तुर्कमान गेट पर हुई बुलडोजर की कार्यवाही कानून की अवहेलना और राज्य दमन का मामला है: सीपीआई (एमएल) जांच टीम

नई दिल्ली। तुर्कमान गेट में हुई बुलडोजर की कार्यवाही उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली के विभिन्न इलाकों तक देश भर में भाजपा के सत्तारूढ़ शासन की “बुलडोजर राज” के बड़े प्रोजेक्ट का ही हिस्सा है। जिसे एक प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में पेश कर उचित ठहराने की कोशिश की जा रही है, वह वास्तव में विशेष समुदायों पर “व्यवस्थित” और “योजनाबद्ध” तरीके से किए गए राज्य दमन का एक पैटर्न है। यह बात तुर्कमान गेट पर हुई बुल्डोजर की कार्रवाई की जांच के लिए गई एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कही है।

सीपीआई (एमएल) के नेतृत्व में बनी इस जांच टीम ने कई स्थानीय निवासियों, कानूनी सलाहकारों, प्रभावित परिवारों और समुदाय के बुजुर्ग सदस्यों से बातचीत की। इस बातचीत से पता चला कि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया की पूरी तरह से अवहेलना की गई है। जांच टीम ने बताया कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला किया गया है तथा जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का उल्लंघन किया गया है।

जांच टीम ने इससे संबंधित कुछ साक्ष्य भी जुटाए हैं जिसको उसने मीडिया के साथ साझा भी किया। स्रोत-1 (समुदाय के एक बुजुर्ग सदस्य) के बयान के आधार पर- फैज-ए-इलाही मस्जिद परिसर में तीन अलग-अलग हिस्से थे-

*   इबादत की जगह 

*   सामान्य उपयोग/उपयोगिता का स्थान

*   ट्यूशन और सामाजिक क्षेत्र

जांच टीम के मुताबिक उन्होंने बताया कि “मैंने अपनी छोटी सी उम्र से देखा है कि यहाँ हमारे मज़हब के कई कार्यक्रम साल भर होते रहे हैं। यहाँ सालों से तो दोनों धर्म के लोग काम करते रहे हैं, यह मसला ज़मीन का है ही नहीं, वरना अदालत ने 3 दिन का वक्त दिया था उस को मानना चाहिए था, उसी दिन रात को 2 बजे ये लोग (पुलिस) तोड़ने के लिए पहुंच गए।”

उन्होंने आगे बताया कि गंभीर धमकी भरी रणनीतियों का इस्तेमाल करके, राज्य ने स्थानीय विरोध को अदालत तक पहुँचने से पहले ही कुचलने की कोशिश की। रात 2:00 बजे किए गए ध्वंस का समय एक सोची-समझी चाल थी “ताकि अदालत रोक न लगा सके,” जिससे प्रभावी रूप से न्यायिक निगरानी बेकार हो गई।

इसके अलावा, इलाके के कमिश्नर का जम्मू-कश्मीर स्थानांतरण, तोड़फोड़ से केवल दो दिन पहले, निवासियों द्वारा जवाबदेही छिपाने की एक रणनीतिक कार्रवाई है। उन्होंने कहा कि स्थल का दौरा करने पर हमने देखा कि मस्जिद के उस हिस्से को गिरा दिया गया था जिसमें ट्यूशन सेंटर, शादी हॉल और दवाखाना (क्लीनिक) जैसी सुविधाएं थीं।

संविधान द्वारा प्रदत्त कई अधिकारों के गंभीर रूप से उल्लंघन में, जांच टीम को पता चला कि पुलिस ने न केवल तोड़फोड़ को अंजाम देने में मदद की, बल्कि डर और धमकी का माहौल भी बनाया और कोई लोगों को हिरासत में लिया एवं गिरफ्तारियां भी कीं, जिनमें नाबालिग किशोर भी शामिल थे।

उन्होंने सलीम (बदला हुआ नाम) के घर को निशाना बनाया और उसकी दो बहनों शिफा (15) और फातिमा (11) को जबरन हिरासत में ले लिया, और उन्हें तुर्कमान गेट पुलिस स्टेशन पर लगभग दो घंटे तक रखा। दोनों की माँ की कई बार विनती के बावजूद, मां को उनके साथ पुलिस स्टेशन जाने की अनुमति नहीं दी गई। शिफा बताती हैं, “सवाल पूछने ले गए हमको, 1 महिला पुलिस थी 3 मेल ऑफिसर, और वो हमको यही कह रहे थे बार-बार कि अपने भाई को बुलाओ, वो आ जाएगा तो तुम दोनों को छोड़ देंगे।”

पुलिस ने, उनके भाई को पुलिस स्टेशन लाने में विफल रहने पर, उन्हें छोड़ तो दिया लेकिन उनका फोन जब्त कर लिया, जो अभी तक उन्हें वापस नहीं मिल पाया है। जांच टीम का मानना है कि यह कोई अलग घटना नहीं थी, बल्कि एक व्यापक कैप्चर बाई प्रॉक्सी’ अभियान चलाया गया। बुजुर्ग माता-पिता और बहनों को चारा बनाकर, पुलिस ने युवकों को अपने प्रियजनों की आज़ादी ‘खरीदने’ के लिए मजबूर किया। इस रणनीति द्वारा राज्य को एक निश्चित संख्या में कई “दंगाई” गिरफ्तारियों को अंजाम दिया। भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से आत्मसमर्पण करवाकर अपराध का एक झूठा नैरेटिव बनाया गया।

वक्फ बोर्ड को आंतरिक रूप से कमजोर करने की कोशिश

जांच टीम को इसमें एक दूसरी साजिश भी नजर आती है। उसका कहना है कि इसके जरिये सरकार वक्फ बोर्ड को जानबूझकर अंदर से कमजोर करने की कोशिश कर रही है। स्थानीय लोग बताते हैं कि अश्विनी कुमार, जो कमिश्नर के पद पर हैं, वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी भी हैं। इस वजह से, एक नामित प्रबंधन समिति होने के बावजूद, बोर्ड ने तोड़फोड़ के खिलाफ याचिका दायर करने में लापरवाही की या पर्याप्त जिम्मेदारी से काम नहीं किया और यहां तक कि इस तोड़फोड़ पर मूक दर्शक बने रहे।

जांच टीम का कहना है कि तुर्कमान गेट पर हुए तोड़फोड़ के जरिये एक बार फिर एक मुस्लिम बहुल इलाके को निशाना बनाने की कोशिश की गयी है, जो सांप्रदायिक घृणा की राजनीति और झूठे नैरेटिव के जरिए समुदाय को फ्रेम करने व बदनाम करने के प्रयास से प्रेरित है। प्रशासन द्वारा रात 2 बजे तोड़फोड़ करना, अदालती आदेशों को नज़रअंदाज करना, नाबालिगों को मोहरे के रूप में इस्तेमाल करना और युवकों के परिवार के सदस्यों को पकड़कर उन्हें फ्रेम करना, ये स्पष्ट करता है कि सरकार का एजेंडा – मुस्लिम समुदाय के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में व्यवहार करना है।

जांच टीम ने कुछ मांगें की हैं:

उसने मांग किया है कि किशोर न्याय प्रक्रियाओं के उल्लंघन और गैरकानूनी गिरफ्तारियों व हिरासतों की तत्काल जांच की जाए। साथ ही उसका कहना है कि सभी गिरफ्तार व्यक्तियों की तत्काल रिहाई की जाए। इसके साथ ही वक्फ की स्वायत्तता की बहाली की भी उसने मांग की है। जांच टीम का कहना है कि नष्ट की गई जन सुविधाओं (ट्यूशन केंद्र, क्लिनिक और सामुदायिक केंद्र) के लिए पूरा मुआवजा दिया जाए। जांच टीम CPI-(ML), AICCTU, AISA, AIPWA और AILAJ के सदस्यों को लेकर बनायी गयी थी। जिसमें श्वेता राज, सुचेता और अंजली शामिल थीं।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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