भगत सिंह, लोहिया और साम्राज्यवाद की चुनौती

आज 23 मार्च के दिन शहीदे आजम भगत सिंह और डॉ. राम मनोहर लोहिया के जीवन और विचार का पुण्य स्मरण किए जाने की जितनी जरूरत है उतनी ही जरूरत है उनके विचारों की प्रासंगिकता तलाशने की। भारतीय समाज में यह जुमला बहुत आम है कि हर कोई चाहता है कि भगत सिंह पैदा हों लेकिन पड़ोसी के घर में। लेकिन किसी ने किसी को दूसरा भगत सिंह कहने का साहस नहीं जुटाया। दूसरी ओर जनेश्वर मिश्र को इलाहाबाद के लोग भले छोटे लोहिया कहें लेकिन इस पदवी पर तमाम लोग आपत्ति करते पाए जाते हैं।

23 मार्च 1931 को भगत सिंह को लाहौर में फांसी हुई थी जबकि 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में डॉ राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ था। डॉ. लोहिया के दिमाग में भगत सिंह की शहादत इतनी गहराई से पैठी हुई थी कि उन्होंने उस घटना के बाद जीते जी अपना जन्मदिन नहीं मनाया। भगत सिंह के प्रति यह सम्मान गांधी के साथियों के भीतर स्थायी भाव के तौर पर पैठा हुआ था। यह सम्मान भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी धाराओं के बीच के अंतरंग रिश्ते को प्रदर्शित करता है।

भले ही सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी लोग गांधी और भगत सिंह को लड़ाते रहें और ऐसा दिखाते रहें जैसे कि वे दोनों धाराएं अंग्रेजों से लड़ने के बजाय एक दूसरे से लड़ रही थीं पर जब भी आप गणेश शंकर विद्यार्थी, डॉ लोहिया और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे तमाम स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और विचार से गुजरेंगे तो पाएंगे यह बहस कुछ नासमझ लोगों और अधिक साम्राज्यवादी और सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा फैलाई गई है। 

संयोग देखिए कि समाजवाद का दर्शन और विचार जितना भगत सिंह को प्रिय था उतना ही डॉ. लोहिया को। भगत सिंह ने अगर दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन किया तो डॉ लोहिया 1934 में पटना में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में सहयोग दिया। भगत सिंह ने जीवन के आखिरी क्षणों में लेनिन को पढ़ते हुए और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे को चूमा तो डॉ लोहिया ने फकीरों का जीवन जीते हुए लोकतांत्रिक और समता मूलक समाज की स्थापना के लिए मात्र 57 साल की आयु में सैकड़ों सालों का संघर्ष कर डाला।

भगत सिंह और लोहिया दोनों ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध निर्भीकता से मोर्चा लिया और न तो कहीं माफी मांगी और न ही कोई संकीर्णता दिखाई। लेकिन उनके सपनों का समाजवाद आ नहीं पाया इसलिए आज फिर से साम्राज्यवाद और पूंजीवाद दुनिया को रौंदने निकल पड़े हैं। 

दुनिया को जीतने और उसे लूटने का जो काम ग्रेट ब्रिटेन यानी वर्तानिया हुकूमत ने उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में किया वही काम बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध में अमेरिका कर रहा है। इजराइल के साथ मिलकर अमेरिका ने जिस तरह से ईरान पर आक्रमण किया है उससे जाहिर हो गया है कि वह झूठ बोलकर और तरह तरह के बहाने बनाकर दुनिया के किसी भी हिस्से पर आक्रमण करके उसे तहस नहस कर सकता है। ईरान पर हमला करने से पहले अमेरिका ने वेनेजुएला, वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में हमला करके या खुफिया कार्रवाई करके तख्तापलट करवा चुका है।

अमेरिकी शह पर पश्चिम एशिया में इजराइल भी नरसंहार और विस्थापन की क्रूर कार्रवाइयां करता रहता है। वह फिलस्तीनियों को खत्म करने के लिए सारे मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय नियमों कानूनों को तोड़ सकता है। दो साल में फिलस्तीन में सत्तर-अस्सी हजार लोगों को मारना और अभी हाल में ईरान के एक स्कूल पर मिसाइलें गिराकर 180 छात्राओं का नरसंहार उसी नीति का प्रमाण है। अब वह सीरिया और लेबनान को हड़प कर ग्रेटर इजराइल का सपना देख रहा है। 

साम्राज्यवाद के इस नए और एपस्टीन फाइल की अनैतिकता तक पहुंच चुकी नीति के दौर में डॉ. लोहिया और भगत सिंह के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष और समाजवाद के सपनों के नए सिरे से स्मरण की आवश्यकता है। साम्राज्यवाद अगर आज नहीं रोका गया तो कल को यह पूरी दुनिया के संसाधनों पर कब्जा करने के लिए कभी भी किसी देश का तख्तापलट करवाता रहेगा। इसी संदर्भ में डॉ लोहिया की सप्तक्रांति का वह विचार महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिसमें उन्होंने अणु बम के विरुद्ध सत्याग्रह का आह्वान किया था।

डॉ लोहिया ने 1964 में अमेरिका में कहा था कि अमेरिका और सोवियत संघ को हथियारों पर खर्च करने के बजाय दुनिया से गरीबी मिटाने में अपने संसाधन झोंकने चाहिए। हथियारों की होड़ में सोवियत संघ को ध्वस्त हो गया और अब अमेरिका दुनिया को ध्वस्त करने पर तुल गया है। अमेरिका को फिर से महान बनाने का स्वप्न दरअसल किसी और को महान न बनने देने का स्वप्न है।

डॉ लोहिया तो साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों की आलोचना करते हुए कहते थे कि वे दोनों युद्ध के सिद्धांत पर टिके हैं। इसलिए एक तीसरे विकल्प की आवश्यकता है। वे न तो मनुष्य का मनुष्य द्वारा शोषण चाहते थे और न ही न ही किसी राष्ट्र द्वारा किसी दूसरे राष्ट्र का शोषण। शोषण के विरुद्ध संघर्ष करना और शोषण विहीन समाज बनाने का सपना भगत सिंह का भी था। उनके इंकलाब का यही अर्थ था। लोहिया को जीवन ने भगत सिंह के मुकाबले संघर्ष करने और राजनीति करने का लंबा मौका दिया इसलिए उन्होंने यह महसूस किया कि साम्राज्यवाद महज सत्ता हस्तांतरण से समाप्त नहीं होता।

उसके तमाम चिह्न और प्रतीक लंबे समय तक बने रहते हैं। सबसे बड़ा औजार तो भाषा है जो साम्राज्यवाद को परोक्ष रूप से मजबूत करता है। साम्राज्यवाद को मजबूत करने या नए सिरे से हावी होने देने में मशीन यानी प्रौद्योगिकी और पूंजी का भी योगदान होता है। इसलिए उन्होंने जहां अंग्रेजी की जगह पर हिंदी के लिए अभियान चलाया वहीं पश्चिमी प्रौद्योगिकी से चमत्कृत होने के बजाय उपयुक्त प्रौद्योगिकी की पैरवी की थी। दूसरी ओर भगत सिंह जानते थे कि पंजाब में हिंदी को सांप्रदायिकता फैलाने का औजार बनाया जा रहा है इसलिए उन्होंने सांप्रदायिक भाषा नीति का विरोध किया था। भगत सिंह जब भी दस मई के शुभ दिन का आह्वान करते थे तो उनकी कल्पना में भारत की साझी विरासत हुआ करती थी।

डॉ लोहिया को इस बात का आभास था कि अगर पूरी दुनिया में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बराबरी नहीं आएगी तो किसी एक देश का लोकतंत्र सदैव संकट में रहेगा। यह बात हम मौजूदा विश्व व्यवस्था में आए संकट के तौर पर देख सकते हैं। दुनिया का सबसे पुराना और शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश अमेरिका पूरी दुनिया में लोकतंत्र की हत्या करता घूम रहा है। कहीं वह राजशाही कायम करवा रहा है तो कहीं सैनिक शासन को समर्थन दे रहा है।

किसी किसी देश में तो वह आतंकवादी को भी राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर स्वीकार कर ले रहा है। यानी हर जगह उसे अपनी कठपुतली सरकारें चाहिए चाहे वे लोकतांत्रिक हों या न हों। इन्हीं स्थितियों का आभास करते हुए डॉ लोहिया ने संयुक्त राष्ट्र से अलग एक विश्व सरकार के गठन का आह्वान किया था। डॉ लोहिया का मानना था कि यह सरकार पूरी दुनिया से चुनी जानी चाहिए। उसके पास दुनिया के मसलों को बातचीत से हल करने का अधिकार होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय मामलों में बल प्रयोग का अधिकार भी उसके पास होना चाहिए।

महात्मा गांधी तो अणु बम के विरुद्ध थे ही उनके नेतृत्व में काम करने वाले पंडित जवाहर लाल नेहरू और डॉ लोहिया भी परमाणु हथियार के विरुद्ध थे। डॉ लोहिया तो घरेलू मामलों में भी हथियार प्रयोग का समर्थन नहीं करते थे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध देखा था और धर्मवीर भारती का अंधा युग पढ़ा था जिसमें डॉ भारती ने युद्धोपरांत की स्थितियों का वर्णन करते हुए कहा थाः—–

यह अंधायुग अवतरित हुआ 

जिसमें स्थितियां मनोवृत्तियां

आत्माएं सब विकृत हैं

यह अजब युद्ध है

 नहीं किसी की भी जय

दोनों पक्षों को खोना ही खोना है

अंधों से शोभित था युग का सिंहासन

दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा

दोनों ही पक्षों में जीता अंधापन

भय का अंधापन, ममता का अंधापन

अधिकारों का अंधापन जीत गया

 जो कुछ सुंदर था, शुभ था, कोमलतम था

 वह हार गया, द्वापर युग बीत गया।।

जो पूंजीवाद धृतराष्ट्र के दरबार में पिछले पैंतीस सालों से उदारीकरण और वैश्वीकरण की द्युत क्रीड़ा के माध्यम से दुनिया को ठग रहा था और सोच रहा था कि मानवता को कुछ वर्षों के लिए वनवास देने से वह मर जाएगी। लेकिन वैसा हुआ नहीं। मानवता को कहीं राष्ट्रीय संप्रभुता तो कहीं नागरिक स्वतंत्रता के रूप में जीवित देखकर पूंजीवाद और भी नग्न रूप में उपस्थित हो गया। इसलिए अब पूंजीवाद अपने पितृदेश को छोड़कर कहीं भी न्यूनतम संप्रभुता और स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं है। यही इस दौर का साम्राज्यवाद है। ऐसे में बिना किसी मतभेद और टकराव के भगत सिंह और लोहिया के विचार देश और दुनिया का आह्वान कर रहे हैं कि वह साम्राज्यवाद के विरुद्ध इक्कीसवीं सदी की लड़ाई के लिए तैयार रहे।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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