झारखंड : जिला प्रशासन, पुलिस के मनमानेपन का ग्रामीणों ने किया विरोध, झड़प में 14 ग्रामीण घायल 

शनिवार, 7 मार्च को झारखंड के गढ़वा जिला अंतर्गत रंका प्रखंड के ग्राम विश्रामपुर में जिला प्रशासन, पुलिस और ग्रामीणों के बीच झड़प होने की सूचना है जिसमें महिलाओं समेत 14 ग्रामीणों के घायल होने की खबर है।

मिली जानकारी के अनुसार जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन लगभग 40 से अधिक गाड़ियों के साथ गांव विश्रामपुर पहुंचे। बताया जाता है कि यह दल उत्तरी कोयल परियोजना (कुटकु मंडल डैम) से विस्थापित होने वाले लोगों को बसाने के लिए संभावित स्थलों का निरीक्षण एवं चिन्हित करने के उद्देश्य से गांव में आया था। ग्रामीणों का कहना है कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण कार्य के लिए ग्राम सभा की पूर्व अनुमति या सूचना नहीं दी गई थी। 

उल्लेखनीय है कि आदिवासी क्षेत्रों में भूमि, पुनर्वास या विकास से जुड़े किसी भी कार्य के लिए ग्राम सभा की जानकारी और सहमति आवश्यक मानी जाती है। यही वजह है कि अचानक इतनी बड़ी संख्या में प्रशासन और पुलिस बल के पहुंचने से गांव के लोगों में चिंता और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई।

इस स्थिति में गांव के ग्रामीणों ने आगे बढ़कर प्रशासन की गाड़ियों को रोककर उनसे पूछताछ की कि वे किस उद्देश्य से गांव में आए हैं और बिना ग्राम सभा की जानकारी के यह कार्य क्यों किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना था कि गांव की जमीन, जंगल और संसाधनों से जुड़े किसी भी निर्णय में ग्राम सभा की भूमिका सर्वोपरि होती है, इसलिए पहले ग्राम सभा को जानकारी देना जरूरी है।

ग्रामीणों द्वारा सवाल पूछे जाने के दौरान तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। आरोप है कि इसी दौरान पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा ग्रामीणों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की गई। इस घटना में गांव की महिलाओं के साथ भी अभद्र व्यवहार करते हुए मारपीट किए जाने के आरोप हैं। इससे गांव में भय और आक्रोश का माहौल बन गया है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन गांव में किसी भी प्रकार का सर्वेक्षण, भूमि चिन्हांकन या पुनर्वास से संबंधित कार्य करना चाहता है, तो सबसे पहले ग्राम सभा को सूचित कर उसकी अनुमति लेना आवश्यक है। बिना ग्राम सभा की सहमति के इस प्रकार की कार्रवाई करना स्थानीय समुदाय के अधिकारों और परंपराओं की अनदेखी माना जाता है।

ग्रामीणों द्वारा किए गए विरोध पर पुलिस प्रशासन द्वारा धक्कामुक्की में ग्राम विश्रामपुर के 14 महिला पुरूष घायल हुए हैं। 11 घायलों का इलाज रंका अस्पताल में कराया गया और उपचार के बाद वे अपने घर वापस लौट आए हैं। जबकि एक व्यक्ति को गंभीर चोट लगने के कारण रंका अस्पताल से बेहतर इलाज के लिए गढ़वा सदर अस्पताल रेफर कर दिया गया है।

इस घटना के बाद क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। ग्रामीणों ने मांग की है कि घटना की निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए तथा ग्राम सभा के अधिकारों का सम्मान करते हुए आगे की सभी प्रक्रियाएं पारदर्शी तरीके से की जाएं।

प्रशासनिक मनमाने पर सामाजिक कार्यकर्त्ता जेम्स हेरेंज कहते हैं कि गढ़वा जिला प्रशासन वनाधिकार कानून, भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार कानून अथवा राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण किस नियम नीति के तहत बिश्रामपुर के ग्राम सभा के वनभूमि में मण्डल डैम के विस्थापितों को पुनर्वासित कर रही है, यह बिल्कुल संदेहास्पद है।

अधिकारी चोरी छुपे पुनर्वास परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीण और जिला प्रशासन के बीच विवाद की जड़ यही है। वनाधिकार कानून की धारा 4 (5) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है – जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, किसी वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति या अन्य परम्परागत वन निवासियों का कोई सदस्य उसके अधिभोगाधीन वन भूमि से तब तक बेदखल नहीं किया जाएगा या हटाया नहीं जाएगा जब तक कि मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती है।

हेरेंज के अनुसार अब प्रशासन ने बर्रे के छत्ते में पत्थर उच्छाल ही दिया है तो इसकी कीमत तो प्रशासन को चुकाना ही पड़ेगा। ग्रामीण गैर आदिवासी अधिकारियों के खिलाफ सड़क और न्यायापालिका सहित सभी मोर्चे के लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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