भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील: किसानों के लिए खतरे की घंटी और आर्थिक संप्रभुता का संकट

भारत और अमेरिका के बीच घोषित अंतरिम व्यापार समझौते ने देश की राजनीति, किसान आंदोलन और आर्थिक बहसों को एक बार फिर उबाल पर ला दिया है। सरकार इसे “ऐतिहासिक अवसर” और “दोनों देशों के लिए फायदेमंद सौदा” बता रही है, जबकि किसान संगठनों, ट्रेड यूनियनों और विपक्षी दलों का आरोप है कि यह समझौता भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने गिरवी रखने जैसा है। संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा इसे “टोटल सरेंडर” कहना केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस गहरी आशंका की अभिव्यक्ति है, जो देश के करोड़ों किसानों के मन में घर कर चुकी है। 

सरकारी बयानों के अनुसार, अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा, जबकि भारत अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों और कई कृषि व खाद्य वस्तुओं पर आयात शुल्क कम या समाप्त करेगा। इसके अलावा, भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के ऊर्जा उत्पाद, विमान, रक्षा उपकरण, तकनीकी उत्पाद और कच्चा कोयला खरीदने की “मंशा” जताई है।

सतह पर यह एक संतुलित सौदा दिखता है, लेकिन जब गहराई में जाते हैं तो तस्वीर अलग नजर आती है। अमेरिकी टैरिफ में कटौती सीमित और शर्तों से बंधी है, जबकि भारत की ओर से आयात खोलने की प्रतिबद्धता व्यापक और दीर्घकालिक है। यही असंतुलन किसानों और मजदूर संगठनों को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है। 

 उधर ,वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल दावा कर रहे हैं कि कृषि और डेयरी को फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के दायरे से बाहर रखा गया है। लेकिन भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में “नॉन-टैरिफ बैरियर्स” (गैर-शुल्क बाधाएं) हटाने पर सहमति की बात कही गई है। कोई जान सकता है कि झूठ कौन बोल रहा है और सच क्या है ? जिसको डील से बर्बादी दिख रही है वह परेशान है और जिनको इस डील में अवसर और खासकर राजनीतिक अवसर दिख रहा है वह गदगद है। गैर-शुल्क बाधाएं केवल कागजी शब्द नहीं हैं। इनमें गुणवत्ता मानक, सब्सिडी नियम, आयात लाइसेंस, भंडारण शर्तें और सरकारी खरीद नीतियां शामिल होती हैं। यदि इन्हें कमजोर किया जाता है, तो भारतीय बाजार स्वतः ही अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खुल जाएगा।

अमेरिका का कृषि क्षेत्र भारी सरकारी सब्सिडी पर चलता है। वहां किसान को सस्ता ईंधन, बीमा, भंडारण और निर्यात प्रोत्साहन मिलता है। इसके मुकाबले भारतीय किसान पहले से ही बढ़ती लागत, कर्ज और MSP की अनिश्चितता से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में दोनों को एक ही मैदान में उतारना, असमान मुकाबला है।

किसान संगठनों को इस समझौते में 2020 के तीन कृषि कानूनों की परछाई दिख रही है। तब सरकार ने कहा था कि ये कानून किसानों की आय बढ़ाएंगे, लेकिन अंततः एक साल के आंदोलन के बाद उन्हें वापस लेना पड़ा।अब ट्रेड डील के जरिए वही एजेंडा—बाजार को सर्वोपरि बनाना और राज्य की भूमिका घटाना—दूसरे रास्ते से आगे बढ़ाया जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दबाव “घरेलू सुधार” के बजाय “अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता” के नाम पर डाला जा रहा है। 

भारत की आधी से ज्यादा आबादी आज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। यदि सस्ते अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाजार में आएंगे, तो सबसे पहले छोटे और सीमांत किसान प्रभावित होंगे।दूध, तिलहन, दालें और पशु आहार से जुड़े क्षेत्रों में लाखों लोगों की आजीविका दांव पर लग सकती है। यह केवल किसानों की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि ग्रामीण मांग घटेगी, छोटे उद्योग बंद होंगे और बेरोजगारी बढ़ेगी।

वाम दलों और ट्रेड यूनियनों ने समझौते को आर्थिक संप्रभुता पर हमला बताया है। खासतौर पर यह आरोप गंभीर है कि अमेरिका भारत के ऊर्जा आयात—विशेषकर रूस से तेल खरीद—पर अप्रत्यक्ष दबाव डाल रहा है।यदि कोई विदेशी ताकत यह तय करने लगे कि भारत किससे तेल खरीदे और किससे नहीं, तो यह केवल व्यापार नीति का मामला नहीं, बल्कि विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता का भी प्रश्न बन जाता है।

भारत दशकों से गुटनिरपेक्ष और स्वतंत्र विदेश नीति की बात करता आया है। लेकिन ऐसे समझौते उस परंपरा को कमजोर करते दिखते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने दूरगामी प्रभाव वाले समझौते पर संसद में विस्तृत बहस क्यों नहीं हुई? पूरी शर्तें सार्वजनिक क्यों नहीं की गईं?लोकतंत्र में आर्थिक नीतियां केवल मंत्रियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस से तय नहीं होतीं। उन्हें जनता और संसद की कसौटी पर खरा उतरना होता है। पारदर्शिता की कमी ही अविश्वास को जन्म देती है।

सरकार का कहना है कि इस समझौते से निर्यात बढ़ेगा, निवेश आएगा और रोजगार सृजित होंगे। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि किसके लिए रोजगार और किस कीमत पर?

यदि कुछ क्षेत्रों को लाभ मिलता है, लेकिन करोड़ों किसानों को नुकसान होता है, तो यह संतुलित विकास नहीं कहा जा सकता।

12 फरवरी को प्रस्तावित आम हड़ताल केवल ट्रेड डील के खिलाफ नहीं, बल्कि उस आर्थिक मॉडल के खिलाफ है, जो पिछले एक दशक से अपनाया जा रहा है—जहां कॉरपोरेट और विदेशी निवेश को प्राथमिकता और किसानों-श्रमिकों को हाशिए पर रखा जा रहा है।यह हड़ताल एक चेतावनी है कि यदि सरकार ने संवाद और पारदर्शिता का रास्ता नहीं अपनाया, तो सामाजिक असंतोष और बढ़ेगा।

भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील को केवल “अवसर” या केवल “समर्पण” कहना अधूरा सच होगा। असली सवाल यह है कि इस समझौते की शर्तें किसके पक्ष में झुकी हुई हैं।यदि भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ना है, तो यह उसकी अपनी शर्तों पर होना चाहिए, न कि दबाव में।किसानों की आजीविका, देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता किसी भी समझौते से ऊपर होनी चाहिए।

आज देश एक चौराहे पर खड़ा है—या तो वह समावेशी और आत्मनिर्भर विकास का रास्ता चुनेगा, या फिर ऐसा मॉडल अपनाएगा जिसमें लाभ कुछ गिने-चुने हाथों में और नुकसान करोड़ों लोगों के हिस्से आएगा। 12 फरवरी की हड़ताल इसी चौराहे की ओर इशारा कर रही है।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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