गणतंत्र को बचाएं प्यारे देशवासियों !   

यूं तो देश में वे तमाम संस्थाएं नज़र आती हैं जो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक देश के लिए ज़रूरी हैं। लेकिन वे सब अब पराधीन हैं और एक तानाशाह हुकूमत के नियंत्रण में हैं। जिससे देश फासीवाद की ओर तेजी से कूच कर रहा है। यह देश के लिए दुःखद है।

बापू जिन्हें देश ने राष्ट्रपिता स्वीकारा। जिन्होंने अपने सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से एक अनूठा स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। जिसकी मुरीद दुनिया है। यही वजह है उनकी प्रतिमाएं विश्व के 80 से अधिक देशों में समादृत हैं। सोचिए अंग्रेज जिनका सूरज कभी अस्त नहीं होता था। एक एक कर गांधी के सत्याग्रह अस्त्र का अनुकरण करते हुए आज़ाद हुए। आज ब्रिटिश सिर्फ ब्रिटेन तक ही सीमित रह गए हैं।

लेकिन देश में आज ऐसी महान शख्सियत गांधी के नाम पर संचालित मनरेगा को जिस तरह बदला गया है वह यह बताने की ज़रूरत नहीं कि देश आज उन लोगों के हाथ में है। जो कथित तौर पर बापू के हत्यारी गैंग से सम्बंधित हैं। ये कारनामा भी यही सिद्ध करता है।

तनिक सोचिए जब पूज्य बापू का ये हाल हुआ है तो देश के संविधान, गणतांत्रिक संस्थाओं और जनता का क्या हाल हो रहा होगा। यह समझना कठिन नहीं है। देश की अवाम को आज के दौर में भोली भाली नहीं कहा जा सकता है वह पिछले सत्तर सालों में चुनाव और राजनीति को गहराई से समझने लगी है। कांग्रेस शासन ने तो पंचायतों में महिला सशक्तीकरण के लिए जब से उन्हें 33 और कहीं 50 फीसदी आरक्षण दिया है, वे भी अपने अधिकार और मत की कीमत समझने लगी हैं।

आप यह कह सकते हैं जब मतदाता इतने समझदार हैं तो ऐसी सत्ता क्यों तीसरी बार भी सत्तारूढ़ है जो लोकतंत्र विरोधी है। ये वास्तव में गंभीर सवाल है जिसे समझने में अवाम और इंडिया गठबंधन ने बहुत देर कर दी। चुनावी परिणामों पर ये विश्वास करते रहे हैं और इसे जनता का निर्णय मान शिरोधार्य करते रहे। लेकिन चोर आखिरकार कब तक अंधेर करता। देर से ही सही अब इसकी वजह सामने आ चुकी है, वह है वोट चोरी। हमारा चौकीदार चोर है।

जिसको सामने लाने का श्रेय कांग्रेस की उस टीम को जाता है जिसका नेतृत्व आज के वरिष्ठ परिपक्व और सजग प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी करते हैं। वे मुंह जमा-खर्च नहीं करते हैं, इसको सप्रमाण कई बंडलों में इकट्ठा कर बाकायदा पेश भी करते हैं। अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सच्चाई पर मुहर लगा दी है। लेकिन चुनाव आयोग के कान में जूं नहीं रेंगी। आखिरकार क्यों? क्योंकि यह सत्ता और चुनाव आयोग के अंदरूनी गठबंधन का खेल है।

सच यह है कि एक निष्पक्ष स्वतंत्र इकाई चुनाव आयोग पिछले दो आम चुनावों और राज्य चुनावों में सरकार के साथ मिलकर ईवीएम और मतदाता सूचियों के ज़रिए जो खेल खेलता रहा है और हाल ही में सम्पन्न बिहार चुनाव में जो हुआ है। वह विश्वसनीय कतई नहीं है। यह इसलिए भी शक को सुदृढ़ करता है कि अब चुनाव जो पूरी तरह डिजिटल है उसकी प्रक्रिया को संग्रहीत आसानी से रखा जा सकता है, पर आयोग की हिदायत है कि उसे 45 दिन में डिस्ट्रॉय कर दें।

आखिरकार क्यों इतनी जल्दबाजी की जाती है। समझने की ज़रूरत है। किसी भी कागज़ात को अब मांगने और देखने की अनुमति नहीं। आयोग जो कहे वही सत्य है। ये मौलिक अधिकार के हनन का मामला है जिसे सरकार ने गुपचुप सदन में पास कर चुनाव आयोग को ये शक्ति प्रदान की है। इसलिए जो भी परिणाम होंगे उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। वोट चोरी और फिर सीनाजोरी।

स्वतंत्रता दिवस पर जिस तरह से देश प्रमुख ने इस बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रशंसा की वह संकेत था कि अब इस देश में बापू के हत्यारों का राज कायम हो गया है और अब बापू का नाम भी निशाने पर होगा। वह सब हुआ भी। आगे और जाने क्या होने वाला है।

आखिरकार बापू और कांग्रेस से वर्तमान सरकार को इतनी नफ़रत क्यों है, इसे गांधी जी की हत्या से समझना चाहिए। उन्हें इसलिए मारा गया क्योंकि वे अल्पसंख्यक मुसलमानों के पक्षधर थे। सभी धर्मावलंबियों को साथ लेकर चलते थे। कोई ऊंच नीच नहीं था। सभी देशवासियों से वे प्रेम करते थे। लेकिन देश विभाजन के बाद संघ ने मुस्लिमों के खिलाफ जो बीज बोए आज उसी की फसल वे ले रहे हैं। जबकि आज़ादी की लड़ाई में मुसलमानों ने बराबरी से अधिक भागीदारी की है और शहादत दी है।

आज भी इंडिया गेट इस बात की गवाही देता है जिसमें सर्वाधिक शहादत देने वाले मुस्लिमों के नाम हैं। संघ चाहता था बंटवारे के बाद तमाम मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं। लेकिन उनकी ये मंशा पूरी नहीं हुई ना तो पाकिस्तान से पूरे हिंदू भारत आए और ना ही पूरे मुसलमान भारत छोड़कर गए। गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस सरकार ने बराबर उनका ध्यान रखा। यही वो कांटा है जो वर्तमान सरकार को दंश देता रहता है और वे कांग्रेस के तमाम नेताओं को कोसते रहते हैं।

1950 में गणतंत्र दिवस 26 जनवरी के दिन जब कांग्रेस सरकार ने नेहरू के नेतृत्व में, भारत के विशाल संविधान को अपनाया। तब उसमें अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और दलित समाज के लिए जो विशेष सुविधाओं के प्रावधान किए गए उससे इस सरकार की बुनियाद हिली हुई है। ये मनुवादी सरकार मनुवादी संविधान चाहती है। इसलिए छद्म रास्तों से इन सब पर दबाव बनाए हुए है। कभी इन पर बुलडोजर चलवाकर बस्तियां उजाड़ी जाती हैं तो कभी लव-जिहाद के नाम पर वितंडावाद प्रारंभ हो जाता है।

कभी गौवध या गौमांस भी कारण बन जाते हैं।जब से डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर टैरिफ का जाल बुना है दोस्ती की आड़ में लूट की कवायद बढ़ी है तभी से संघ के अनुषंगी संगठनों के हमले ईसाइयों के चर्चों और ईसाई बने आदिवासी समाज पर तीव्र हो गए हैं। खुलेआम ईसाई, मुसलमान, दलित और आदिवासी उत्पीड़ित किए जा रहे हैं। भारत संविधान के मुताबिक एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है सभी को अपने धर्म मानने की आज़ादी है। किंतु, यह अब बीते कल की बात हो गई है।अब ईसाई समाज का उत्पीड़न भी जोरों पर है।

आश्चर्यजनक बात तो ये भी है कि इन लोगों के बीच काम करने वाले पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक कवि, अधिवक्ता, चिकित्सक वगैरह को या तो जेल में जगह मिलती है या उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता है। आज तक, एक जस्टिस लोया की मौत रहस्य बनी हुई है। इसी मौत से तमाम जज दहशत के साए में जजमेंट देते हैं।

बड़े-बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारी जो सरकारी आदेश के मुताबिक काम नहीं करते उन पर गाज गिरे, इससे पहले वे अपने को समय के अनुरूप बदल लेते हैं।

यही हाल विपक्षी नेताओं का रहा जिन्होंने ईडी, सीबीआई आईटी आदि के छापों से परेशान होने की बदौलत भाजपा का दामन थाम अपने को सुरक्षित कर लिया है। कई बड़े अपराधी भी इनकी शरण लिए हुए हैं।

जब इतने बड़े अफसर, नेता डरे हुए हों तो महिलाओं की हालत कैसी होगी। राजनीति से लेकर नौकरियों में वे कितनी सुरक्षित हैं। यह सोशल मीडिया पर देखने को मिलता है।मूल मीडिया बिकाऊ है सरकार विरोधी ख़बरों को देशद्रोही ख़बर मानता है। इसलिए उन्हें नहीं दिखाता। अब तो खबरें मीडिया पर किस क्रम से होंगी यह भी तय होने लगा है। विपक्ष कितनी ही बड़ी रैली कर ले उसे बड़े अखबार या तो देंगे ही नहीं यदि किसी ने देने की हिम्मत जुटाई तो चौथे, पांचवें पृष्ठ पर ऐसी खबर दो कालम में मिलेगी या अति संक्षेप में जल्द पढ़ ली जाएगी।

सोचिए, अब ऐसे बिके और बर्बाद लोकतांत्रिक सरकार के अंग किस तरह देश को मजबूत और विकसित बना पाएंगे। इसलिए आम लोग अब ये सोचने लगे हैं कि वर्तमान सरकार से पंगा लेना मुश्किल है। लेकिन यह भी सच है, अब लोग जाग रहे हैं। इसकी मिसाल पिछले दिनों में छत्तीसगढ़ में देखने को मिली जहां घासीदास समारोह में संघ को फजीहत झेलनी पड़ी। या वामसेफ के कार्यकर्ताओं ने नागपुर में संघ कार्यालय पर चढ़ाई कर दी।

देश में चारों ओर वोट चोर गद्दी छोड़ के नारे देश भर गूंज रहे हैं। सरकार विरोधी जनआंदोलन बढ़ रहे हैं लेकिन उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल भेजा जा रहा है। इस सबके बावजूद देश के संविधान और गणतंत्र की रक्षा हेतु कांग्रेस जैसी पार्टी सीना ताने खड़ी है। ज़रूरी यह है कि तमाम वे राजनैतिक दल जो संविधान में विश्वास रखते हैं इस आंदोलन को जनांदोलन बनाए तथा संविधान के इतर काम करने वाले लोगों को सबक सिखाए।

चुनाव से उम्मीद करना व्यर्थ है। इसके लिए देश को एक बार फिर बापू के क्रांतिकारी हथियार सत्याग्रह का सहारा लेना होगा। क्योंकि तमाम गणतांत्रिक संस्थाएं अपना वजूद खो चुकी हैं। इसे जनांदोलन से ही प्राप्त किया जा सकता है। वक्त लग सकता है लेकिन कामयाबी को कोई नहीं रोक सकेगा।आईए संकल्प लें, हम सब अपने संविधान को बचाएंगे तथा अपने प्यारे गणतंत्र पर्व को हर्षोल्लास से मनाएंगे।यही देश को मज़बूत और सुदृढ़ बनाएगा। जय हिन्द।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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