लफ्फाजी हो तो शिवराज सिंह जैसी हो…

जब वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो प्रदेश के लोग उनकी हर दिन आठ-दस की दर से की जाने वाली घोषणाओं को सुनकर प्यार से 1984 की एक फिल्म के जुमले “मूंछें हो तो नत्थूलाल जैसी हों” को आगे बढाते हुए कहा करते थे कि लफ्फाजी हो तो शिवराज सिंह जैसी हो।

शिवराज पदोन्नत हुए – भले उन्होंने इसे पदोन्नति की बजाय पदावनति माना – मगर रोते-बिसूरते ही सही, अंतत: मध्यप्रदेश से उठकर दिल्ली पहुँच गए और मन्दसौर के किसानों के खून में लिथड़े इनके हाथों को देखकर मोदी सरकार में भारत के कृषि और किसान कल्याण मंत्री बना दिए गए। नई जगह, नयी जिम्मेदारी पुराने स्वभाव को बदल दे ऐसी कमजोर परवरिश उस विचारधारा की नहीं है जिसमें शिवराज पले-बढ़े और बड़े हुए हैं।

सो लफ्फाजियों के जो कारनामे उन्होंने मध्यप्रदेश में दिखाए थे उन्हें यहाँ भी जारी रखा। अब मैदान ज्यादा बड़ा मिला तो फेंकने का आयाम भी बढ़ा। जुबान चलाने में वैसे भी कोई पैसा खर्च नहीं होता सो जो चाहें वह बोला जा सकता है। कथित मुख्य धारा मीडिया पालतू है, सो न कोई पूछ होगी न ताछ, न समीक्षा होगी, न पड़ताल : इसलिए जितना विराट झूठ बोला जा सकता है उतना बोला जाए। यहाँ और भी आसान था क्योंकि यहाँ उनसे भी ज्यादा बड़े वाले सिद्ध बैठे हुए थे।

इस बार इस आदत का मुजाहिरा करने के लिए उन्होंने संसद का मंच चुना। केंद्रीय कृषि मंत्री  के रूप में बोलते हुए संसद में उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के कई किसानों की आय दोगुनी, तिगुनी, चौगुनी और कुछ मामलों में तो आठ गुना तक बढ़ गई है। वे लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान विपक्ष द्वारा किसानों की आय दोगुनी नहीं किये जाने से जुड़े सवालों का जवाब दे रहे थे।

एक झूठ को सही साबित करने के लिए अनेक झूठ और बोलने पड़ते हैं सो वो भी बोले गये। बजट के आंकड़े गिनाये,  2014 के बाद से खाद्यान्न उत्पादन में 44% की वृद्धि का हवाला दिया। लागत पर कम से कम 50% लाभ जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य –एमएसपी- के निर्धारण का दम भरा। बिना कोई तथ्य दिए रिकॉर्ड मात्रा में खाद्यान्न की खरीद की बात कही। पीएम-किसान सम्मान निधि के तहत सालाना ₹6,000 की सीधी आर्थिक सहायता की गिनती गिनाई।

खाद पर दी जाने वाली कथित भारी सब्सिडी का जोड़ लगाया। यहाँ तक कि ‘डिजिटल किसान आईडी’ बनाने के काम को भी किसानों की आय के साथ नत्थी कर दिया।  दावा यहाँ तक ठोक दिया कि मध्य प्रदेश में किसान साल में तीन-तीन फसलें ले रहे हैं, जिससे उनकी आय में बढ़ोतरी हुई है। खैरियत रही कि सांस में ली जाने वाली हवा वगैरा को उन्होंने आमदनी में नहीं जोड़ा।

जिस दिन शिवराज संसद में यह लफ्फाजी कर रहे थे ठीक उसके एक दिन पहले पंजाब के दो किसानों जसकरण सिंह और जसविंदर सिंह ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इनकी पीड़ा फसल से आमदनी घटते जाने के चलते भारी कर्ज में डूब जाने की थी। अखबारों में छपी जानकारी के अनुसार, पंजाब के कोटकपुरा के ये दोनों सगे भाई लंबे समय से बढ़ते कृषि कर्ज़ के कारण गंभीर मानसिक तनाव में थे। उनका कर्ज़ 25 लाख रुपये से बढ़कर लगभग 50 लाख रुपये हो गया था।

लगातार प्रयासों के बावजूद, जिसमें आलू जैसी फसलों की खेती भी शामिल थी, कम बाज़ार कीमतों के कारण वे अपनी लागत तक नहीं निकाल पाए, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई। अंततः अत्यंत बेबसी में उन्होंने यह कठोर कदम उठाया।

इधर वे दोनों अपनी जान दे रहे थे उधर इसी दिन, अपने कार्यकाल में कारपोरेट घरानों के 55-55 लाख करोड़ माफ़ करने वाली केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बड़ी बेरुखी से कह रही थीं  कि किसानों के लिए पूर्ण ऋण माफी का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। ये दोनों बयान मिलाकर पढ़ने से  देश के किसानों की स्थिति के प्रति भाजपा-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की गम्भीरता उजागर हो जाती है।

जिस मोदी राज में किसानो की आमदनी दोगुनी, चार गुनी, आठ गुनी होने की हांकी जा रही थी, उसके 12 वर्षों के आंकड़े भयावह सच उजागर करते हैं। इनके मुताबिक़ पिछले बारह वर्षों में किसान आत्महत्याएँ बजाय घटने के और ज्यादा तेज़ी से बढ़ी हैं। इन बारह वर्षों में किसानों, कृषि मज़दूरों और और किसानों के ही गाँव से बेदखल होकर गए प्रवासी मज़दूरों द्वारा की गई आत्महत्याओं की संख्या 5 लाख से अधिक हो चुकी है। मतलब हर साल 41666, हर महीने 3472 और हर दिन 115 किसानों ने आत्महत्या की है।

यह है  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा  2016 में किसानों की आय दोगुनी करने के दावे का असली नतीजा । 

शिवराज सिंह संसद में बोलते हुए बड़े गर्व के साथ किये अपने बेबुनियाद दावे का आधार जिस एमएसपी नीति को बता रहे थे दरअसल वही तो किसानों की आय घटने के सबसे बड़े कारणों में से एक है। पिछले बारह वर्षों में एक बार भी इस सरकार ने स्वामीनाथन फार्मूले सी2+50%  (उत्पादन लागत का डेढ़ गुना) के अनुसार किसानों की उपज की एमएसपी निर्धारित नहीं की है। खेती में उत्पादन लागत के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि धान किसानों को मिलने वाली औसत कीमत, सरकार ने जिस ए2+एफएल  फार्मूले से तय की वह एमएसपी से 36 प्रतिशत कम थी।

खुद शिवराज के कृषि मंत्रालय द्वारा जारी एमएसपी के दीर्घकालिक आंकड़े बताते हैं कि लगभग सभी फसलों की वास्तविक एमएसपी की वृद्धि दर में गिरावट आई है। अध्ययन की गई 16 एमएसपी फसलों में से 9 फसलों में 2014-15 से 2025-26 के बीच वास्तविक एमएसपी वृद्धि में तेज़ मंदी दर्ज की गई। घोषित एमएसपी भी अधिकांश किसानों के लिए केवल कागज़ी साबित होता है, क्योंकि देशभर में खरीद की कोई गारंटीशुदा व्यवस्था नहीं है और घोषित एमएसपी के आधार पर कुल उत्पादन का 15% से भी कम खरीदा जाता है।

जब बाज़ार कीमतें निम्न स्तर पर हों और उत्पादन लागत बढ़ रही हो, तो स्थिर एमएसपी का अर्थ यही है कि किसानों का नुकसान दोगुना हुआ है, उनकी आय नहीं। इसके साथ ही, ऋण माफी — जो आख़िरी बार 2008 में घोषित की गई थी— पर विचार तक न करने का रवैया ग्रामीण भारत के हितों के प्रति भाजपा-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की पूर्ण असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

तथ्यों से भरी सचाई कुछ भी हो, जमीनी यथार्थ कुछ भी हो मगर जब मकसद सिर्फ कॉर्पोरेट खेती को बढ़ावा देना हो तो लफ्फाजी और झूठे दावों के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। “किसानों की आय दोगुनी हो गई है” जैसे नारे पंजाब के दो किसानों और उन लाखों लोगों को वापस नहीं ला सकते जिनकी आजीविका सरकार की किसान-विरोधी नीतियों के कारण नष्ट हो गई।

शिवराज सिंह के बयान से खेती किसानी की हालत सुधरने वाली नहीं है बल्कि उनकी सरकार जो नए बीज क़ानून, बिजली क़ानून ला रही है और ग्रामीण रोजगार गारंटी क़ानून को खत्म करके  जिस तरह के हालात पैदा कर रही है उनसे हालात बद से बदतर ही होने वाले हैं। किसान इस खतरे को समझते हैं और इससे मुकाबला कैसे करना है यह भी सीख चुके है। 

यह वर्ष इसी तरह के मुकाबलों में तपकर फौलाद बने संगठन – अखिल भारतीय किसान सभा – की स्थापना का 90 वां वर्ष है। किसान सभा जानती है कि वर्षगाँठ उत्सव मनाने के अवसर नहीं होते : वे संकल्प को दोहराने और लक्ष्य को हासिल करने की ओर बढ़ने का अवसर होते है। किसान सभा के स्थापना दिवस 11 अप्रैल से शुरू करके साल भर देश भर में यही होगा और जब किसान संघर्षों का उजाला बढ़ेगा तो तय है कि अँधेरा छंटेगा। 

(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।) 

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