यूजीसी गाइडलाइन के राजनीतिक निहितार्थ

केंद्र सरकार द्वारा उच्च शैक्षणिक संस्थानों में जाति के नाम पर होने वाले भेदभावों को लेकर जो गाइडलाइन जारी की गयी है उसके खिलाफ देश भर के सवर्णों में उबाल आ गया है। और जगह-जगह उन्होंने इसका विरोध शुरू कर दिया है। यह विरोध कुछ उसी तरह का है जिस तरह से 1990 में वीपी सिंह द्वारा लागू की गयी मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ सवर्णों ने किया था। यूजीसी गाइडलाइन को मुद्दा बनाकर बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने तो अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया है। 

मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया तक बहसों का बाजार गर्म है। इस बात में कोई शक नहीं है कि इस देश में वह समाज हो या कि विश्वविद्यालय परिसर या फिर खेत और खलिहान कई समुदायों के साथ जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव होता है। और खुद हिंदू वर्णव्यवस्था इसको वैचारिक आधार मुहैया कराती है बल्कि उसे हर तरह का खाद-पानी भी देती है जो कि पूरी तरह से मनुस्मृति पर आधारित होता है। लेकिन देश और उसकी व्यवस्था मनुस्मृति नहीं बल्कि भारतीय संविधान से चलते हैं। जिसमें समाज और देश में किसी भी तरह के भेदभाव और ऊंच- नीच को खत्म करने का संकल्प जाहिर किया गया है और उसके मुताबिक कानून भी बनाए गए हैं। और समय-समय पर जरूरत के मुताबिक उसके लिए प्रावधान किए गए हैं। 

यह बात सच है कि 2006 में अर्जुन सिंह के शासन काल में उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद बड़ी तादाद में पिछड़े समुदाय के बच्चों का उनमें प्रवेश हुआ है। लेकिन उनके आने के साथ ही परिसरों में बड़े स्तर पर भेदभाव की शिकायतें भी मिली हैं। यही नहीं मोदी के शासन के दौरान अध्यापकों की नियुक्तियों में रिजर्वेशन की व्यवस्था को स्वस्थ तरीके से लागू करने की जगह उसको पूरी तरह से नाकाम करने की कोशिश की गयी। इस कड़ी में दलितों और पिछड़ों के प्रतिनिधित्व को बेहद सीमित कर दिया गया।

इसमें सबसे प्रमुख तौर पर जिस हथियार का प्रयोग किया गया वह एनएफएस था यानि नॉट फाउंड सुटेबल। और इसके तहत उन तमाम अभ्यर्थियों को उनके हक से वंचित कर दिया गया जो उन्हें संविधान द्वारा मिले थे। इसके अलावा सवर्ण और ब्राह्मणवादी वर्चस्व हो या फिर अन्य किसी तरह का उत्पीड़न वह लगातार परिसरों में चलता रहा। एचएसयू में रोहित वेमुला की आत्महत्या रही हो या फिर देश के विभिन्न आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में लगातार होने वाली दलित और पिछड़े छात्रों की आत्महत्याएं इसी का उदाहरण हैं। 

लिहाजा यूजीसी की नई गाइडलाइन न केवल वक्त की जरूरत है बल्कि इसका हर तरीके से स्वागत किया जाना चाहिए। इसमें सवर्ण हिस्से द्वारा जो सवाल उठाया जा रहा है वह किसी भी कानून के साथ जुड़ा होता है। संसद द्वारा पारित किसी भी कानून के बेजा इस्तेमाल की आशंका रहती है। लेकिन उसके डर से तो किसी कानून को बनने से नहीं रोका जा सकता है। जो भेदभाव और उत्पीड़न समाज में मौजूद है वह एक व्यवहारिक सच है। लिहाजा उसे हल करने के लिए भी व्यवहारिक प्रावधानों की जरूरत बन जाती है। यूजीसी की गाइडलाइन उसी दिशा में उठाया गया कदम है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह बन रहा है कि आखिर मोदी सरकार ऐसा कर क्यों रही है? वह सरकार जो देश में हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहती है और सवर्णों की खोयी सत्ता को फिर से पुनर्स्थापित करने के अभियान में पूरे प्राण पण से जुटी है। वह सवर्ण जो उस सत्ता की धुरी है आखिर उसे एकबारगी नाराज करने पर क्यों आमादा है ? ये सवाल तमाम लोगों के जेहन में घूम रहा है। दरअसल इसके पीछे पूरी तरह से चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरण काम कर रहे हैं। बीजेपी-संघ को लग गया है कि ग्यारह सालों तक हिंदू राष्ट्र की स्थापना के अभियान में जिन सवर्णों के रथ की उसने सवारी की है वह अब पूरी तरह से उसका गुलाम हो चुका है। 

इन ग्यारह सालों में उसने अपने तमाम फैसलों और कदमों के जरिये सवर्णों के हितों की गारंटी कर दी है। लिहाजा उसके कहीं और जाने का उसे कोई खतरा नहीं है। और इस काम को उसने देश में मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक अभियान संचालित करने के जरिये और पुख्ता कर दिया है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि इन सब कामों में सवर्णों ने बीजेपी के पूरे अगुवा दस्ते के रूप में काम किया है। सवर्ण परिवार के सदस्य अब उसके लिए कैडर का काम करते हैं। लेकिन केवल सवर्णों के वोट से तो चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं। और वैसे भी उनकी तादाद इतनी सीमित है कि अगर उसके खिलाफ बड़ी गोलबंदी हो गयी तो फिर सत्ता तो दूर, सालों साल उसके सपने भी देखना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा।

लेकिन बीजेपी एक बात जानती है कि सवर्णों के पास अब कोई चारा नहीं है। लिहाजा नाराजगी के बाद भी वह बीजेपी के दायरे से बाहर नहीं जाएंगे। और इस बीच अपनी सत्ता के स्थायित्व के लिए पिछड़ों के एक हिस्से को अपने पक्ष में करना उसके लिए जरूरी हो गया था। इस बात में कोई शक नहीं कि राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले चुनाव में उसे जो 37 फीसदी वोट मिलते हैं उसमें पिछड़ों और दलितों का बड़ा हिस्सा है। लेकिन अभी भी उसके पुख्ता वोट बैंक के तौर पर उन्हें नहीं देखा जाता रहा है। वह एक किस्म की सोशल इंजीनियरिंग या फिर अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक समीकरणों का नतीजा होता है। ऐसे में उसने यह कदम पिछले 30 सालों के मंडल के लाभार्थियों को ठोस रूप से अपने पक्ष में करने की दिशा में उठाया है। 

दरअसल यह तबका ऐसा है जो अपने किस्म से देश के रूलिंग क्लास का हिस्सा बनने के करीब है। या तो वह आर्थिक तौर पर सक्षम है या फिर उसके मां-बाप और परिवार का कोई सदस्य किसी न किसी सरकारी नौकरी में हैं। ऐसे में पिछड़ों के इस क्रीमी लेयर को अपने करीब लाने के लिए उसने यह पासा फेंका है। और एकबारगी अगर यह पलट गया और स्थायी तौर पर उससे जुड़ गया तो फिर बीजेपी देश में जो स्थाई तौर पर सत्ता स्थापित करने का ख्वाब देख रही है उसमें सफल हो सकती है। और वैसे भी इस हिस्से को बीजेपी के हिंदुत्व से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि इस हिस्से में भी धर्म का उसी तरह का प्रभाव है जिस तरह से सवर्णों में। अनायास नहीं सपा मुखिया अखिलेश यादव कृष्ण का गान करते रहते हैं। और किसी धर्माचार्य के पैर के नीचे बैठने से भी परहेज नहीं करते। और कभी परशुराम का फरसा उठाते हैं तो कभी संगम में डुबकी लगाते हैं। दरअसल इसके जरिये वो अपने सामाजिक आधार को संकेत दे रहे होते हैं।

लेकिन यूजीसी की इस गाइडलाइन में एक अंतरविरोध खड़ा होने की आशंका है उसको कैसे बीजेपी हल करेगी आने वाले दिनों में यह एक बड़ा सवाल बनेगा। दरअसल जातिगत भेदभाव में दलितों और पिछड़ों के बीच का जो अंतरविरोध है वह बेहद अहम है। आंकड़े बताते हैं कि देश में पिछड़ों द्वारा बड़े स्तर पर दलितों का उत्पीड़न किया जाता है। शैक्षणिक परिसरों की बनी कमेटियों में इससे संबंधित उत्पीड़न की शिकायतें भी आएंगी। जिसमें ज्यादातर पिछड़े समुदाय से जुड़े छात्र चपेट में आएंगे। और अगर ऐसा होता है तो उसका राजनीतिक प्रभाव भी पड़ेगा। जो अंतत: बीजेपी के खिलाफ जाएगा। ऐसे में इस पूरे प्रकरण में अभी और क्या कुछ होता है इस पर गौर करना होगा। 

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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