भारत में मीडिया का जॉम्बीकरण

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है, जिसका दायित्व सत्ता की आलोचनात्मक निगरानी करना, नागरिकों तक सत्य और विविध दृष्टिकोण पहुँचाना तथा जनमत को विवेकपूर्ण आधार देना होता है। किंतु धीरे-धीरे यह आरोप मजबूत हुआ है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी आलोचनात्मक चेतना खोकर सत्ता के नैरेटिव का वाहक बन गया है।

इस स्थिति को रूपक के तौर पर “मीडिया का जॉम्बीकरण” कहा जा सकता है—ऐसी अवस्था जिसमें मीडिया जीवित तो दिखता है, पर उसकी स्वतंत्र बुद्धि और आलोचनात्मक क्षमता मानो मृत हो चुकी हो।

जॉम्बीकरण का अर्थ है किसी संस्था का अपनी स्वायत्त चेतना खो देना और किसी बाहरी शक्ति के निर्देशों पर यांत्रिक ढंग से चलने लगना। मीडिया के संदर्भ में यह तब दिखाई देता है जब वह सवाल पूछने की बजाय सत्ता द्वारा निर्मित कथानकों को बिना जांच-परख के दोहराने लगता है। भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से में यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। बहसों के विषय, शब्दावली, मुद्दों की प्राथमिकता और प्रस्तुतिकरण—सब कुछ इस प्रकार निर्मित होता है कि वह सत्ताधारी राजनीति के अनुकूल हो।

यह स्थिति अचानक नहीं बनी। इसके पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं। सबसे महत्वपूर्ण कारण मीडिया का बढ़ता हुआ कॉरपोरेट नियंत्रण है। बड़े मीडिया संस्थान विशाल व्यावसायिक घरानों के स्वामित्व में हैं, जिनके हित अक्सर सत्ता के साथ जुड़े होते हैं। विज्ञापन, सरकारी अनुदान और कारोबारी हितों की जटिल संरचना मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित कर देती है। परिणामस्वरूप मीडिया के लिए सत्ता से टकराना जोखिमपूर्ण हो जाता है और वह आलोचना की बजाय अनुकूलता का रास्ता चुनता है।

दूसरा कारण राजनीतिक ध्रुवीकरण है। मीडिया के अनेक मंच अब निष्पक्ष सूचना के मंच न रहकर वैचारिक प्रचार के माध्यम बनते जा रहे हैं। एंकर और टिप्पणीकार स्वयं को पत्रकार से अधिक राजनीतिक योद्धा की तरह प्रस्तुत करते हैं। बहसें तथ्यपरक विमर्श के बजाय भावनात्मक उत्तेजना और राष्ट्रवादी उन्माद का मंच बन जाती हैं। इस प्रक्रिया में जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रश्न भी सरल और पक्षपाती कथाओं में बदल दिए जाते हैं—जहाँ एक पक्ष पूरी तरह ‘नायक’ और दूसरा ‘खलनायक’ के रूप में प्रस्तुत होता है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मामलों में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट हो जाती है। पश्चिमी शक्तियों की विदेश नीति के प्रति एक प्रकार का अनकहा झुकाव भारतीय मीडिया में लंबे समय से देखा जाता रहा है। वैश्विक सूचना प्रवाह में पश्चिमी एजेंसियों की प्रधानता भी इस झुकाव को मजबूत करती है। जब पश्चिमी मीडिया किसी देश या नेता को नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है, तो वही दृष्टिकोण अक्सर भारतीय मीडिया में भी दोहराया जाता है।

हाल के समय में पश्चिम एशिया की घटनाओं के संदर्भ में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से दिखाई दी है। जब तक कोई देश या शक्ति अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देती है, तब तक उसके प्रति सावधान और संतुलित भाषा का प्रयोग किया जाता है। लेकिन जैसे ही वह देश राजनीतिक या सैन्य दबाव में आता है, मीडिया के एक हिस्से में उसके विरुद्ध आलोचना का स्वर तेज हो जाता है। यह आलोचना अक्सर उस व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ कर देती है जिसमें संघर्ष उत्पन्न हुआ है।

ईरान के संदर्भ में भी कुछ ऐसा ही देखा जा सकता है। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा और वह अपेक्षाकृत अकेला दिखाई देने लगा, मीडिया के कई मंचों पर उसकी आलोचना का स्वर तीखा हो गया। इस आलोचना में यह कम दिखाई देता है कि क्षेत्रीय राजनीति कितनी जटिल है, किन ऐतिहासिक कारणों से संघर्ष पैदा हुए, और वैश्विक शक्तियों की भूमिका क्या रही। इसके बजाय विमर्श इस प्रकार निर्मित होता है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिकी और इजरायली दृष्टिकोण के करीब पहुँच जाता है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि इस पूरे विमर्श में प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की भूमिका भी लगातार चर्चा में रहती है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़रायल, ईरान, चीन और रूस। इन देशों की नीतियाँ और परस्पर प्रतिस्पर्धाएँ पश्चिम एशिया के संघर्षों को गहराई से प्रभावित करती हैं, परंतु मीडिया विमर्श में अक्सर इन जटिलताओं को सरल और पक्षपाती कथाओं में बदल दिया जाता है।

समस्या केवल किसी एक देश के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है, बल्कि उस बौद्धिक आलस्य की है जिसमें मीडिया स्वयं स्वतंत्र विश्लेषण करने की बजाय तैयार नैरेटिव को दोहराने लगता है। जब मीडिया सत्ता के साथ कदम मिलाकर चलता है, तब वह लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका खो देता है। उसकी बहसें नागरिकों को जानकारी देने के बजाय उन्हें एक खास दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।

मीडिया का यह जॉम्बीकरण लोकतंत्र के लिए खतरनाक है क्योंकि इससे सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता गिरती है। जब सूचना और विश्लेषण का स्रोत पक्षपाती हो जाता है, तो नागरिकों के लिए वास्तविकता को समझना कठिन हो जाता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह एक जागरूक और सूचित समाज पर निर्भर करता है। यदि सूचना का प्रमुख माध्यम ही आलोचनात्मक विवेक खो दे, तो लोकतंत्र की बौद्धिक नींव कमजोर होने लगती है।

इस स्थिति से निकलने का रास्ता मीडिया की पेशेवर नैतिकता को पुनर्जीवित करने में है। पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से प्रश्न करना, विविध दृष्टिकोणों को स्थान देना और तथ्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहना है। साथ ही समाज को भी मीडिया के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करनी होगी। जब तक दर्शक और पाठक विवेकपूर्ण अपेक्षाएँ नहीं रखेंगे, तब तक मीडिया पर स्वतंत्र और जिम्मेदार बनने का दबाव नहीं बनेगा।

इस प्रकार भारतीय मीडिया के जॉम्बीकरण का प्रश्न केवल मीडिया का प्रश्न नहीं है; यह लोकतंत्र, जनमत और बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी है। यदि मीडिया अपनी आलोचनात्मक चेतना को पुनः प्राप्त कर सके, तो वह फिर से लोकतांत्रिक समाज के जीवंत और जागरूक प्रहरी की भूमिका निभा सकता है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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