उत्तराखंड : इतिहास में ठहरे प्रेम से प्यार और वर्तमान में बहते प्रेम से घृणा

2022 के अगस्त के महीने की 27 तारीख को उत्तराखंड के पहाड़ों पर जितना पानी बरस रहा था, उतनी ही बरस रही थी घृणा की आगI ये घृणा की आग किस पर बरस रही थी? क्या किसी देश के दुश्मन पर? नहीं ! ये आग बरस रही थी वहां के एक दलित परI लेकिन उस पर आग क्यों बरस रही थी? इसलिए क्योंकि उसने प्रेम किया थाI और प्रेम करते हुए वो भूल गया था कि वो उत्तराखंड में रहता हैI उस उत्तराखंड में जहाँ प्रेम करने की मनाही हैI खास तौर पर प्रतिलोम प्रेम तो वहां पूरी तरह से प्रतिबंधित हैI

और प्रतिलोम प्रेम की सजा मौत से कम नहीं हैI प्रतिलोम प्रेम यानि एक दलित द्वारा, किसी सवर्ण महिला से प्यार करनाI ये मनुस्मृति का ही प्रभाव था कि जोग सिंह, भावना, और गोविन्द सिंह तीनों 1 सितम्बर 2022 को जगदीश चंद्र की लाश को ठिकाने लगाने का प्रयास कर रहे थेI वो जगदीश चंद्र जिसकी हत्या इन तीनों ने मिलकर की थीI 

जगदीश चंद्र ने चार दिन पहले ही गीता से शादी की थीI लेकिन मनुवाद की शिक्षा में दीक्षित गीता का बाप, उसकी सौतेली माँ, और सौतेला भाई उस शादी को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने जगदीश की हत्या कर दीI  जोग सिंह, भावना, और गोविन्द सिंह उत्तराखंड के उन्हीं लोगों में से थे जिनको शहर के लोग “सीधे-सादे” मानते हैंI

जगदीश चंद्र ने प्रेम किया थाI वह एक दलित था और उसने सवर्ण गीता से प्यार किया थाI गीता भी जगदीश से प्यार करती थीI लेकिन उत्तराखंड के मनुवादियों को यह ऐसा अपराध लगा, जिसके लिए मनुवादी मौत से कम सजा नहीं देना चाहते थेI और उन्होंने जगदीश को मौत की सजा दीI जोग सिंह गीता का बाप, भावना उसकी सौतेली माँ, और गोविन्द सिंह उसका सौतेला भाई थाI  

वैसे तो उत्तराखंड में प्रेम विकसित नहीं होताI अगर होता भी है तो ब्राह्मणवादी जीवन दर्शन की सीमाओं में होता हैI मनुस्मृति में मनु ने दो तरह के विवाह बताये हैंI अनुलोम और प्रतिलोम विवाह किसी औरत का अपनी या अपने से ऊँची जाति में विवाह करना अनुलोम विवाह माना जाता हैI जब कोई स्त्री अपने से नीची जात के पुरुष से विवाह करती है तो ऐसे विवाह को मनु ने प्रतिलोम विवाह कहा हैI मनु ने प्रतिलोम विवाह को अधार्मिक और समाज के लिए हानिकारक बताया है।(मनुस्मृति, अध्याय 10, श्लोक 5-25 और अन्य)I

जगदीश चंद्र को उत्तराखंड के “सीधे-साधे” लोगों ने मनुवाद का शिकार बनायाI

यह घटना गवाही देती है कि आज भी उत्तराखंड में प्रेम को उसकी स्वाभाविकता में जीने का अधिकार नहीं है। जब-तक समाज में जाति का घमंड इंसानियत और भावनाओं से ऊपर रहेगा, तब तक जगदीश चंद्र और गीता जैसे अनगिनत प्रेमियों की कहानियाँ इसी तरह मौत के सन्नाटे में खोती रहेंगी।

उत्तराखंड यानि ‘सवर्णतंत्र’

महेश सी डोनिया एक वरिष्ठ लेखक और स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं I वे लंबे समय से ‘कोबरापोस्ट’ जैसे संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उन्होंने ‘द कारवां’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के लिए महत्वपूर्ण लेख लिखे हैं। उनका लेखन अक्सर जाति व्यवस्था, उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और ‘सवर्णतंत्र’ जैसे विषयों पर केंद्रित रहता है। कारवाँ के लिए लिखे गए अपने एक लम्बे लेख में वे लिखते हैं कि: 

“अपने लंबे दिल्ली प्रवास के दौरान मैंने लोगों को यह कहते सुना है कि उत्तराखंड एक अमन पसंद जगह है और पहाड़ी सुकून भरे सीधे-सादे लोग हैं। मगर जिस उत्तराखंड में मैं पला-बढ़ा हूं उसका यथार्थ इस छवि से कोसों दूर है। मैं तब हाईस्कूल से पास होकर निकला ही था कि मेरे राज्य में 14 दलितों का संहार सिर्फ़ इसलिए कर दिया गया था कि अपनी बारात में एक दलित दूल्हे ने डोला-पालकी पर जाने की हिमाकत की थी।

मुझे एक दलित युवती का भी स्मरण हो आता जिसका सिर मुंडवा उसे नंगा करके पूरे गांव में घुमाया गया और फिर उसके मुंह में मानव-मल ठूंस दिया गया था। उसका अपराध इतना था कि उसने अपने कारीगर पति के काम का मेहनताना मांगने की ज़ुर्रत की थी। मेरे पास उत्तराखंड में आदिजन दलितों के साथ होने वाले बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों/अत्याचारों की लंबी फ़ेहरिस्त है।”

महेश डोनिया अपने उसी लेख में उत्तराखंड के उत्तरकाशी में घटी दलित उत्पीड़न की एक और घटना को दर्ज करते हैंI उन्होंने लिखा कि उत्तराखण्ड “राज्य आंदोलन के चरम पर इस क्षेत्र के हालिया इतिहास का सबसे शर्मनाक और दिल दहला देने वाला अत्याचार भी होता देखा गया। यह घटना उत्तरकाशी जिले के पुरोला की दलित महिला अतोला देवी के साथ जून 1996 में घटी थी।

आतोला के राजमिस्त्री पति ने कंताड़ी गांव का मंदिर बनाया था। सो एक दिन अतोला कंताड़ी गांव गईं और उन्होंने ग्राम प्रधान से, जो जाति से ठाकुर था, अपने पति की मज़दूरी मांगी। अतोला ने मुझे बताया, ‘त्रिपन सिंह ने मुझे गाली देना शुरू कर दिया। उसने मुझसे कहा, ‘अरे डूमड़ी, तूने मंदिर छूकर उसे अपवित्र कर दिया है’. तो मैंने जवाब दिया, ‘मेरे पति ने जो मंदिर बनाया वह मेरे छूने से कैसे अपवित्र हो सकता है?’

इसी बीच गांव के सभी ठाकुरों ने अतोला को घेर लिया और त्रिपन सिंह के कहने पर उसे बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया। अतोला ने मुझे बताया, ‘उन्होंने मेरे कपड़े फाड़ दिए, मेरा सिर मुंडवा दिया और मेरे चेहरे पर कालिख पोतकर मुझे नग्न करके पूरे गांव में घुमाया।’ अब 63 वर्ष की अतोला के बाएं हाथ पर दरांती के वार का निशान है। उनके हमलावरों ने उसे पंचायत घर में बंद कर दिया और उसी शाम उसे ‘मंदिर में तोड़फोड़’ के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया।”

ये उत्तराखंड के उन लोगों द्वारा किया गया अपराध था जिन्हें अनेक लोग “सीधे-सादे” मानते हैंI यही कारण है कि मोहन मुक्त ने अपने काव्य संकलन “हम खत्म करेंगे” की एक कविता में लिखा है कि – 

“सैलानियों को लगता है 

कि बहुत ठंडा है पहाड़

लेकिन

वे उनसे कभी नहीं मिले

जो रोते हैं तो टपकता है

लावा पहाड़ पर”

राजुला-मालूशाही तथा  गोपीदास और उसकी सवर्ण प्रेमिका

पहाड़ों से प्रेम और पहाड़ों पर प्रेम—सुनने में ये दोनों ही वाक्य सुखद प्रतीत होते हैं, लेकिन धरातल पर इनकी सच्चाई बेहद विरोधाभासी है। पहाड़ों से प्रेम करना तो फिर भी संभव है, लेकिन पहाड़ों पर प्रेम करना अक्सर एक सुखद अनुभव के बजाय एक दुर्गम संघर्ष और मर्मभेदी पीड़ा बनकर रह जाता है।

विशेषकर तब, जब प्रेम करने वाले हाथ दो अलग-अलग जातियों से आते हों। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की मिट्टी में एक ऐसी ही कहानी दफन है, जो लोकगाथाओं द्वारा पैदा किये जाने वाले भ्रम और सामाजिक रूढ़ियों के अंधेरे के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है I यह कहानी है शिल्पकार गोपीदास की।

कुमाऊं में ‘राजुला-मालूशाही’ की प्रेम कहानी वहां के लोगों के मानस में रची-बसी संवेदना है। लेकिन क्या वह संवेदना जीवन के धरातल पर भी उतरती है या उसका अस्तित्व केवल भाववादी है? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर पहाड़ पर दलित बनकर रहने से बड़ी आसानी से मिल जाता है I  

उत्तराखंड में एक जगह है चौखुटियाI वहां के प्रतापी कत्यूरी राजकुमार मालूशाही और दारमा घाटी के शौका व्यापारी सुनपति की बेटी राजुला के प्रेम की कथा को आज भी गर्व और खुशी के साथ गाया जाता है। इस कहानी पर अनगिनत लोकगीत बने हैं, जिन्हें ‘हुड़किया बौल’ या जागरों के माध्यम से अमर कर दिया गया है। समाज इस राजसी प्रेम को अपनी संस्कृति का मुकुट मानता है।

लेकिन यहाँ एक प्रश्न खड़ा होता है: क्या समाज प्रेम की इस पवित्रता को हर स्तर पर स्वीकार करता है, या यह केवल राजाओं और ऐतिहासिक पात्रों तक सीमित है?

जिस व्यक्ति ने ‘राजुला-मालूशाही’ की राजसी प्रेम कहानी को अपने कंठ से घर-घर पहुँचाया, वो थे गोपीदास। गोपीदास का जन्म ‘दास’ कहे जाने वाले हरिजन परिवार में हुआ था। गायन की समृद्ध परंपरा उनके परिवार की विरासत थी, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थी। एक दर्जी के बेटे की आवाज़ में वह जादू था कि जब वे राजुला-मालूशाही के प्रेम की पीड़ा और मिलन को गाते थे, तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

तो हम गोपी दास की बात कर रहे हैंI गायक गोपीदास। शिल्पकार गोपीदास I प्रेमी गोपीदास I  

जर्मनी के विख्यात मानवशास्त्री और भारत के अध्येता कोनराड माइजनर ने गोपीदास की कालजयी आवाज़ में ‘राजुला-मालूशाही’ की अमर गाथा को लिपिबद्ध और रिकॉर्ड किया। माइजनर ने उनकी लगभग साढ़े नौ घंटे की विस्तृत गायकी को रिकॉर्ड किया, जिसे स्वयं गोपीदास अपनी विशिष्ट शैली में ‘बैरागी राग’ की संज्ञा देते थे।

गोपीदास के स्वर में रची-बसी यह अमूल्य सांस्कृतिक निधि आज भी जर्मनी के म्यूनिख विश्वविद्यालय सुरक्षित है। उनकी ख्याति की गूँज केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनकी आवाज़ के रिकॉर्ड जर्मनी तक पहुँच गये। माइजनर वैश्विक स्तर पर गोपीदास के गायन के वाहक बने।

उत्तराखंड के महान गायक गोपीदास के साथ अपनी पहली मुलाक़ात को याद करते हुए माइजनर ने लिखा है कि – 

गोपीदास से 1966 में हुई पहली मुलाकात को मैं भूल नहीं सकता। एक मित्र अध्यापक मुझे कौसानी के उत्तरी उलार में स्थित गोपीदास के घर ले गये। यहां से नन्दादेवी तथा त्रिशूल आदि के शिखरों का भव्य दृश्य है। अपने घर की देहरी में गोपीदास बैठा था। किसी बीमारी ने उसकी त्वचा को घेरा था, अतः उसने हाथ ढंके थे। मेरे अभिवादन करने से पहले ही उसने हाथ उठा कर मुझे दिखाये। दरअसल उसने समझा था कि मैं कुछ सिलाने आया हूँ और असमर्थता जाहिर की। मैं इस समय द्रवित हो गया था।

उसने मेरे लिये और जर्मनी के लोगों के लिए मालूशाही गाई। जिस अनाशक्ति आश्रम में गांधी रहे थे, वहां उसने 9.30 घंटे तक गाया। एक हुड़का और एक सहयोगी गायक उसके साथ थे। जब वह मालूशाही गाता था, वह प्रसन्न और संतुष्ट रहता था। गाता तो वह और भी बहुत कुछ था पर जाना जाता था मालूशाही गायक के रूप में ही – गोपी दास मालूशाही वाला। वह मालूशाही को ‘बैरागी राग’ कहता था.

गोपीदास की गायन शैली का समग्र विश्लेषण कठिन है। पर यह कहा जा सकता है कि उसकी धुनें पाठ (टैक्स्ट) पर आधारित हैं। संगीत का कोई पैमाना इनमें नहीं है। जैसा कि मोहन उप्रेती कहते हैं, गोपीदास कीन्न और रंगों से भरा है।”

गोपीदास के स्वर में गूंजती ‘राजुला-मालूशाही’ की प्रेमकथा की धमक जर्मनी तक जा पहुँची, लेकिन  स्वयं उनके प्रेम को पहाड़ की विशाल वादियों में एक इंच स्थान भी न मिल सका। जिस कलाकार की आवाज़ दशकों तक पहाड़ का गौरव बनी रही, उसे एक ब्राह्मण लड़की से प्रेम करने के अपराध में अपने पैतृक घर और जड़ो से दूर होकर प्राण बचाकर भागना पड़ा। वह किनसे जान बचाकर भागता रहा, भागता रहाI उन्हीं लोगों जो सुदूर इतिहास की एक प्रेम कहानी पर झूमते हैंI लेकिन वर्तमान में किसी प्रेम को स्वीकार नहीं करतेI 

विडंबना देखिए, जिस गोपीदास ने राजकुमार और व्यापारी की बेटी के प्रेम को गीतों के माध्यम से अमर कर दिया, उसी गोपीदास को जब स्वयं के जीवन में प्रेम हुआ, तो समाज ने उन्हें अपराधी बना दिया। गोपीदास का प्रेम एक सवर्ण लड़की से था। यह प्रेम किसी काल्पनिक गाथा का हिस्सा नहीं था, बल्कि हाड़-मांस के दो इंसानों का जीवित सत्य था। लेकिन जैसे ही यह खबर समाज तक पहुँची, दशकों तक पहाड़ों का चहेता रहा कलाकार रातों-रात तिरस्कार का पात्र बन गया।

पहाड़ की कंदराओं में दफ़न इस कहानी को ‘राजुला-मालूशाही’ जैसा यश कभी प्राप्त नहीं हो सका। इसका कारण स्पष्ट है—यह किसी वैभवशाली राजा की गाथा नहीं, बल्कि हरिजन गोपीदास और एक सवर्ण लड़की के अटूट अनुराग की त्रासदी है। इस प्रेम पर लोकगीत नहीं लिखे जाते, न ही इसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है; इसके विपरीत, ऐसा साहस करने पर गोपीदास को कोसी की लहरों में बहा देने का क्रूर फरमान सुनाया जाता है।

समाज की संकीर्ण चेतना गोपीदास और एक सवर्ण लड़की के प्रेम को कभी स्वीकार नहीं कर सकती; वास्तव में, वह इसे स्वीकार करना ही नहीं चाहती। जो लोग स्थापित मर्यादाओं की लीक से हटने का साहस करते हैं, समाज न केवल उन्हें विस्मृत कर देना चाहता है, बल्कि इस संपूर्ण वसुधा से उनका नामो-निशान मिटा देने को आतुर रहता है।

समाज का दोहरा चरित्र यहाँ पूरी नग्नता के साथ प्रकट होता है। समाज को गोपीदास की ‘कला’ प्रिय थी, लेकिन उसका ‘अस्तित्व’ नहीं। उसे वह प्रेम-गीत तो पसंद थे जो किसी दूरस्थ अतीत के राजा-रानी के थे, लेकिन वह उस प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सका जो उसके अपने वर्तमान में एक हरिजन युवक और सवर्ण लड़की के बीच पनप रहा था। समाज ने ऐलान किया कि गोपीदास को काटकर कोसी नदी में बहा दिया जाएगा। गोपीदास को अपने पैतृक घर, अपनी जड़ों और अपने काम को छोड़कर जाना पड़ा। 

उत्तराखंड के उत्सव में जातीय हिंसा पर हर्षोल्लास

कारवां के अपने लेख में महेश डोनिया ने लिखा कि कभी आप मई और जून के बीच गढ़वाल के टिहरी राजाओं की राजधानी रहे श्रीनगर से लगभग 60 किलोमीटर दूर खिर्सू के आस-पास के गांव जाएंगे, तो आपको एक अजीबोग़रीब नज़ारा देखने को मिलेगा। इस तमाशे में एक ऊंची चट्टान से बंधी रस्सी से लकड़ी की एक मानवाकृति को लगभग नीचे खाई की ओर धकेल दिया जाता है, जो नीचे गिरते ही पत्थर से टकराकर चकनाचूर हो जाती है।

यह प्रथा ‘भेटवारी’ (कठबद्दी मेला) कही जाती है जिसे सभी ग्रामवासी हर्षोल्लास से मनाते हैं। डेढ़ शताब्दी पहले यह प्रथा अपने क्रूरतम स्वरूप में मनाई जाती थी। लकड़ी की मानवाकृति की जगह जीता-जागता दलित व्यक्ति इसका मुख्य पात्र होता था। ऊंची जातियों की करतल-ध्वनि और हर्षोल्लास के बीच दलित बद्दी को ख़ुद को लकड़ी की काठी पर रस्सी से बांधकर नीचे ख़तरनाक खाई में फिसलना पड़ता था। अगर वह अग्निपरीक्षा में विफल रहता था तो, ‘आसपास के दर्शक तत्काल तलवार से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिया करते थेI’

तत्कालीन ब्रिटिश सिविल सेवा अधिकारी एडविन टी. एटकिंसन ने 1882 में प्रकाशित अपने विशाल ग्रंथ द हिमालयन गजेटियर में इस क्रूर अनुष्ठान का विस्तार से वर्णन किया है। (यमुना दत्त वैष्णव की किताब कुमाऊँ के इस्तिहास के पृष्ठ 304 और 306 पर उद्धरित)।  

उत्तराखंड में “भेटवारी” अनुष्ठान आज भी इस इलाके में एक पवित्र धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है जो हमें उत्तराखंडी ब्राह्मणवाद के बारे में बहुत कुछ बताता है। उत्तराखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली ‘भेटवारी’ प्रथा दलितों को आतंकित करने का एक संहिताबद्ध औज़ार थी। इसका दलितों को स्पष्ट संदेश था कि इस भूमि में अपना अस्तित्व पशुओं से ज़्यादा समझने की अपेक्षा न रखें। …. यह हिंसा उस खुली नफ़रत का इज़हार है जो ऊंची जातियों के मन में हम दलितों के प्रति है। इस तरह के अनुष्ठान उच्च जातियों के द्वारा इन पहाड़ों के औपनिवेशीकरण और आदिजन दलितों की दासता के एक लंबे इतिहास को बताते हैं।”

दलित प्रेम-कथा गा सकता है, लेकिन प्रेम कर नहीं सकता

यह कितनी भयानक त्रासदी है कि गोपीदास, जिसने एक प्रेम कथा को दुनिया के नक्शे पर रखा, उसे अपनी और अपनी प्रेमिका की जान बचाने के लिए अपनी ही मिट्टी से निर्वासित होना पड़ा। जिसमें प्रेम जैसे पवित्र भाव के कारण प्राण संकट में पड़ जाएँ, तो माना जाना चाहिए कि वह समाज नैतिक रूप से गिरा हुआ है।

कवि मोहन मुक्त अपने काव्य संग्रह “हम खत्म करेंगे” की एक कविता में गोपीदास के प्रेम और राजुला-मालूशाही की प्रेम कहानी की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए लिखते हैं कि एक गिरे हुए समाज में:

“दलित प्रेम गा सकता है, 

प्रेम खा सकता है,

प्रेम पी सकता है,

लेकिन वह प्रेम जी नहीं सकता।” ( हम खत्म करेंगे. पृष्ठ 93)I

पहाड़ों की कोख से न जाने कितनी ही प्रेम गाथाएं जन्म लेती हैं, लेकिन उन्हें परिपक्व होने से पूर्व ही रूढ़ियों की संकीर्ण गलियों में दम घोटकर समाप्त कर दिया जाता है। तथाकथित जातिगत श्रेष्ठता का दंभ आज भी यह तय करने का दुस्साहस करता है कि प्रेम जैसा नैसर्गिक और स्वाभाविक भाव किन सीमाओं में बँधा होना चाहिए।

गोपीदास को गीत गाने की आज़ादी तो दी गई, लेकिन अपने जीवन की प्रेम-कथा रचने का अधिकार उसे नहीं था। प्रेम को जाति और मर्यादा की बेड़ियों में जकड़ने वाला यह समाज भूल जाता है कि जिस कला पर वह मुग्ध है, वह उसी हृदय से निकली है जिसे वह प्रेम करने के अयोग्य मानता है।

समाज उन स्त्रियों के अस्तित्व को जड़ से मिटा देने पर उतारू रहता है, जो अपनी पसंद का वर चुनकर स्वयं के अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेती हैं। मोहन मुक्त ने अपनी इसी कविता में निम्नांकित पंक्तियों के माध्यम से इस बात को बखूबी चिन्हित किया है। 

“वो नाम

 जिस नाम की गुड़िया बनाई होगी परिवार ने

 गुड़िया के मुँह पर इंसानी मल लगाया होगा

 और इस तरह उसका नाम मिटाया होगा

 वो नाम बदबू जैसा बहिष्कृत”

समाज ऐसी साहसी नायिकाओं को अपमानजनक उपनामों से लांछित करता है; वह उनके मुख पर अपनी जातीय कुंठा और पराजय की कालिख पोतकर उन्हें मुख्यधारा से बहिष्कृत कर देता है। विडंबना यह है कि जो समाज जो यथार्थ की नायिकाओं को तिरस्कृत करता है, वही समाज लोकगाथा की ‘राजुला’ को सम्मान के ऊँचे आसन पर बैठाता है। समाज के लिए अतीत की राजुला पूजनीय है, लेकिन वर्तमान की वह स्त्री असहनीय है जो अपनी स्वतंत्रता का परिचय देती है I जहाँ लोक-मानस केवल राजा-महाराजाओं की पौराणिक कथाओं पर मुग्ध है, वहीं एक सजग कवि मोहन मुक्त ऐसी साहसी स्त्रियों को ‘महानायिका’ की संज्ञा देता है।

गोपीदास की व्यथा पहाड़ की उन अनगिनत प्रेम-कथाओं का प्रतिनिधित्व करती है, जिनका अंत सदैव एक जैसा—करुण और दुखांत—होता है। समाज इस दमन पर मौन साधे रहता है; उसे इन प्रेमियों का नाम लेना भी स्वीकार्य नहींI क्योंकि उसे डर है कि मात्र नामोच्चारण से ही उसकी तथाकथित पवित्रता खंडित हो जाएगी। सत्य यही है कि मनुवादी समाज, एक दलित युवक के साथ सवर्ण लड़की के नाम तक को सहन नहीं कर पाता, क्योंकि यह उसके सदियों पुराने ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक ढांचे के अनुरूप नहीं है।

यह एक अत्यंत कटु और त्रासद सत्य है कि कोई दलित व्यक्ति समाज में चाहे कितना ही प्रतिष्ठित पद अथवा स्थान क्यों न प्राप्त कर ले, किंतु मनुवाद का विषैला जाल उसे कभी मुक्त नहीं होने देता। मनुवादी विष के कारण सुंदर प्रेम कहानियों को खूनी घटनाओं में बदलते देर नहीं लगतीI क्योंकि समाज अपने संकुचित और कुंठित मनुवादी पूर्वाग्रहों से निर्मित नियमों की कसौटी पर प्रेम को तौलते हुए, अंततः प्रेम का ही गला घोंट देता है। इसलिए मनुवाद मानवता और लोकतंत्र के विकास की राह में रोड़ा हैI 

प्रेम को ‘प्रेम’ रहने देना ही किसी समाज के सभ्य, मानवीय, और लोकतान्त्रिक होने की एक जरूरी शर्त है।

(फोटो ‘पहाड़’ से साभार)

(लेखक : बीरेंद्र सिंह रावत और भावना रिखारी। रावत दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा शास्त्र विभाग में कार्यरत हैं और रिखारी डीयू में ही बीएड की विद्यार्थी हैं।)  

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