ट्रंप प्रशासन की 2.0 राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) के 27 पृष्ठों के जारी दस्तावेज (8 दिसंबर को जारी) की पहली घोषणा यह थी कि उसकी वैश्विक दीर्घकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy) पहली प्राथमिकता अमेरिकी महाद्वीप (Western Hemisphere) है। उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका, जिसमें कैरेबियन देश भी शामिल हैं। इसका मतलब है मुनरो डाक्ट्रिन (Monroe Doctrine-1823) नए रूप में लागू करना। अमेरिका लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देशों में किसी दूसरे देश (विशेषकर चीन के प्रभाव) को सीमित करेगा। अमेरिकी महाद्वीप को अमेरिका नए सिरे से अपना मुख्य प्रभाव क्षेत्र घोषित किया है।
अमेरिकी सुरक्षा रणनीति के इस दस्तावेज को पढ़ने से साफ हो गया था कि अमेरिका की चीन की बढ़ती वैश्विक ताकत को लेकर अभी मुख्य चिंता इंडो-पैसिफिक या एशिया नहीं है बल्कि उत्तरी अमेरिकी, लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन देश हैं। जहां चीन अपनी सैन्य ताकत को तो नहीं बढ़ा रहा है, लेकिन इन देशों के साथ उसके आर्थिक-व्यापारिक संबंध तेजी से बढ़ रहे हैं। चीन इन देशों को बड़े पैमाने पर निर्यात करता रहा है और यहां से आयात भी कर रहा है।
इन देशों को हथियार भी बेंच रहा है। इन्हें तकनीक के साथ बड़े पैमाने पर ग्रांट, ए़ड और कर्ज उपलब्ध करा रहा है। लैटिन अमेरिका के कई देशों के साथ आर्थिक संबंधों के मामले में चीन अमेरिका को काफी पीछे छोड़ चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो शताब्दियों तक अमेरिका के प्रभाव में (नवउपनिवेश की तरह) रहने वाले लैटिन अमेरिकी देश उसके प्रभाव क्षेत्र से तेजी से बाहर जा रहे हैं। इसमें चीन उनका सबसे बड़ा साझेदार और सहयोगी बनकर उभरा है।
इसका एक सबसे बड़ा उदाहरण वेनेजुएला है। वेनेजुएला लैटिन अमेरिका में चीन का एक सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार- सहयोगी बन चुका है। 2025 में वेनेजुएला से होने वाला तेल का निर्यात करीब-करीब सारा का सारा चीन को हुआ ( स्रोत- Reuters)। सन् 2000 तक वेनेजुएला की खनिज संपदा का सिर्फ 1 प्रतिशत चीन को निर्यात होता था, लेकिन 2018 तक वेनेजुएला से होने वाले कुल खनिज निर्यात का 28 प्रतिशत चीन को हुआ।
कुछ दशक पहले तक वेनेजुएला अधिकांश सामानों का आयात अमेरिका से करता था। स्थिति धीरे-धीरे पूरी तरह बदल गई। 2023 तक के आंकड़े बताते हैं कि वेनेजुएला चीन से अपनी जरूरत की एक तिहाई (33 प्रतिशत) वस्तुओं का आयात कर रहा है। इसके विपरीत अमेरिका से उसका आयात घटकर एक चौथाई (25 प्रतिशत) तक ही रह गया है। अतीत में यही अमेरिका वेनेजुएला को कम से कम 40 प्रतिशत अधिक वस्तुओं का निर्यातक रहा है।
हथियारों के आयात के मामले में वेनेजुएला की अमेरिका पर निर्भरता कम से कम होती गई है। जबकि लंबे समय तक अमेरिका वेनेजुएला को हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक था। 1995 तक वेनेजुएला एकमात्र अमेरिका से ही सारे हथियार खरीदता था। अब वेनेजुएला रूस, जर्मनी और चीन से हथियार और सैन्य साजो-सामान खरीदने लगा है। 2014 के बाद से वेनेजुएला चीन से अपने 46 प्रतिशत हथियार और सैन्य सामान आयात कर रहा है। इसके बाद जर्मनी और रूस वेनेजुएला को हथियार और सैन्य आपूर्तिकर्ता बन गए हैं।
चीन सिर्फ लैटिन अमेरिकी देशों के साथ अपने व्यापारिक-आर्थिक सहयोग ही घनिष्ठ नहीं बना रहा है, बल्कि इन देशों में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश भी कर रहा है। 2001 से 2023 के बीच चीन ने लैटिन अमेरिका में 300 विलियन डॉलर का निवेश किया है। यह निवेश एड, ग्रांट और कर्ज तीनों रूपों में है। इस 300 विलियन डॉलर में 106 बिलियन डॉलर (एक तिहाई) चीन ने अकेले वेनेजुएला में निवेश किया। 2001 से 2023 के बीच चीन ने वेनेजुएला में 170 बड़ी परियोजनाएं शुरू कीं। वेनेजुएला में चीन के निवेश का बड़ा हिस्सा तेल- खनिज और इससे जुड़े क्षेत्रों में हुआ।
चीन के पास दुनिया के देशों मे ग्रांट, एड और कर्ज के रूप में निवेश के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर (1000 अरब अमेरिकी डॉलर) से अधिक व्यापार अधिशेष हो गया है। चीन दुनिया को 3.6 ट्रिलियन डॉलर की वस्तुओं-सेवाओं का निर्यात करता है, जबकि दुनिया से 2.6 ट्रिलियन डॉलर की वस्तुओं-सेवाओं का आयात करता है। इस तरह वह 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक सरप्लस में है। ( 2024 के आंकडे)। इसके उलट अमेरिका 1.2 ट्रिलियन डॉलर के घाटे में हैं। वह दुनिया से 3.27 ट्रिलियन डॉलर की वस्तुओं-सेवाओं का आयात करता है, जबकि सिर्फ 2.06 ट्रिलियन डॉलर का निर्यात करता है।
उसका व्यापार घाटा 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। साफ है कि अमेरिका एक तरफ 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के व्यापार घाटे में है, तो चीन 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के फायदे में है। अमेरिका का आर्थिक वैश्विक वर्चस्व का एक सबसे बड़ा बुनियादी आधार विश्व मुद्रा के रूप में डॉलर की स्वीकृति है, जिसमें अधिकतर दुनिया लेन-देन करती रही है और अपने कोष रिजर्व करेंसी के रूप में रखती है। काफी हद तक यह स्थिति बरकरार है। हालांकि यह स्थिति तेजी से टूट रही है। किसी देश की मुद्रा वैश्विक लेन-देन और रिजर्व की मुद्रा तभी तक बन रही है, जब तक कि उसकी आर्थिक ताकत बढ़ती और बनी रहती है।
कभी अमेरिकी डॉलर की जगह ब्रिटिश मुद्रा पाउंड स्टरलिंग था, जब दुनिया पर उसका आर्थिक दबदबा था। आर्थिक दबदबा टूटते ही उसकी मुद्रा की जगह अमेरिकी डॉलर ने ले लिया, क्योंकि अमेरिका सबसे बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभरा। अब अमेरिकी डॉलर की वैश्विक लेन-देन और रिजर्व करेंसी के रूप में स्वीकृति तेजी से घट रही है। इसके आर्थिक के साथ अन्य कारण भी हैं।
सच यह है कि वैश्विक पटल पर चीन तेजी से अमेरिका के लिए चुनौती बनकर उभर रहा है। दुनिया के अधिकांश विशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि अमेरिका एक महाशक्ति के तौर पर पराभव की ओर जा रहा है, भले ही आज भी वह सबसे बड़ी शक्ति बना हुआ है। ऐसा कहने वाले विशेषज्ञों में अमेरिकी विशेषज्ञ भी शामिल हैं। चीन अपनी बढ़ती आर्थिक शक्ति के आधार पर दुनिया के देशों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। बड़े पैमाने पर वस्तुओं का निर्यात और आयात कर रहा है। देशों को ग्रांट, एड और कर्ज के रूप में आर्थिक सहायता प्रदान कर रहा है।
अमेरिका चीन का आर्थिक तौर पर मुकाबला नहीं कर पा रहा है। वह विश्व व्यापार संगठन के नियमों-शर्तों और अन्य आर्थिक समझौतों के आधार पर दुनिया के देशों के साथ एक व्यापारिक साझेदार के तौर पर निवेश, व्यापार-कारोबार, निर्यात-आयात और खरीद-बिक्री नहीं कर पाने की स्थिति में खुद को पा रहा है। न केवल विश्व बल्कि लैटिन अमेरिका और कैरेबियन देश भी अपने व्यापार-कारोबार के बड़े साझेदार के तौर चीन को देख रहे हैं।
इसका एक बड़ा कारण यह है कि चीन उनकी संप्रभुता को किसी तरह की चोट पहुंचाए बिना उनसे आर्थिक समझौते, सहयोग और कारोबार कर रहा है। वह किसी तरह के सैन्य उपस्थिति या दखल की भी कोई कोशिश नहीं कर रहा है। चीन उन देशों की आंतरिक राजनीति में कोई दखलंदाजी नहीं करता है। वह किसी पिट्ठू सरकार या सैन्य ताकत के दम पर नहीं बल्कि अपनी आर्थिक ताकत के दम पर विभिन्न देशों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
अमेरिका किसी बौखलाहट में है, वह अपने आर्थिक दबदबे को कायम रखने के लिए मुख्य रूप से सैन्य शक्ति और कूटनीतिक दबावों का इस्तेमाल करने पर उतर आया है। वेनेजुएला में सैन्य हमला और मादुरो का अपहरण इसी बौखलाहट का प्रमाण है। भारत पर मनमाना टैरिफ भी इसका एक उदाहरण है। अमेरिका किसी तरह से दुनिया, विशेषकर लैटिन अमेरिका पर अपना वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
वह लैटिन अमेरिका में आर्थिक वैश्विक नियमों और तर्कों के आधार पर वर्चस्व नहीं बनाए रख पा रहा है तो एकमात्र अंतिम उपाय के तौर पर सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर रहा है। यह अमेरिका के लिए कोई नई बात नहीं है। वह लगातार अपनी सैन्य ताकत का इस्तेमाल साम्राज्यवादी वर्चस्व, कार्पोरेट पूंजी और मुनाफाखोरों के मुनाफों को बढ़ाने और उनकी रक्षा के लिए करता रहा है। बेशर्मी भरे अन्य बहाने हमेशा बनाए जाते रहे हैं। जैसे वेनेजुएला के राष्ट्र मादुरो को ड्रग्स तस्कर या अपराधी कहना।
(स्रोत- अधिकांश आंकड़े द हिंदू से लिए गए हैं।)
(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)