आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, क्योंकि…

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विगत 24 जनवरी 2026 को झारखंड की राजधानी रांची स्थित डीबडीह में जनजातीय संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज और हिंदू समाज अलग-अलग नहीं है।

भागवत ने कहा कि पहले हमारे पूर्वज जंगलों और आश्रमों में रहते थे। खेती करते थे और जंगल के आधार पर जीते थे। उस समय उनको जो अनुभूति हुई, वही उपनिषद है। आदिवासी उनके विचारों से चलते हैं। अब कुछ लोग कहते हैं कि आदिवासी लोग हिंदू नहीं हैं, क्योंकि इनकी पूजा अलग है, तो हमारे देश में एक पूजा कब थी?’

उन्होंने कहा कि जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है, वही हमारे धर्म के मूल हैं। आज के आदिवासी समाज का कोई धर्म नहीं है, यह गलत बात है। धर्म का अर्थ है कि पूजा करो, तो पूजा पहले से चली आ रही है।

भागवत के बयान का लब्बोलुआब यह था कि “आदिवासी हिन्दू हैं।” इसे लेकर आदिवासी समाज में तरह-तरह की अशंकाएं उभरकर सामने आने लगी हैं और “आदिवासी हिन्दू नहीं हैं,” को लेकर चर्चा गरम है। लेकिन मुख्यधारा के मीडिया से यह चर्चा नदारद है।

बताना जरूरी हो जाता है कि जब से झारखंड अलग राज्य हुआ है और भाजपा समर्थित सरकार रही है, तब से देश के कारपोरेट घरानों की वक्र दृष्टि झारखंड की खनिज संपदाओं, आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन पर रही है।

यही वजह है कि कारपोरेट पोषित संघ के कई घटक संगठन आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अपनी घुसपैठ करके आदिवासियों को हिन्दू बनाने के प्रयास में जुटे रहे हैं ताकि आदिवासियों की संख्या कम से कमतर हो जाये तथा वे कमजोर होकर बिखर जायें। जिससे उनके अधिकार सिमट कर रह जाएं, जिसके बाद उनके जल, जंगल, जमीन का दावा भी धाराशायी हो जाएगा और उनके जल, जंगल, जमीन पर कारपोरेट घरानों द्वारा कब्जा आसान हो जाएगा।

बताते चलें कि 18 फरवरी 2020 को जंतर-मंतर, नई दिल्ली में ‘राष्ट्रीय आदिवासी-इंडीजेनस धर्म समन्वय समिति भारत’ के तत्वावधान में जनगणना प्रपत्र में संपूर्ण भारत देश के आदिवासियों के लिए ट्राइबल धर्म कोड हेतु एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन किया गया था। इस कार्यक्रम में देश के 22 राज्यों से आदिवासी हजारों की संख्या में उपस्थित हुए थे। वहीं अगला कार्यक्रम 6-7 मार्च 2020 को महाबलिपुरम तामिलनाडु में हुआ था।

आदिवासियों को अलग से धर्म कोड/ कॉलम की आवश्यकता क्यों?

राष्ट्रीय आदिवासी-इंडीजेनस धर्म समन्वय समिति का मानना है कि चूंकि भारत का संविधान आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, किन्तु इसकी लगातार उपेक्षा होने से हित के बजाय अहित होने लगा है, तथा चालाकी से संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने की साजिश चल रही है, इसलिए सभी आदिवासियों को एक पहचान की आवश्यकता है।

इस संबंध में संवैधानिक व उच्चतम न्यायालय द्वारा लिए गये कुछ निर्णय को जानना जरूरी है।

1. उच्चतम न्यायालय का फैसला, कैलाश बनाम महाराष्ट्र सरकार 05 जनवरी 2011 के अनुसार आदिवासी इस देश का असली मालिक है। परन्तु आज की परिस्थिति में आदिवासियों को अपने स्वयं की पहचान की आवश्यकता है।

2. आज देश में 781 प्रकार के आदिवासी समाज निवास कर रहे हैं। जिनके द्वारा जनगणना प्रपत्र में अपनी पहचान धर्म कोड / कॉलम में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, जैन, बौद्ध के अतिरिक्त 77 कॉलम के माध्यम से अपनी पहचान जनगणना प्रपत्र में देते हैं, इस प्रकार आदिवासियों के द्वारा 83 कॉलम भरा जा रहा है। जिसके कारण 83 विचार उत्पन्न हो रहे हैं, जो आदिवासियों की पहचान में बाधक है।

3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 ‘3’ ‘क’ इसमें आदिवासियों की स्वशासन व्यवस्था अर्थात् रूढ़ि और प्रथा को विधि बल प्राप्त है। आदिवासी समाज अपनी समाजिक व्यवस्था के अंर्तगत स्वयं निर्णय लेते हैं। जिससे हमें न्यायालय की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जिससे समाज को आर्थिक क्षति से बचाया जा सकता है।

बताना जरूरी है कि भारत की जनगणना अंग्रेजों के शासन समय 1871—72 में शुरू हुई, तब से जनगणना प्रत्येक दस वर्ष में की जाती है। भारत में जनगणना अंतिम बार 2011—12 में हुई है। तथा 2021—22 में पुन: जनगणना किया जाना था लेकिन वह नहीं हो पाई। बताया जाता है कि अगली जनगणना की प्रक्रिया 2026 में शुरू होकर 2027 में पूरी होगी। जिसे “अखिल भारतीय डिजिटल जनगणना 2027” नाम दिया गया है। इसका पहला चरण (मकान सूचीकरण) 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच होगा और दूसरा चरण 1 फरवरी 2027 से शुरू होगा।

अंग्रेजी हुकूमत में 1871 से लेकर 1941 तक की जनगणना में आदिवासी को अन्‍य धमों से अलग धर्म में गिना गया है, जिसे Aborgines, Aborigional, Animist, Triabal Religion, Tribes आदि कहा गया है। आदिवासी की गणना अलग ग्रुप में की गई है, लेकिन आजाद भारत में 1951 की जनगणना से आदिवासियों को Shedule Tribe बना कर अलग गिनती करना बन्‍द कर दिया गया।

विदित हो कि भारत का संविधान एवं सरकारी रिपोर्ट के अनुसार आदिवासियों की परंपरा एवं संस्कृति अन्य धर्म से भिन्न व अलग है। अतएव उन्हें विलुप्त कर देना प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध है, भारत की जनगणना रिपोर्ट सन 2011 के अनुसार आदिवासियों की संख्या लगभग 12 करोड़ है, जो देश के कुल आबादी का 9.92 प्रतिशत है, इसके बावजूद जनगणना प्रपत्र में अलग से गणना नहीं करना आदिवासियों को चिंतित करता है।

वर्तमान में भारत देश में 781 प्रकार के आदिवासी समाज निवास करते हैं, जिनके द्वारा हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध, धर्मों सहित जनगणना 83 कॉलम भरे जा रहे हैं। आदिवासियों को रूढ़िप्रथा पर विधि बल प्राप्त है जिसके कारण आदिवासी समाज अपनी पहचान, अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति व मान्यता को बचाए रखा है। जिसे संरक्षित व सुरक्षित करने के उद्देश्य से सभी आदिवासी समाज संगठित होकर निरंतर राष्ट्रीय स्तर पर जगह—जगह पर सेमीनार आयोजित कर जागरूकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।

रूढ़िवादी प्रथा को कायम रखने हेतु आदिवासियों की जनगणना अलग से होनी चाहिए, इसके आलोक में अण्डमान—निकोबार में हुए सेमिनार में एक समिति गठित की गयी, जिसमें सभी राज्यों के आदिवासियों द्वारा जनगणना प्रपत्र में ट्राईबल शब्द लिखने हेतु सहमति बनी। ट्राईबल शब्द पूर्णत संवैधानिक है एवं संवैधानिक रूप से जनगणना प्रपत्र में आदिवासियों की जनगणना अलग से होनी चाहिए।

चूंकि राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में आदिवासी बहुसंख्यक हैं किन्तु इनकी जनगणना कम बतायी जाती है, यह आदिवासी समुदाय के लिए चिंता का विषय है। जिसको लेकर राष्ट्रीय आदिवासी इंडीजेनस धर्म समन्वय समिति द्वारा 18 फरवरी 2020 को हुए इस कार्यक्रम में भारत के सभी आदिवासी समुदाय को जनगणन प्रपत्र में ट्राईबल शब्द लिखे जाने को लेकर एक ज्ञापन केंद्र सरकार को सौंपा गया था।

दूसरी तरफ आरएसएस इस कोशिश में है कि आदिवासी अपना धर्म ‘हिन्दू’ बताएं।

बताया जाता है कि सन 2011 की जनगणना में बड़ी संख्या में आदिवासियों ने अपना धर्म ‘अन्य’ बताया था, जिसके कारण देश की कुल आबादी में हिन्दुओं का प्रतिशत 0.7 घट कर 79.8 रह गया था। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन नहीं चाहते हैं कि इस बार फिर वैसा ही हो और वे एक अभियान चलाकर यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आगामी जनगणना में धर्म के कॉलम में आदिवासी ‘हिन्दू’ पर निशान लगाएं।

इसके लिए आरएसएस का घटक संगठन सेवा भारती द्वारा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में वनवासी कल्याण केन्द्र और वनबंधु परिषद के बैनर तले आदिवासियों में हिन्दुत्व के संस्कार स्थापित करने की कोशिश होती रही है। संघ का मानना है कि जनगणना में आदिवासियों द्वारा अपना धर्म ‘अन्य’ बताये जाने से देश की कुल आबादी में हिन्दुओं का प्रतिशत घट गया है।

अत: संघ अब एक अभियान चलाकर यह सुनिश्चित करना चाहता है कि आगामी जनगणना में धर्म के कॉलम में आदिवासी ‘हिन्दू’ पर ही निशान लगाए, ताकि हिन्दुओं का प्रतिशत बढ़ जाए।

आरएसएस ‘हिन्दू’ शब्द को अत्यंत चतुराई से परिभाषित करता है।

सावरकर का कहना था कि जो लोग सिन्धु नदी के पूर्व की भूमि को अपनी पितृभूमि और पवित्र भूमि दोनों मानते हैं, वे सभी हिन्दू हैं। इस परिभाषा के अनुसार, मुसलमानों और ईसाइयों को छोड़ कर देश के सभी निवासी हिन्दू हैं।

परंतु सन 1980 के दशक के बाद से चुनावी मजबूरियों के मद्देनजर भाजपा यह कहने लगी कि इस देश के सभी निवासी हिन्दू हैं। मुरली मनोहर जोशी का बयान हास्यास्पद तब लगने लगा था जब उन्होंने मुसलमानों को अहमदिया हिन्दू और ईसाइयों को क्रिस्ती हिन्दू बताया था।

वहीं संघ के इस दावे पर बवाल मच गया था कि सिक्ख कोई अलग धर्म न होकर, हिन्दू धर्म का ही एक पंथ है। कई सिक्ख संगठनों ने इस दावे का कड़ा विरोध करते हुए साफ शब्दों में कहा था कि सिक्ख अपने आप में एक धर्म है। इस सिलसिले में कहन सिंह नाभा की पुस्तक ‘हम हिन्दू नहीं हैं’ को भी उद्धृत किया गया था।

संघ चाहता है कि आदिवासी अपने आपको हिन्दू बताएं, वहीं देश के आदिवासी संगठन पिछले कई वर्षों से यह मांग कर रहे हैं कि जनगणना फार्म में ‘ट्राईबल’ (आदिवासी) धर्म का कालम भी होना चाहिए। कई आदिवासी संगठनों और समूहों ने अपनी पहचान को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए जनगणना फार्म में परिवर्तन की मांग भी की है। वहीं झारखंड में आदिवासी कालम में सरना धर्म कोड की मांग की जा रही है।

देश के आदिवासी कम से कम 83 अलग-अलग धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं सरना, गौंड, पुनेम, आदि और कोया। इन सभी धार्मिक परंपराओं में समानता है प्रकृति और पूर्वजों की आराधना। आदिवासियों में न तो कोई पुरोहित वर्ग होता है, न जाति प्रथा, न पवित्र ग्रन्थ, न मंदिर और ना ही देवी-देवता।

संघ अपने राजनैतिक एजेंडे के अनुरूप आदिवासियों को ‘वनवासी’ बताता है।

संघ का कहना है कि आदिवासी मूलतः वे हिन्दू हैं जो मुस्लिम शासकों के अत्याचारों के कारण जंगलों में रहने चले गए थे। मजे की बात तो यह है कि इस दावे का न तो कोई वैज्ञानिक आधार है और ना ही कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।

हिन्दू राष्ट्रवादियों का दावा है कि आर्य इस देश के मूल निवासी हैं और यहीं से वे दुनिया के विभिन्न भागों में गए।

टोनी जोसफ की पुस्तक ‘अर्ली इंडियन्स’ बताती है कि नस्लीय दृष्टि से भारतीय एक मिश्रित कौम है। भारत भूमि के पहले निवासी वे लोग थे जो लगभग 60 हजार वर्ष पहले अफ्रीका से यहां पहुंचे थे। लगभग तीन हजार साल पहले आर्य भारत में आए और उन्होंने यहां के मूल निवासियों को जंगलों और पहाड़ों की ओर धकेल दिया। वे ही आज के आदिवासी हैं।

दुनिया के अन्य धार्मिक राष्ट्रवादियों की तरह, हिन्दू राष्ट्रवादी भी दावा करते हैं कि वे अपने देश के मूल निवासी हैं और अपनी सुविधानुसार अतीत की व्याख्या करते हैं।

आरएसएस ने कभी आदिवासी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। वह हमेशा से आदिवासियों को ‘वनवासी’ कहता आ रहा है। अब जब इनकी असली मंशा आदिवासी समझने लगे और वे खुद को वनवासी कहलाने का विरोध करने लगे तब जाकर संघ ने उनको आदिवासी कहना शुरू किया है, लेकिन बड़ी चतुराई से यह साबित करते हुए कि आदिवासी हिन्दू हैं। वह चाहता है कि आदिवासी स्वयं को हिन्दू मानें और बताएं।

जबकि आदिवासियों का कहना है कि वे हिन्दू नहीं हैं और उनकी परम्पराएं, रीति-रिवाज, आस्थाएं, अराध्य और आराधना स्थल हिन्दुओं से कतई मेल नहीं खाते।

अपना राजनैतिक वर्चस्व बढ़ाने के लिए आरएसएस आदिवासी क्षेत्रों में पैर जमाने का प्रयास करता रहा है। वनवासी कल्याण आश्रम, जो कि संघ परिवार का हिस्सा हैं, लंबे समय से आदिवासी क्षेत्रों में काम करता रहा है। सन् 1980 के दशक से ही संघ ने आदिवासी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में अपने प्रचारकों को तैनात करना शुरू कर दिया था।

आदिवासियों को हिन्दू धर्म के तले लाने के लिए, भाजपा की एक धार्मिक आयोजनों की एक श्रृंखला है जिसे वे ‘कुम्भ’ कहते हैं। गुजरात के डांग और कई अन्य आदिवासी-बहुल इलाकों में ‘शबरी कुम्भ’ आयोजित किये गए। आदिवासियों को इन आयोजनों में भाग लेने पर मजबूर किया गया। उन्हें भगवा झंडे दिए गए और उनसे कहा गया कि वे इन झंडों को अपने घरों पर लगाएं। आदिवासी क्षेत्रों में शबरी और हनुमान का गुणगान किया जाता रहा है।

बता दें कि आदिवासी बहुल क्षेत्र खनिज सम्पदा से भरपूर हैं यही वजह है कि भाजपा अपने पोषित दाता कॉरपोरेट घरानों का इन क्षेत्रों में वर्चस्व ज़माने के लिए आतुर है।

आदिवासी हिंदू क्यों नहीं हैं? क्योंकि आदिवासी मूर्ति पूजक नहीं हैं, प्रकृति पूजक हैं। आदिवासी समाज में वर्ण व्यवस्था नहीं है। आदिवासी समाज में सभी बराबर हैं। सभी सब काम कर सकते हैं। समाज में ऊंच-नीच की कोई सोच संस्कार नहीं है। आदिवासियों का गारे-मिट्टी या सीमेंट-बालू से बना कोई पूजा स्थल नहीं होता, बल्कि उनके पूजास्थल जो बृक्षों के बीच स्थापित होता है को सरना या जाहेरथान आदि कहा जाता है। उनकी पूजा-अर्चना पूरी तरह प्रकृति के साथ जुड़ी हुई है।

प्रकृति को ही वे लोग अपना पालनहार मानते हैं। आदिवासियों की भाषा संस्कृति, सोच संस्कार, पूजा पद्धति आदि पूरी तरह प्रकृति के साथ जुड़ी हुई हैं।आदिवासी के बीच दहेज प्रथा नहीं है। आदिवासी प्रकृति का दोहन नहीं करते, बल्कि उसकी पूजा करते हैं।

आदिवासी हिन्दू इसलिए नहीं हैं कि हिन्दुओं में जो वर्ण व्यवस्था है उसमें आदिवासी कहीं नहीं हैं। हिन्दुओं के लिए 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट बना है, जो आदिवासियों पर लागू नहीं होता है। वैसे सुप्रीम कोर्ट भी कई बार कह चुका है कि “आदिवासी हिन्दू नहीं हैं।” दूसरी तरफ आदिवासियों की जीवन शैली, उनके रश्मों—रिवाज, उनकी संस्कृति, उनका पर्व—त्योहार, पूजा—पाठ, पूजा की पद्धति, पूजा स्थल सबकुछ हिन्दुओं से अलग है।

इतिहास गवाह है कि आदिवासी जहां भी गया, वह सबसे पहले जंगल—झाड़ को साफ किया। वहां रहने लायक वातावरण तैयार किया, मतलब गांव बसाया। खेती लायक जमीन तैयार की। अपनी पूरी जीवन शैली को प्रकृति आधारित बनाया। प्राकृतिक सृजनकता के साथ खुद को जोड़े रखा। जिसे आज भी देखा जा सकता है। जो साफ कर देता है कि आदिवासी को हिन्दू नहीं कहा जा सकता है।

आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, क्योंकि आदिवासी की संस्कृति, भाषा, बोली—वचन, रहन—सहन यानी संपूर्ण जीवन शैली प्राकृति के बहुत करीब है। वे प्राकृतिक तौर पर जंगल, पहाड़, नदी एवं कृषि व जंगल में स्थित वृक्षों के प्रति लगाव रखते हैं। वे इनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। जंगली जानवरों पक्षियों से बहुत नजदीक से मेल प्रेम बना रहता है। अत: आदिवासी न कभी भी हिन्दू थे, न हैं, न आगे होंगे।

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में आदिवासियों की संख्या 10,42,81,034 है। जो देश की कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक देश के 30 राज्यों में कुल 705 जनजातियां रहती हैं।

वहीं ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों की संख्या 13,38,175 है। इसी तरह से मुस्लिम 18,107, बौद्ध 2,946, सिख 984, जैन 381 आदिवासी इन धर्मों को मानने वाले हैं। 25,971 ऐसे आदिवासी हैं जो किसी भी धर्म को नहीं मानते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इससे संबंधित आंकड़े क्या हैं, वो अभी तक पब्लिक डोमेन में नहीं हैं।

अकेले झारखंड की बात करें तो झारखंड में 86 लाख से अधिक आदिवासी हैं।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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