मंटो की दुनिया में उतरती हुई एक रोशनी : ‘सुर्ख इंकलाब’

सआदत हसन मंटो। एक ऐसा नाम जो जीते जी विवाद में रहे। उनके मरने के बाद उन्हें समझने पर काफी कवायद रही। उनकी कहानियां एक नश्तर की तरह हैं जिसकी मार से पाठक भी अछूता नहीं रहता। उन्हें उनके ही एक कहानी के किरदार ‘टोबा टेक सिंह’ की तरह देखा गया और कभी मानसिक असंतुलन से लबरेज एक शख्स की तरह पेश किया गया। जिन्होंने भी मंटो को समझने की कोशिश की, उसे कुछ हद जरूर समझा और यह स्वीकार भी किया कि उसे पूरा समझा नहीं गया।

इन समझदारियों में इस बीच जिस पर आम सहमति बनते हुए देखी गई, वह उनकी कहानियों में तैरती हुई इंसानियत है जो हर हमले के बाद, लहूलुहान होते हुए भी साबुत बची रहती है और हमलावर को चुनौती देते हुए खड़ी रहती है।

हिंदी के पाठक मुख्यतः राजकमल प्रकाशन द्वारा संकलित पांच भागों में प्रकाशित ‘सआदत हसन मंटो दस्तावेज’ से और छिटपुट तरीके से छपने वाली उनके कहानियों के संग्रह, जिनका नाम अक्सर ‘मंटो की बदनाम कहानियां’ आदि शीर्षकों में होती थीं, से परिचित होते रहे हैं। इस बीच आर.के. विश्वकर्मा ने काफी मशक्कत कर सआदत हसन मंटो की हिंदी में अप्रकाशित रचनाओं को तलाशना और उन्हें उर्दू से हिंदी में अनुवाद करना शुरू किया।

इन प्रयासों से पहली पुस्तक ‘चचा सैम के नाम’ से आई। यह पुस्तक मंटो के विचार पक्ष को, खासकर साम्राज्यवाद विरोधी चिंतन को सामने लाती है।

आर.के. विश्वकर्मा ने अनुवाद का कार्य जारी रखा और इस बार उन्होंने सआदत हसन मंटो के उन लेखों को प्रस्तुत किया जो मुख्यतः कार्ल मार्क्स, सोवियत रूस और मैक्सिम गोर्की पर लिखे हुए थे। इसके अलावा कई और लेख हैं जो मंटो के मार्क्सवाद के साथ जुड़ाव और भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के उन पर प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं। इन्हीं लेखों का संग्रह ‘सूर्ख इंकलाब’ के नाम से आया है जो ‘फिलहाल’ और ‘आकार बुक्स’ के संयुक्त तत्वाधान में प्रकाशित हुआ है।

भारत के क्रांतिकारी इतिहास में 3 अप्रैल, 1919 को जालियांवाला बाग हत्याकांड एक धुरी की तरह है जिसकी अनुगूंज पंजाब से लेकर बंगाल और मद्रास तक दिखाई देती है। लेकिन, इसने पंजाब के हर युवा मन पर गहरा असर डाला था। इस घटना के ठीक पहले रूस में लेनिन के नेतृत्व में मजदूरों की सफल क्रांति हो चुकी थी और साम्राज्यवाद के खिलाफ सोवियत रूस का राज कायम हो चुका था।

लाहौर, अमृतसर के युवा लेखकों की दिशा सुर्ख इंकलाब की ओर झुक गई थी। इनमें से एक बड़ा नाम फैज अहमद फैज था। लेकिन, उसके साथ और भी सैकड़ों नाम थे जो क्रांति के सपने को जमीन पर उतार लाने के लिए व्याकुल थे। ऐसे नामों में सआदत हसन मंटो जिस प्रमुखता से सामने आना चाहिए था, वह नहीं आया। लेकिन, दस्तावेजों को देखते हुए यह साफ होता है कि वह भगत सिंह की राह पर चलने वाली क्रांति के पैरोकार थे।

इसी पुस्तक की भूमिका से इस हिस्से को पढ़ना उपयुक्त होगा: ‘‘बारी साहब मंटो के घर आने जाने लगे। वहीं बारी साहब, मंटो, मंटो के दो दोस्त ख्वाजा अहमद अब्बास और अबू सईद कुरेशी का मजमा लगने लगा। यह चौकड़ी यहीं बैठकर दुनिया-जहान, अदब और इंकलाब की बातें करती। क्रांति के बड़े-बड़े मंसूबे बांधती। मंटो के घर के जिस कमरे में ये लोग बैठते थे बारी साहब ने उनको ‘दारुल अहमर’ नाम दे रखा था। अपनी चौकड़ी को वे ‘अमृतसर स्कूल ऑफ़ थाॅट’ कहते थे।’’

इसी सोहबत में उन्होंने सूर्ख इंकलाब, किसान, मजदूर, सरमायादार और जमींदार जैसे लेख लिखे। बलराज मेनरा और शरद दत्त ने अपने दस्तावेज संकलन में ‘दारुल अहमर’ का अनुवाद ‘खूनी घर’ लिख दिया जो निश्चित ही मंटो की वैचारिक पक्ष को ओझल कर देता है।

‘सूर्ख इंकलाब’ रूस के क्रांतिकारी इतिहास, सोवियत रूस की स्थापना और स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत रूस के विकास पर पुरजोर तरीके की पक्षधरता के साथ लिखा गया एक लेख है। इसी तरह से कार्ल मार्क्स पर उनका लेख रूस की पृष्ठिभूमि से शुरू होता है और जल्द ही मार्क्स की जीवनी से जाकर जुड़ जाता है। नाटक के बदलते दृश्यों के साथ चलने वाली यह जीवनी उस जद्दोजहद के साथ गुजरती है जिसमें मजदूरों के साथ पक्षधरता, दर्शन के प्रति ईमानदारी और सक्रिय हस्तक्षेप की तत्परता को प्रस्तुत करती है।

यह जीवनी मार्क्स के जीवन पर लगने वाले आघात को उनके उस बड़े लक्ष्य के बरक्स रखती है जिससे मार्क्स लहूलुहान तो होते हैं लेकिन अपना रास्ता नहीं छोड़ते और न ही उसमें कोई समझौता करते हैं, वह और भी पुरजोर तरीके से बढ़ते जाते हैं।

इस संकलन की एक महत्वपूर्ण रचना ‘मैक्सिम गोर्की’ है। यह लेख सिर्फ मैक्सिम गोर्की की रचनाओं से ही नहीं गुजरता, यह उनके पूरे समय के साथ आगे बढ़ता है। यह शानदार लेख सिर्फ मैक्सिम गोर्की को समझने के लिए ही उपयुक्त नहीं है, यह खुद सआदत हसन मंटो की रचनाओं को समझने में की एक खिड़की खोलता है।

वह ‘मां’ उपन्यास का एक हिस्सा लेख में प्रस्तुत करते हैंः ‘‘हम साम्यवादी हैं, सरमाए के दुश्मन! सरमाया लोगों को एक दूसरे से अलग करती है। इंसान को इंसान के खिलाफ लड़ने पर आमादा करती है। वह समाज हमारे लिए अमानवीय है जो इंसान को अपनी दौलत बढ़ाने का यंत्र समझता है।’’

वह अपने इसी लेख के अंत में लिखते हैं: ‘‘गोर्की जिन मुफलिस, मुसीबतजदा और बदचलन रूसियों का हमसे परिचय कराता है, उनकी फितरत और इज्जत बुरी आदतों की जंजीरों में बुरी तरह जकड़ी होती है। उनके दिलों को बुरे कामों और इरादों ने स्याह कर रखा होता है। उनके माहौल में सही रास्ते पर चलने की युक्ति बताने वाले नतीजे इतने कम और कमजोर हैं कि हमें उनके इंसान होने में क्या, जिंदा रहने पर ताज्जुब होता है।

लेकिन इंसानियत की इस दुखदायी बर्बादी में भी एक रोशनी कभी-कभी नजर आ जाती है। इन बातों पर अगर हम अपनी नजर कायम रख सकें तो गोर्की के वीराने आबाद मालूम होने लगते हैं। उसके बीमारों में सेहत के वो आसार, मर्दों में जिंदगी के वे लक्षण जाहिर होने लगते हैं जो हमको यकीन दिलाते हैं कि इंसानियत का जौहर कभी कम नहीं हो सकता।

उसके दुश्मन उसे चाहे जितना मर्जी छुपाएं, वह हमारी नजरों से बिलकुल गायब नहीं हो सकता और जब कभी वह नजर आएगा तो इस शान से कि हम दूसरों की नहीं बल्कि अपनी जिंदगी में इससे रोशनी पाएंगे। गोर्की ने इंसानियत का जो जौहर खोज निकाला है वह इंसानी हमदर्दी का एक जज्बा है जो हारी हुई जिंदगी के अंधेरे को इस तरह रेजा रेजा कर देता है जैसे बिजली काली घटा के अंधेरे को।’’

सआदत हसन मंटो को जिसने भी पढ़ा है वह इसी तरह के स्याह अंधेरे की घटा को फाड़ती हुई इंसानियत को सामने लेकर आते हैं। मंटो की कहानियाँ स्याह पक्ष को जितना गहरा करते जाती हैं उससे निकलने वाली रोशनी की कौंध उतनी ही बढ़ती जाती है। मंटो का समाजवादी यथार्थवाद उस इंसानियत की ओर ले जाता है जिसमें इंसान और उसके रिश्ते सरमाएदारों के चुंगल से बाहर हो जाएं, उसे तार-तार कर दें, विभीषिका से निकलकर मनुष्यता का पक्ष बुलंद करें।

आमतौर पर सआदत हसन मंटो को मानवतावाद से लबरेज एक कहानीकार और एक इंसान की तरह पेश किया जाता है जो आदर्शवाद में डूबा हुआ है। ‘टोबा टेक सिंह’ की कहानी की प्रस्तुति भी इसी तरह से की जाती है। यहां तक नंदिता दास की फिल्म ‘मंटो’ भी इसी के इर्दगिर्द घूमती है। जबकि मंटो की दुनिया इससे कहीं अधिक मानवीय और ठोस जमीन पर खड़ी है। ‘सुर्ख़ इंक़लाब’ पुस्तक मंटो को समझने में एक खिड़की की तरह है जो बहुत लंबे समय से बंद थी। उम्मीद है पाठक इसे जरूर पढ़ेंगे और मंटो को एक नई निगाह से परखंगे।

पुस्तक: सुर्ख़ इंक़लाब
लेखक: सआदत हसन मंटो
अनुवाद: आर.के. विश्वकर्मा
प्रकाशक: फिलहाल, पटना
पृष्ठ: 140
मूल्य: 150 रूपये

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