लखनऊ स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट ने बीजेपी सदस्य एस विग्नेश शिशिर द्वारा बिना उचित मंज़ूरी (प्रवर्तन निदेशालय से) और इस संबंध में बिना उनके हलफनामे/अंडरटेकिंग सीलबंद लिफाफे में दाखिल किए जाने वाले कुछ ‘गोपनीय’ दस्तावेज़ों को स्वीकार करने या खोलने से इनकार कर दिया।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आलोक वर्मा (एसीजेएम-3, एमपी/एमएलए कोर्ट, लखनऊ) लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ ब्रिटिश नागरिकता के आरोपों पर एफआईआर दर्ज करने की शिशिर की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।यह मामला पिछले महीने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद रायबरेली से लखनऊ ट्रांसफर किया गया।
दरअसल शिशिर की आपराधिक शिकायत में आरोप लगाया गया कि गांधी के पास ब्रिटिश नागरिकता भी है। इसलिए उन पर विदेशी अधिनियम, पासपोर्ट अधिनियम और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं। शिशिर ने यूनाइटेड किंगडम सरकार के विभिन्न कथित रिकॉर्ड का हवाला दिया।
कार्यवाही के दौरान, शिशिर ने सीलबंद लिफाफे में दस्तावेज़ कोर्ट क्लर्क को देने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि उनमें पिछले साल सितंबर में फेमा के तहत प्रवर्तन निदेशालय को गांधी की ब्रिटिश नागरिकता के संबंध में दिए गए उनके अपने बयान थे।
जब कोर्ट ने उनसे पूछा कि क्या वह ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ दाखिल कर सकते हैं तो शिशिर ने दावा किया कि उन्हें ED से फोन पर कोर्ट में उन्हें दाखिल करने की अनुमति मिली थी। हालांकि, ACJM वर्मा ने उस आधार पर दस्तावेज़ स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
उन्होंने कहा: “अगर आप इसे सीलबंद कवर में दे रहे हैं और बोल रहे हैं कि यह गोपनीय दस्तावेज़ है तो क्या इसे आप यहां दाखिल कर सकते हैं? आप हलफनामे पर कहिए कि आप इसे यहां फाइल करने के लिए अधिकृत हैं, कोर्ट इसे तभी पढ़ेगी, तब तक इसे अपने पास रखिए।”
कोर्ट ने शिशिर को आगे निर्देश दिया कि वह ईडी से संबंधित दस्तावेज़ उचित प्राधिकरण से उचित मंज़ूरी लेने के बाद ही रिकॉर्ड पर रखें। इसके बाद शिशिर ने अलग से कुछ दस्तावेज़ जमा किए, जिनमें एक यूके नागरिक के कुछ बयान थे, जिसके बारे में उन्होंने दावा किया कि वह उनसे मिलने आया और उसने गांधी के खिलाफ कई अहम जानकारियां दीं।
इसे केस का ‘टर्निंग पॉइंट’ बताते हुए शिशिर ने कहा कि वह व्यक्ति किसी भी भारतीय कोर्ट में बयान दर्ज कराने के लिए तैयार है।एसीजेएम वर्मा ने इन दस्तावेज़ों की समीक्षा की और उन्हें फिर से सील करने का निर्देश दिया।
उन्होंने तर्क दिया: 1. वीएसएस शर्मा को यूके सरकार से गांधी की ब्रिटिश नागरिकता के बारे में कुछ जानकारी मिली है। 2. गांधी ने अपने चुनावी हलफनामे में यूके में रजिस्टर्ड कंपनी ‘बैकॉप्स लिमिटेड’ से जुड़े होने की बात मानी थी। 3. 2004 और 2009 में अमेठी से सांसद चुने जाने के बाद भी गांधी लंदन की एक नगर पालिका की वोटर लिस्ट में वोटर बने रहे। शिशिर ने आगे कहा कि उन्होंने गांधी के कथित ब्रिटिश पासपोर्ट की जानकारी के लिए एक आरटीआई दायर की, लेकिन भारत सरकार ने जवाब दिया कि जानकारी रोक दी गई।
उन्होंने तर्क दिया कि इससे पता चलता है कि सरकार के पास जानकारी है लेकिन वह सार्वजनिक व्यवस्था की चिंताओं से बचने के लिए इसे उजागर नहीं कर रही है। शिशिर ने आगे कोर्ट को बताया, “मैंने गांधी के पासपोर्ट की एक कॉपी देखी है। मैं इसे यहां फाइल नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे कानून और व्यवस्था की समस्या हो सकती है।” उन्होंने तर्क दिया कि अगर एफआईआर दर्ज होती है तो दरोगा साहब केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखेंगे, जिससे उन्हें पासपोर्ट की जानकारी देनी पड़ेगी।
शिशिर ने तर्क दिया, “आप एक ऑर्डर पास करेंगे, एफआईआर होगी और एक दिन में एक पेपर का पासपोर्ट सबके सामने आ जाएगा, केस सॉल्व हो जाएगा।” बहस के दौरान, जब शिशिर ने इलाहाबाद एमपी/एमएलए के उस आदेश का जिक्र किया, जिसमें उन्हें सुरक्षा कवर दिया गया और तर्क दिया कि एमपी/एमएलए ने यह बात मान ली है कि गांधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं तो एसीजेएम वर्मा ने उन्हें ठीक किया।
मजिस्ट्रेट ने मौखिक रूप से साफ किया, “नहीं हाईकोर्ट ने सिर्फ आपकी दलील रिकॉर्ड की है, उसने मेरिट पर कुछ नहीं कहा है।” शिशिर ने यह भी कहा कि वह कम-से-कम 17 बार रायबरेली गए, लेकिन यूपी पुलिस के बड़े अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक अधिकारी ने गांधी के खिलाफ कार्रवाई न करने का कारण आने वाले महाकुंभ 2025 को बताया।
उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट (लखनऊ बेंच) ने पिछले महीने रायबरेली के एसीजेएम-IV की कोर्ट से केस को लखनऊ की स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट में ट्रांसफर करने का निर्देश दिया। अपनी ट्रांसफर याचिका में शिशिर ने रायबरेली कोर्ट में तनावपूर्ण और हिंसक माहौल का आरोप लगाया। उन्होंने 5 दिसंबर, 2025 की एक घटना का ज़िक्र किया, जिसमें कथित तौर पर स्थानीय वकीलों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)