मिस्र के स्मारकों पर प्राचीन भारतीय लेखन : अब इतिहास का खूबसूरत पन्ना बन गया

मिस्र में राजाओं के स्मारकों पर बहुत सी बहुत भाषाओं में नाम आदि लिखे गये हैं। मुख्यतः ईपू की शती में मिस्र के महान राजाओं को दफ्न करने और उन पर विशाल स्मारकों को बनाने की प्रथा अपने दौर में ही आकर्षण का केंद्र बन गयी थी। जहां उनके स्मारक बनवाये गये उसे अब ‘राजाओं की घाटी’ कहा जाता है। इन्हीं घाटियों में राजाओं, फराओ के स्मारकों की दीवालों पर उकेरे गये नाम बहुत सी भाषा में लिखे गये हैं। हाल की खोजो में 30 ऐसे लेखन सामने आये हैं जो भारतीयों द्वारा लिखे गये हैं।

इसमें से 20 तमिल ब्राम्ही और दस प्राकृत और संस्कृत में लिखे गये हैं। तमिल ब्राम्ही ब्राम्ही लिपि में और बाकी गांधारी खरोष्टी लिपि में लिखे गये हैं। यह माना जा रहा है कि ये लिखावटें पहली शती से लेकर तीसरी शती के बीच की हैं।

यहां उकेरे नाम उन लोगों के हैं जो इन स्मारकों को यहां देखने आये। पर्यटक स्मारकों की दीवालों पर अन्य लिखावटों के बीच बची जगहों में अपना नाम लिख देते थे। इसी में से एक नाम की काफी चर्चा है: चिकै कोर्रन। कोर्रन का उल्लेख संगम साहित्य में आता है जो प्राचीन तमिल साहित्य और इतिहास का एक दस्तावेजी संकलन है। इसमें कोर्रन का उल्लेख एक चेर राजा के संबोधन की तरह आया है। चिकै का अर्थ राजमुकुटधारी है। यह नाम वहां के 5 स्मारकों पर 8 बार लिखा आता है।

इसमें तमिल कोर्रन के कई और रूप मिलते हैं। जिसमें से एक अर्थ देवी भी है।

भारत की इन लिखावटों पर काम करने वाले शोधकर्ता शार्लोट श्मिट और इंगो स्ट्राउख ने हाल ही में अपने एक शोधपत्र ‘फ्राॅम द वैली ऑफ़ द किंग्स टू इंडियाः इंडियन इंस्क्रीप्शन इन इजिप्ट’ में इन लिखावटों को संदर्भ में प्रस्तुत किया है जिससे भारत के रोम और मिस्र के साथ होने वाले व्यापार पर काफी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आती हैं। उपरोक्त कोर्रन का एक अन्य रूप लाल सागर के व्यापारिक बंदरगाह के पास बनिके से एक बर्तन पर ‘कोर्रापुमान’ लिख हुआ मिला था।

ये उल्लेख यह दिखाते हैं कि मालाबार तट से समुद्री रास्तों से इन इलाकों में व्यापार और भाषा संपर्क बन गया था और यह विकसित अवस्था में था।

ऐसा ही एक और नाम लिखा हुआ मिलता है: कोपन वारता कानता। जिसका अर्थ है कोपन आया और देखा। शोधकर्ताओं के अनुसार यह लिखावट रोमन परम्परा के अनुरूप दिखती है जिसमें ‘आया और देखा’ एक सामान्य वाक्य विन्यास है। इसके साथ नाम जोड़ दिया जाता था। रोमन और तमिल की भाषिक संरचना का यह मेलजोल भाषा ही नहीं इनके बीच के अन्य संबंधों को परखने का रास्ता खोलता है।

यह भी साफ है कि मिस्र की यह घाटी, जहां राजाओं के स्मारक थे पर्यटन का बड़ा केंद्र बन चुके थे। जहां दुनिया भर के लोग आ रहे थे और अपनी उपस्थिति दर्ज कर रहा थे। यह एक सांकृतिक सम्मिलन की जगह बन चुकी थी। यहां यह बात ध्यान में रखने की है कि ये स्मारक व्यापारिक स्थल नहीं थे। ये नील नदी की घाटी में व्यापारिक स्थल से दूर बनाये गये थे। इसका अर्थ यह भी है व्यापारी समुदाय सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं थे, वे वहां ठहरते थे और उनके पास ऐसे स्थलों को देखने जाने, घूमने का समय भी होता था।

यहां अभी तक खोजे गये लेखन के कुल 30 उल्लेख आये हैं। जिसमें दस प्राकृत, संस्कृत और गांधारी खरोष्टी में हैं। तमिल ब्राम्ही के मुकाबले ये लिखावटें कम हैं। इन भाषाओं का प्रभाव उस समय मुख्यतः उत्तर-पश्चिम के इलाकों में था। इन इलाकों से मेसोपोटामिया, आज के इराक से समुद्री रास्तों से व्यापार के प्रमाण मिलते हैं, खासकर हड़प्पा के काल में इसे देखा जा सकता है। निश्चित, ही यह गतिविधि आने वाले समय में नहीं रूकी, लेकिन जो साक्ष्य मिले हैं उसमें इसकी उपस्थिति कम दिखती है।

यद्यपि ईसा की पहली शती तक रोमन शासकों का प्रभाव पश्चिमोत्तर भारत में बना रहा था और गांधार शैली का उद्भव इसी जमीन पर हुआ था।

शोधकर्ता शार्लोट श्मिट और इंगो स्ट्राउख क्रमशः फ्रेंच स्कूल ऑफ़ एशियन स्टडीज, पेरिस और लाॅजेन यूनिवर्सिटी, स्विट्जरलैंड से हैं। यहां यह बात याद दिलाने की है कि हाल के दिनों में वर्तमान भाजपा-मोदी नेतृत्व वाली केंद्र की सरकार ने बहुत से विदेशी विद्वानों को भारत आने से मना कर दिया। इसमें से एक शोधकर्ता और प्रोफेसर फ्रेंचेस्का ओर्सिनी भी थीं जिनका काम हिंदी भाषा और उसके समाज को लेकर था।

यह देखना महत्वपूर्ण है कि भारत के संदर्भ में विदेशी शोधकर्ताओं के द्वारा किए जा रहे अध्ययन आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अभी हाल ही में भारतीय पुरातत्वविद ने जब तमिलनाडु में हड़प्पा काल के सामानान्तर शहरी सभ्यता वाले स्थलों कीराडी, आदिचलन्नूर और शिवांगी जैसे स्थलों पर काम करना और रिपोर्ट प्रस्तुत करना शुरू किया तब उसे कई तरह से रोका गया और पुरातत्वविदों को स्थानान्तरित तक कर दिया गया।

पुरातत्व की खोजों के नाम पर जिस तरह का हुड़दंग पैदा करने और तोड़फोड़ को उकसाने, करने का उन्माद पैदा किया गया है, उससे निश्चित ही ढंग के शोध होने की संभावना नहीं बनती है। आज स्थिति और भी बदतर होते हुए दिख रही है। ऐसे में, आरिएंटल शोध संस्थानों से आने वाले शोध हमें अधिक आकर्षक और प्रामाणिक दिखते हैं और उन्हें पढ़ना अपने इतिहास से रूबरू होना भी होता है।

(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं।)

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