ाइनेंस, चोलामंडल फ़ाइनेंस, मुथूट फ़ाइनेंस जैसी कंपनियों से लिया है। ये सब नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियां हैं। ये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लोन लेकर ऊंची ब्याज दर पर आगे दोपहिया लोन देती हैं। 

असल में अध्ययनों से पता चलता है कि आजकल महंगी कारों की ख़रीद बढ़ रही है, जबकि दोपहिया वाहनों की ख़रीद घट गई है। अगर आपको दोपहिया लोन चाहिए तो ऊंची ब्याज दर पर इन्हीं नॉन-बैंकिंग कंपनियों के पास जाना पड़ता है।

मैं एक व्यावहारिक उदाहरण बताता हूं। मैं वायनाड डिज़ास्टर के बाद वहां गया था , अध्ययन के लिए। मैंने कहा कि लोन पर मोरेटोरियम मांगने के बजाय लोन माफ़ी मांगिए, क्योंकि आपकी संपत्ति नष्ट हो गई है।

फिर एक अध्ययन हुआ कि ऐसे 95 लोग प्रभावित थे, जो चार पहिया वाहनों से पर्यटकों को ले जाते थे। यह पहाड़ी इलाका था, जहां जीप से पर्यटन होता है। उनमें से किसी को भी सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के बैंक से लोन नहीं मिला था। लगभग सभी ने बजाज फ़ाइनेंस और SRM फ़ाइनेंस से लोन लिया था।

कुणाल कामराः सरकारी नीतियां उन पर लागू नहीं होतीं। और सरकार ने क्या किया? 

फ्रेंकोः इस सरकार ने क्या किया… यहां तक कि केरल बैंक में मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि उस क्षेत्र में दिए गए लोन माफ़ किए जाएंगे। लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को ऐसा करने से मना कर दिया गया। अब सरकार ने डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट में संशोधन कर दिया है। पहले इसमें प्रावधान था कि आपदा की स्थिति में लोन माफ़ किया जा सकता है। अब प्रस्ताव है कि आपदा में भी बैंक को लोन माफ़ करने की अनुमति नहीं होगी। यही इस देश की नीति की त्रासदी है। 

अगर आप दोपहिया लोन दें तो देखिए… रोज़गार कहां है- स्विगी जैसी कंपनियों में, महिलाएं, युवा लड़के, इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स – सब दोपहिया चलाकर काम कर रहे हैं। अगर उन्हें बजाज फ़ाइनेंस जैसी कंपनियों के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक से 10% ब्याज दर पर लोन मिल जाए तो यह उनके लिए बहुत मददगार होगा।

कुणाल कामराः लेकिन असल सवाल यह है कि किसी व्यक्ति के अधिकार क्या हैं इन कंपनियों के ख़िलाफ़ – जैसे बजाज फ़ाइनेंस या अन्य नॉन-बैंकिंग कंपनियां जो लोन देती हैं। अगर आप लोन चुकाने में असमर्थ हैं तो आप क्या कर सकते हैं?

फ्रेंकोः सच यह है कि आपके पास बचने का कोई रास्ता नहीं है। क्योंकि आप एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं और लोन लेते हैं। उसके बाद वे वसूली शुरू कर देते हैं।

तमिलनाडु में पिछले महीने ही एक नया बिल लाया गया है, जिसमें जबरन वसूली के तरीकों पर रोक लगाई गई है। इसमें नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियों, माइक्रो फ़ाइनेंस संस्थान और महाजनों को भी शामिल किया गया है। कर्नाटक भी ऐसा बिल लाया है लेकिन उन्होंने नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियों को शामिल नहीं किया है। उनका कहना है कि उन्हें रिज़र्व बैंक कंट्रोल करता है। तमिलनाडु के बिल में है कि अगर ये लोग जबरन वसूली का कोई तरीका अपनाते हैं तो उन्हें तीन साल तक की जेल हो सकती है। और अगर इस वजह से कोई आत्महत्या करता है तो कंपनी को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा और उसके निदेशक को दंडित किया जाएगा।

यह क़ानून तमिलनाडु में तो आ गया है, लेकिन पूरे देश में नहीं है। हमें ऐसे क़ानून की ज़रूरत है ताकि छोटे कर्ज़दारों की रक्षा हो सके।

सबसे अच्छा समाधान यही होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शाखाएं बढ़ाई जाएं और ऋण उपलब्ध कराया जाए। अगर ऋण आसानी से मिलेगा तो लोग चोलमंडलम, मुथूट और बजाज फ़ाइनेंस जैसी कंपनियों के पास क्यों जाएंगे? वे मजबूरी में वहां जाते हैं क्योंकि बैंकों से उन्हें सुविधा नहीं मिलती।

नीतिगत स्तर पर बदलाव ज़रूरी है। मेरा कहना है कि अगर कोई नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनी चलाना चाहता है तो उसे अपने पैसों से चलाए। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से पैसा लेकर आगे उधार देना क्यों? पहले एक सिद्धांत था कि आप ऑन-लेंडिंग के लिए लोन नहीं दे सकते। यानी कोई आपसे लोन लेकर किसी और को लोन नहीं दे सकता। लेकिन अब यह सिद्धांत बदल दिया गया है।

इसके बजाय अब एक नया मॉडल लाया गया है जिसे को-लेंडिंग कहते हैं। उदाहरण के लिए, अडानी कैपिटल, जो खुद सबसे बड़े उधार लेने वालों में से है, उसने एक नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनी शुरू की। उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के साथ समझौता किया। SBI पैसा देगा, लेकिन उधारकर्ता की पहचान अडानी के लोग करेंगे। वे फ़ोटो लेंगे, KYC नियमों का पालन करेंगे, लोन आवेदन भरेंगे। लेकिन पैसा SBI से जाएगा। यह पैसा वापस आएगा या नहीं, यह निश्चित नहीं है। और अगर उधारकर्ता पैसा चुकाता भी है तो क्या अडानी लोग उसे सरकारी बैंक को लौटाएंगे, यह भी साफ़ नहीं है। यह बहुत ग़लत प्रथा है जिसे सरकार ने शुरू किया है।

कुणाल कामराः अगर हम इस प्रथा को जारी रखते हैं तो आने वाले वर्षों में बैंकिंग सेक्टर कहां पहुंचेगा? 

थॉमस फ़्रेंकोः ढह जाएगा। (और वह कैसे ढहेगा?) हमने 2008 का अमेरिकी वित्तीय संकट देखा है। वहां निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया, बड़े-बड़े लोन दिए गए। नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियां भी थीं जो हाउसिंग के लिए बहुत बड़े लोन देती थीं। लेकिन जब संकट आया तो वे ढह गईं। उन्हें अमेरिकी ट्रेज़री ने बचाया। कुछ कंपनियों को मरने दिया गया- जैसे Fannie Mae और Freddie Mac जैसी बड़ी कंपनियां। लेकिन बाकी को अमेरिकी ट्रेज़री से पैसा देकर बचाया गया।

यहां भी यही हो रहा है। सरकार निजी बैंकों को बचा रही है। आप जानते हैं यस बैंक के बारे में। यह रातों-रात ढहने की कगार पर था। इसे स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने अपने हाथ में लिया। उस समय SBI के चेयरमैन राजेश कुमार ने अपनी किताब में लिखा है कि यह फ़ैसला एंटीलिया (मुकेश अंबानी का घर) में लिया गया था, जहां मैं ग्लोबल इन्वेस्टर,  ब्लैकस्टोन US के मैनेजिंग डायरेक्टर के साथ बैठा था। वह कहते हैं कि उन्होंने डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर प्रशांत कुमार को एंटीलिया बुलाया। वह कार में बैठे और उन्होंने प्रशांत कुमार को कहा कि SBI से इस्तीफ़ा देकर यस बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर बन जाइए। SBI ने पैसा निवेश किया। प्रशांत कुमार ने बैंक को संभाला और अब इसे बेचा जा रहा है। बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है और इसे एक जापानी बैंक ख़रीदने वाला है। वे 20% हिस्सेदारी ले रहे हैं और सबसे बड़े निवेशक व मालिक बन जाएंगे।

कुणाल कामराः हमारे बैंकिंग सिस्टम का मूल सिद्धांत अब यही हो गया है- मुनाफ़े का निजीकरण और घाटे का सामाजीकरण। 

थॉमस फ़्रेंकोः बिल्कुल, यही हो रहा है।

कुणाल कामराः जापान की नीतियों का ज़िक्र करें तो वहां एक नियम है कि कोई भी व्यक्ति देश के सामान्य कर्मचारी की तनख़्वाह से 15 गुना से ज़्यादा नहीं कमा सकता। यह कॉर्पोरेट्स पर भी लागू होता है। कुछ दिलचस्प प्रयोग और नीतियां एशियाई देशों में अपनाई गई हैं जिन्होंने छोटे व्यवसायों को मज़बूत किया है।

थॉमस फ़्रेंकोः जर्मनी में राज्य-स्तरीय बैंक हैं। जो भी जमा राशि होती है, उसे उसी राज्य में लोन के रूप में देना होता है और वह सस्ती ब्याज दर पर दिया जाता है।

जापान का सिस्टम अलग है और उसे कोई और फॉलो नहीं कर सकता क्योंकि वहां पैसा जमा करने पर ब्याज नहीं मिलता, बल्कि सेवा शुल्क लिया जाता है। लोग पैसा सुरक्षित रखने के लिए जमा करते हैं, आय के लिए नहीं। यहां लोग सुरक्षा के लिए भी तो पैसा बैंक में रखते ही हैं कुछ आय पाने के लिए भी जमा करते हैं।

ब्राज़ील जैसे विकासशील देशों में डेवलपमेंट फ़ाइनेंशियल इंस्टिट्यूशन हैं जो छोटे उद्योगों और सूक्ष्म उद्यमों को सस्ती दर पर फंड देते हैं। साथ ही क्रेडिट गारंटी से जोड़ते हैं ताकि अगर कंपनी लोन चुका न पाए तो गारंटी कॉरपोरेशन उसकी देखभाल करे।

कई देशों में यह किया जा रहा है।

भारत में भी सहकारी बैंकिंग प्रणाली कभी बहुत अच्छी तरह बढ़ रही थी। लेकिन अब इसमें ठहराव आ गया है और इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप बहुत बढ़ गया है। अब तो वह इसमें और राजनीतिक दखल लाना चाहते हैं, गृह मंत्री को कोऑपरेटिव मिनिस्टर बनाने की बात हो रही है।

कुछ राज्यों में आम आदमी के लिए नई योजनाएं लाई जा रही हैं। किसानों को प्राइमरी एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ के ज़रिए ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। इन्हें मज़बूत करना चाहिए। लेकिन अगर हम निजी क्षेत्र के बैंकों और विदेशी बैंकों को मज़बूत करेंगे तो वे सिर्फ़ 10% आबादी पर ध्यान देंगे, जो महंगे लोन लेने की क्षमता रखते हैं। बाकी 90% की ज़रूरतें पूरी नहीं होंगी।

इसलिए मेरा सुझाव है कि हमें श्रीलंका जैसे प्रयोगों को देखना चाहिए, जहां सहकारी प्रणाली अभी भी अच्छी तरह काम कर रही है। 

केरल को देखिए। वहां केरल बैंक बनाया गया। सभी सहकारी बैंकों को एक बैनर के तहत लाया गया क्योंकि सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक पर्याप्त ऋण नहीं दे रहे थे। क्रेडिट-डिपॉज़िट रेशियो बहुत कम था। इसका मतलब है कि अगर आप 100 रुपये जमा करते हैं तो कम से कम 95 रुपये उसी राज्य में लोन के रूप में दिए जाएं।

तमिलनाडु में यह अनुपात 107 है। यानी वे दूसरे राज्यों से भी पैसा लाकर लोन देते हैं क्योंकि वहां राज्य बढ़ रहा है, उद्यम बढ़ रहे हैं और बैंक ज़्यादा देने को तैयार हैं।

केरल में एनआरआई डिपॉज़िट बहुत थे लेकिन उनसे स्थानीय लोगों को लोन नहीं दिया जा रहा था। इसलिए केरल बैंक बनाया गया और अब यह अच्छा काम कर रहा है। केरल सरकार ने महिलाओं के लिए एक योजना शुरू की- कुटुंबश्री। इसमें 67 लाख महिलाएं हैं। उन्हें लोन दिया जा रहा है, माइक्रो-एंटरप्राइज़ पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उनके उत्पादों के विपणन के लिए समर्थन प्रणाली दी जा रही है। उन्हें प्रदर्शनियों में भाग लेने की अनुमति है, कैंटीन चलाने की अनुमति है। यहां तक कि वायनाड आपदा राहत में भी मैंने देखा कि कुटुम्बश्री समूहों को पैसा दिया गया ताकि वे राहत शिविरों का प्रबंधन कर सकें।

तो अगर कोई ऐसी सरकार हो जो अपने नागरिकों, ख़ासकर ग़रीबों की मदद करना चाहती है तो कई मॉडल उपलब्ध हैं।

कुणाल कामराः आपसे मेरा आखिरी सवाल यह है कि हमने इस एपिसोड की शुरुआत में चर्चा की थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 2,100 लोगों के लिए एक कर्मचारी है और निजी क्षेत्र में एक कर्मचारी 350 लोगों के लिए है। साथ ही, बैंकिंग लाइसेंस पाने या नया बैंक बनाने के रास्ते बंद कर दिए गए हैं। जबकि हम कह रहे हैं कि हमें ज़्यादा बैंक, ज़्यादा शाखाएं, ज़्यादा अधिकारी चाहिए और छोटे उद्योगों को ऋण चाहिए, तो फिर नए बैंकिंग लाइसेंस क्यों नहीं दिए जा रहे? सरकार किससे डर रही है?

थॉमस फ़्रेंकोः जैसा मैंने शुरुआत में बताया, पहले बैंक उद्योगपतियों के हाथ में थे। वे सिर्फ़ अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को ही सेवा देते थे। तब आरके हज़ारी समिति की सिफ़ारिश आई कि जब तक उद्योगपतियों और बैंकों के बीच का गठजोड़ नहीं तोड़ा जाएगा, बैंकिंग आम आदमी तक नहीं पहुंचेगी। यही विचार राष्ट्रीयकरण के समय काम आया।

अगर आप निजी बैंकों को लाइसेंस देंगे तो क्या गारंटी है कि वे जमाकर्ताओं का पैसा लेकर भाग नहीं जाएंगे? हमने कई मामलों में यह देखा है। 

तमिलनाडु में बैंक ऑफ़ तुंजाव लिमिटेड ढह गया, SBI ने उसे संभाला।

केरल में बैंक ऑफ़ कोचिन ढह गया, SBI ने उसे संभाला।

निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस दिए गए, जैसे ग्लोबल ट्रस्ट बैंक। कुछ समय तक उसे बहुत बड़ा बैंक बताया गया, लेकिन वह नियमों का पालन नहीं कर रहा था और ढहने लग गया। तब ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स को उसे संभालना पड़ा।

यस बैंक का मामला भी आपने देखा।

बड़ी नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियां- इंफ़्रास्ट्रक्चर, फ़ाइनेंस और लीज़िंग- अचानक ढह गईं। दीवान हाउसिंग फ़ाइनेंस भी अचानक ढह गया। और सबको सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने संभाला। 

इसलिए मेरी राय में नए बैंकिंग लाइसेंस देने चाहिए, लेकिन वे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के लिए हों, निजी क्षेत्र के लिए नहीं।

मूल सिद्धांत यही है- निजी क्षेत्र मुनाफ़े के लिए है, सेवा के लिए नहीं। सार्वजनिक क्षेत्र सेवा के लिए है, साथ ही मुनाफ़ा भी कमाता है। यही बड़ा अंतर है। 

समाप्त

(कुणाल कामरा के शो के इंटरव्यू का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद पत्रकार राजेश डोबरियाल ने किया है।)

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