राजू उरांव को गारू का हिड़मा साबित करना चाहता है वन विभाग

झारखण्ड जनाधिकार महासभा ने आरोप लगाया है कि लातेहार जिला अंतर्गत गारू प्रखंड के करवाई पंचायत के दलदलिया गांव के ग्राम प्रधान राजू उरांव को वन विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा एक साज़िश के तहत मुकदमे में फंसाकर गिरफ्तार किया गया, जिससे लगता है कि वन विभाग राजू उरांव को गारू का हिडमा साबित करना चाहता है।”

महासभा ने वन विभाग द्वारा राजू उरांव की गिरफ़्तारी की घोर भर्त्सना करते हुए कहा है कि “स्थानीय अखबारों में खबरें छपवाकर वन विभाग राजू उरांव को नक्सली और अपराधी साबित करने की असफल कोशिश कर रहा है। हम राजू उरांव पर लगाए गए इन आरोपों का खंडन करते हैं।”

झारखण्ड जनाधिकार महासभा का मानना है कि मुक़दमे की पटकथा के पीछे वन विभाग कैम्पा फण्ड के करोड़ों रूपये का आवंटन प्राप्त होना और योजना में भ्रष्टाचार से ध्यान भटकाने की असफल कोशिश का हिस्सा है। 

देश के सम्पूर्ण आदिवासी इलाकों में सरकार खासकर वन विभाग द्वारा भोले-भाले, मेहनतकश और स्वाभिमानी आदिवासियों को नक्सली और उग्रवादी का लेबल चिपका कर उनको प्रताड़ित करना और प्राकृतिक संसाधनों से जल-जंगल-जमींन से बेदखल करना, आज की कार्पोरेटी व पूंजीवादी राजसत्ता की सोची-समझी चाल का हिस्सा है।

क्यों वन विभाग को खटक रहे हैं राजू उरांव

 2024 के मार्च में दलदलिया ग्राम सभा द्वारा वनाधिकार कानून के तहत दावित वन क्षेत्र में वन विभाग अवैध रूप से बांस रोपण करना चाहती थी। जिसे ग्राम सभा ने विफल कर दिया और विगत 2 वर्षों से ग्राम सभा अपने वन क्षेत्र में स्वयं श्रमदान से बांस और अन्य स्थानीय वृक्ष प्रजातीय बीजों को अपने जंगलों में बरसात में बिखेरते रहे हैं।

जंगलों के नियमित समूह बनाकर अवैध लकड़ी और वृक्षों की कटाई पर रोक लगा रहे हैं और गर्मी में आग न लगे इसे लेकर बेहद संवेदनशील हैं। बिना किसी सरकारी मदद के फायर लाईन बनाकर आग से बचाने का काम कर रहे हैं। वहीं इस वर्ष जनवरी के प्रथम सप्ताह में दलदलिया एवं करवाई की महिलाओं ने अपने दैनिक जंगल भ्रमण में देखा कि गारू कोयल पुल रिजर्व कम्पार्टमेंट 2 से 1, गणेशपुर तक जंगल में जेसीबी से वन विभाग सड़क निर्माण करा रहा है।

इस क्रम में वन विभाग खड़े पेड़ों और वनस्पतियों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया। निर्माण के क्रम में जो लकड़ियाँ निकली थीं, वन विभाग के लोग अपने साथ ले गए। आक्रोशित ग्रामीण महिलाओं ने एकजुट होकर इस अवैध निर्माण को रोका। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि कोयल पुल से ग्राम जोबे, अम्बवाटीकर तक दशकों से वन विभाग का ही एक मिट्टी मोरम रोड चालू हालत में है।

समानान्तर में अलग रोड बनाकर अनावश्यक वनस्पतियों और पेड़ों को नुकसान पहुंचाना जंगलों के प्रति वन विभाग की असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

ग्रास प्लाट निर्माण एवं अवांछित झाड़ी उन्मूलन के नाम पर जैव विविधता को नष्ट करना 

बता दें कि करवाई गांव के उत्तर दिशा में कोयल नदी पार जंगल में ग्रामीणों का चरागाह क्षेत्र और निस्तार सम्बन्धी सभी गतिविधियां संपन्न की जाती हैं। इसी इलाके गारू जोबे मार्ग पर परसापानी नामक स्थल है। जहां 30 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 2017 में ग्रास प्लाट का निर्माण किया गया है। बाद में इस पूरे क्षेत्रफल को तार के बाड़े से घेर दिया गया है और इसे हिरण पार्क में तब्दील कर दिया गया है।

2024 में बाड़े से घेराव का विरोध हुआ था। लेकिन ग्राम प्रधान को केस मुकदमा का भय दिखाकर कर उसे चुप करा दिया गया और बाद में बाकी ग्रामीण भी डर गए वर्त्तमान में यहां हिरण रखे गए हैं। यहीं बहती नदी में वन विभाग एक पक्का चेकडैम निर्माण करा रहा था, जो कि भारत सरकार के ईको सेंसिटिव जोन के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार सीमेंटेड अधोसंरचनाओं का निर्माण अवैध है।

इस अवैध निर्माण का विरोध दोनों गांव की महिलाओं ने विगत 18 दिसम्बर को किया और काम बन्द करा दिया गया। प्रतिशोध में वन विभाग ने नेतृत्वकारी 4 लोगों के ऊपर छिपादोहर थाने में एक सप्ताह बाद नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई।

हिरण पार्क गेट से 100 मीटर पहले से रोड के बाएं किनारे-किनारे 2 सौ मीटर चौड़ाई में खिजुर बन्हा तक जंगल के बड़े वृक्षों को छोड़कर पूरी वनस्पतियों की साफ-सफाई कर विभाग ने जैव विविधता का भारी नुकसान किया है। पार्क के अन्दर बैगा खानदान के 7 परिवारों के महुआ वृक्षों को कब्ज़ा कर लिया गया। वृक्षों को घेर लिए जाने तथा चरागाहों को बन्द कर दिए जाने से ग्रामीणों की आजीविका प्रभावित हुई है।

सम्पूर्ण कोर एवं बफर एरिया में मुसवाडीह, मलहेनिया, उचरी मुड़िया, सिपाहीडेरा, ढापापानी, नदिया, हरिनडेगवा, बेलमहुआ, आक्राही महुवा, ललमटिया, गारुदोहर, बहेराखाड़, मनकीलेवड़ा, बड़ा डेम, सभीबंध, जोगियाडेरा, लालीमाटी, गंगट माटी और मच्छर झारवा सरीखे दर्जनों गांवों के सैकड़ों वनभूमि को विभागीय अधिकारियों ग्रास प्लाट विगत 5-7 सालों में किए हैं। लेकिन आज किसी भी योजना स्थल में किसी तरह का घास विकसित नहीं किया जा सका है।

लेकिन दूसरी तरफ ग्रामीणों को उनके सदियों से प्राप्त पारंपरिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। सभी ग्रास प्लाट एरिया से स्थानीय जड़ी-बूटी, साग, फूल पत्तियों को नष्ट किया गया।

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का दुरूपयोग

उल्लेखनीय है कि प्राधिकरण के दस्तावेज में स्वयं उल्लेखित है अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006, 31 दिसम्बर 2007 की मध्य रात्रि से लागू है।

अधिनियम की धारा 4 (2) राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों के संकटग्रस्त वन्यजीव आवासों में इस अधिनियम के अधीन मान्यता प्राप्त वन अधिकारों को पश्चातवर्ती रूप में उपांतरित या पुन: स्थापित किया जा सकेगा, परन्तु किसी भी वन अधिकार धारक को पुन:स्थापित नहीं किया जाएगा या किसी रीति में उनके अधिकारों पर वन जीव संरक्षण के लिए अनतिक्रांत क्षेत्रों के सृजन के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित सभी शर्तों के पूरा करने की दशा में के सिवाय प्रभाव नहीं पड़ेगा।

अर्थात् – विचाराधीन सभी क्षेत्रों में धारा 6 में यथा विनिर्दिष्ट अधिकारों की मान्यता और निहित करने की प्रक्रिया पूरी हो।

राज्य सरकार के संबद्ध अभिकरणों द्वारा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह स्थापित किया गया है कि अधिकारों के धारकों की उपस्थिति के वन्य पशुओं पर क्रियाकलाप या प्रभाव अपरिवर्तनीय नुकसान करने के लिए पर्याप्त है और उक्त प्रजाति के अस्तित्व और उनके निवास के लिए खतरा है। राज्य सरकार यह निष्कर्ष निकाल चुकी है कि सहअस्तित्व जैसे अन्य युक्तियुक्त विकल्प उपलब्ध नहीं हैं।

एक पुनर्व्यस्थापन या अनुकल्पी पैकेज तैयार और संसूचित किया गया है जो प्रभावित व्यष्टियों और समुदायों की केन्द्रीय सरकार की सुसंगत विधियों और नीति में दी गई अपेक्षाओं को पूरा करने की व्यवस्था करता है। प्रस्तावित पुनर्व्यस्थापन और पैकेज के लिए संबद्ध क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की स्वतंत्र सूचित सहमति प्राप्त कर ली गई है। कोई पुनर्व्यस्थापन तभी होगा जब पुनर्वास अवस्थापन पर सुविधाएं और भूमि आवंटन वायदा किए गए पैकेज के अनुसार पूरी की गई हों।

परन्तु संकटग्रस्त वन्य जीव आवास, जिससे अधिकार धारकों को इस प्रकार वन्य जीव संरक्षण के प्रयोजनों के लिए पुन:स्थापित किया जाता है, पश्चातवर्ती रूप से राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार या किसी एकक द्वारा किसी अन्य उपयोगों के लिए अपवर्तित नहीं किया जायेगा।

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि उप निदेशक, पलामू व्याघ्र परियोजना निदेशक और जिलों के उपायुक्तगण अधिनियम की धारा 4 (2) (क) से (च) तक की कोई क़ानूनी प्रक्रिया को पूर्ण किए बिना ही परिवारों को जबरन उनके पैतृक भूमि से बेदखल किया जा रहा है। यह भी कि जमीन अधिग्रहित की जा रही है, पलामू व्याघ्र परियोजना क्षेत्र विस्तार के नाम पर। लेकिन झारखण्ड सरकार की कैबिनेट ने इस गांव को शहीद नीलाम्बर-पिताम्बर, उत्तर कोयल परियोजना (मण्डल डैम) के डूब क्षेत्र के लिए स्वीकृति प्रदान की है।

इस निर्णय से यह स्पष्ट है कि ग्रामवासियों की जमीन ली जा रही है बाघ संरक्षण क्षेत्र विस्तार के नाम पर और तत्काल उक्त भूमि को सिंचाई विभाग को डैम निर्माण के लिए हस्तांतरित कर दी जाएगी। जो कि वन अधिकार कानून की धारा 4 (2) (च) का सीधा उल्लंघन है।

173 सामुदायिक दावों पर कुण्डली मारे बैठी है वन विभाग 

पलामू व्याघ्र परियोजना के 44 गांवों के दावों सहित जिले भर के 173 सामुदायिक दावों सहित दो हजार से अधिक व्यक्तिगत दावों पर विगत 10 सालों से विभागीय अधिकारी उदासीन हैं। अधिकारियों के इस उदासीन रवैया भी ग्रामीणों के आक्रोशित होने की मुख्य वजहों में से एक है। 14 जून 2024 को अनुमण्डल स्तरीय वन अधिकार समिति की बैठक में पीटीआर क्षेत्र के सामुदायिक दावों के औसतन 99.96 प्रतिशत रकबा की कटौती कर डीएलसी को अग्रेतर कार्रवाई हेतु अनुशंसा कर प्रेषित की गई l

महुआडाड़ के अनुमण्डल स्तरीय समिति ने तो हुरदाग, अक्सी और चेतमा ग्राम सभा के दावों को यह कहते हुए गैरकानूनी तरीके से ख़ारिज कर दिया है कि यह भेड़िया आश्रयणी क्षेत्र है। जबकि वन अधिकार कानून आरक्षित और संरक्षित सभी तरह के वनभूमि पर लागू है।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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