मैं लड़ी और उड़ी : टूटना नहीं, बहना है

रुचिरा गुप्ता की इस किताब को छापा है राजकमल प्रकाशन ने। मूलत: अंग्रेज़ी में लिखी इस किताब का हिंदी अनुवाद किया है- प्रणव प्रियदर्शी ने। कई बार अच्छी से अच्छी किताबें भी अनुवाद में अपना असर खो देती हैं पर इस अनुवाद ने रचना को हिंदी में उपलब्ध कराने का काम बख़ूबी किया है। यह कहना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि तकरीबन 300 पृष्ठों की इस किताब को मैं दो दिनों में कुल तीन सिटिंग में पढ़ सकी, यह अनुवाद के सहज होने की वज़ह से ही संभव हो सका।

बहरहाल, यह किताब एक सच्चाई, जो कि वैश्विक है, जिसका ज़िक्र लेखक ने आखिर में अपने वक्तव्य में भी किया है, को इस तरह से पेश करती है कि लगता है हम हीरा के जीवन में घुल मिल गए हैं। ऐसा लगता है सारी बातचीत हमारे सामने हो रही है। इस किताब की कहन शैली और अनुवाद की यह बहुत बड़ी ताकत है।

मीरा दी, माई, बाबा, निशा, जमीला बुआ, सानिया, छोटू ये सारे किरदार हमें दिखते हैं, मीरा दी की बाँहों पर सिगरेट से जले निशान दिखते हैं, हीरा का मीरा को दर्जिन बनाने का खाब दिखता है, खुद को खपाती उदास माई की तनी आवाज़ सुनती है; उसके सपनों वाली पान की दुकान दिखती है, सलमान दिखता है, जिसकी वज़ह से हीरा को मर्द जाति थोड़ी बेहतर दिखने लगती है, गुलाबी रंगों वाला घर दिखता है, लाइब्रेरी की टेबल पर नाक पर गिरे चश्मे के साथ सोचती रिनू दी दिखती हैं, जो उस दुनिया से लड़ना चुनती हैं जो उनके विरुद्ध है क्योंकि वे जानती हैं कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता और वे लड़ने के तरीके भी जानती हैं! 

हीरा: क्या ही नाम है न, यह किताब किसी एक हीरा की नहीं है, उन सब हीराओं की है, जो एक न एक दिन उड़ेंगी ज़रूर! हीरा जो अंग्रेज़ी की किताब पढ़ते हुए, उसकी कविताओं में भारत को ढूँढ़ती है, ढूँढ़ती है सरसों के पीले खेतों को! हीरा जो जानती है कि इन कविताओं के फूल बेशक अलग हैं पर इनकी सोहबत की भावना एक सी है। 

भूख की गंध कैसी होती है और भूखा पेट कैसे उबलते चावलों की गंध से गुड़गुड़ाने लगता है! पहली बार भर पेट खाना कैसा होता है? कैसा होता है वह सुकून जो उधार की ज़िंदगी, बिसीबेले हो जाने के डर से मुक्त हो जाने के एहसास से आता है! कैसा होता है वह यकीन जो आप खुद पर करते हैं, आपको गुम करा देने वाली तमाम सीमाओं के बीच!

“मैं पानी की तरह हूँ, मैं टूटूँगी नहीं, बहूँगी!”

आह! हीरा का यह कहना इस किताब के पाठकों को जैसे एक सबक थमा देता है, हौले से- टूटना नहीं है, बहना है। वैसे भी किताब में ही एक जगह पर यह भी कहा ही गया है कि: “Courage is contagious” 

कुंग फू में जान लगा देने वाली लड़की, स्ट्रैटेजिकली लड़ना सीख गई है और सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने जैसी तमाम लड़कियों के लिए – जिनके सपनों को बेच दिया गया।

क्या आपको कभी किसी ने बताया है कि तुम्हारा शरीर तुम्हारा है? स्कूल में, घर पर? रिनू दी हीरा को बताती हैं; रिनू दी हीरा को ब्रूस ली की किताब के मार्फ़त यह भी बताती हैं कि:

“तुम्हें यह सच समझना होगा कि अपनी मदद के अलावा और कोई मदद नहीं होती!”

यह किताब पूरी होती है उधार की ज़िंदगी से मुक्ति के साथ, अपने लिए लड़कर हासिल की गई हीरा की उड़ान के साथ पर मुक्ति की यह यात्रा पूरी नहीं होगी जब तक लालटेन बाज़ार जैसी जगहें बची रहेंगी, जब तक औरतों का अपने शरीर पर पूरा अधिकार नहीं होगा, जब तक औरतें पूरी तरह आज़ाद नहीं होंगी।

(स्वाति कवयित्री हैं और आईआईटी दिल्ली में कार्यरत हैं।)

पुस्तक : मैं लड़ी और उड़ी

लेखक : रुचिरा गुप्ता

अनुवाद : प्रणव प्रियदर्शी

प्रकाशन : राजकमल

समीक्षा : स्वाति

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