(9 मार्च को अरुंधति रॉय, लेखिका और स्तंभकार निलांजना रॉय से “मदर मैरी कम्स टू मी” पर दिल्ली के कमानी ऑडोटोरियम में बातचीत कर रही थीं। निलांजना रॉय के सवाल और अरुंधति रॉय के जवाब न केवल इस पुस्तक तक सीमित थे, बल्कि उनके व्यापक सरोकार और गतिविधियों पर भी थे। अंत में पढ़ा गया यह वक्तव्य उसी विस्तृत नजरिए की अभिव्यक्ति थी!)
मैं कुछ कहना चाहती हूं क्योंकि मैं अपनी माँ की बेटी हूँ। और इसलिए भी क्योंकि यह कहना जरूरी हो गया है। यह छोटी-सी टिप्पणी है— उस युद्ध के बारे में जो पूरी दुनिया को निगलने पर आमादा है।
यह मैं जानती हूं कि हम सभी यहां आज ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ पर बात करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। लेकिन हम उन खूबसूरत शहरों को, जहां आग धधक रही है—तेहरान, इस्फहान और बेरूत— को याद किए बगैर इस सभा का अंत कैसे कर सकते हैं? अपनी मां मैरी की साफगोई, उनकी बेअदबी और उनकी आत्मा को अपने भीतर समाहित करके, मैं इस मंच से कहना चाहती हूं कि अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किया गया हमला बेवजह है, गैरकानूनी है।
बेशक, यह गाजा में शुरु किए नरसंहार की ही अगली कड़ी है। ये नरसंहार करने वाले वही पुराने लोग हैं। और इनके वही पुराने तौर-तरीके हैं, पुरानी पटकथा की तरह। औरतों की हत्या और बच्चों का नृशंस कत्लेआम। अस्पतालों और शहरों पर अंधाधुंध बमबारी करके उसे तबाह कर देना। और फिर खुद को पीड़ित बताना।
लेकिन ईरान, गाजा नहीं है। यह युद्ध पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है। हम आण्विक तबाही और आर्थिक पतन के कगार पर खड़े हैं। यह वही देश है, जिसने हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए थे। और आज फिर, वह दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक पर बमबारी करके उसे उजाड़ देने की तैयारी कर रहा है। इस बारे में विस्तार से फिर कभी बात की जाएगी। इसलिए मैं अभी बस इतना ही कहना चाहती हूं कि मैं ईरान के साथ खड़ी हूं।
बिना किसी लाग-लपेट के। जिस किसी भी सत्ता को बदलना हो, चाहे वह अमेरिका हो, इजराइल हो, या फिर हमारे यहां का निजाम, तो बदलाव जनता लाती है न कि कोई घमंडी, झूठी, धोखेबाज, लालची, संसाधनों की लुटेरी और बम बरसाने वाली साम्राज्यवादी ताकत और उसकी मंडली, जो पूरी दुनिया को डरा-धमकाकर अपने बस में करना चाहती है।
ईरान डटकर खड़ा है। भारत झुक गया है। मैं शर्मशार हूं कि हमारी सरकार कितना निरीह और रीढ़ विहीन हो गयी है। अरसा पहले, हम बहुत गरीब देश थे, बहुत ही गरीब। लेकिन हमारे पास स्वाभिमान था। हमारी गरिमा थी। आज हम एक अमीर देश हैं, पर यहां के लोग बेहद गरीब और बेरोज़गार हैं, जिन्हें दो जून की रोटी की जगह नफरत, झूठ और ज़हरीला नजरिया परोसा जा रहा है। हमने अपना स्वाभिमान खो दिया है। अपनी गरिमा खो दी है। अपना साहस खो दिया है। अब ये सारी चीजें सिर्फ फिल्मों में रह गयी हैं।
हम किस तरह के लोग हैं, जो अपनी चुनी हुई सरकार से दूसरे देशों के राज्याध्यक्षों का अपहरण और उनकी हत्या करने वाले अमेरिका की निंदा करने को नहीं कह पाते! क्या हमें यह गवारा होगा कि कोई हमारे साथ ऐसा करे? हमारे प्रधानमंत्री इज़राइल जाते हैं, नेतन्याहू को गले लगाते हैं। हमले से ऐन पहले। इसका क्या मतलब है?
हमारी सरकार का अमेरिका से गिड़गिड़ाकर एक ऐसा व्यापार समझौता करना, जो हमारे किसानों, हमारे बुनकरों को बर्बाद कर दे, वह भी अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ को अवैध घोषित करने के कुछ ही दिन पहले, इसका क्या मतलब होता है? अब हमें रूस से तेल खरीदने की “इजाज़त” मिलती है— इसका क्या मतलब होता है? हमें और किस-किस बात की इजाज़त लेनी होगी? शौचालय जाने की? काम से एक दिन की छुट्टी लेने की? अपनी मां से मिलने जाने की?
हर दिन डोनाल्ड ट्रंप सहित अनेक अमेरिकी राजनेता सार्वजनिक रुप से हमारा मज़ाक उड़ाते हैं, हमें नीचा दिखाते हैं। और हमारे प्रधानमंत्री ठठाकर खोखली हंसी हंसते हैं। और गले से लिपटते रहते हैं। गाजा में हो रहे नरसंहार के चरम पर, भारत ने धकिया गए फिलीस्तीनी कामगारों की जगह भरने के लिए हज़ारों गरीब मजदूरों को इजराइल भेज दिया। आज, जबकि इजराइली बंकरों में छिपे हुए हैं, खबरें आ रही हैं कि भारतीय मजदूरों को उन बंकरों में छुपने की इजाजत नहीं है। आखिर इन सबका क्या मतलब है? किसने हमें इस अपमानजनक, शर्मनाक, घृणित परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है?
आपमें से बहुतों को याद होगा कि जब हम उस आडंबरपूर्ण और अतिरंजित चीनी कम्युनिस्ट नारे ‘साम्राज्यवाद का पालतू कुत्ता’ कहकर मजाक उड़ाते थे। आज, वही मुहावरा हम पर चस्पा होने लगा है। सिवाय उन विकृत और जहरीले फिल्मों के, जिसमें हमारे नकली नायक मांसपेशियां फुलाकर, हिंसा बरपाते हुए और हमारी खून की प्यास को भड़काते हुए एक से बढ़कर एक झूठी लड़ाइयाँ जीतते जाते हैं।
(अग्रेंजी में दिए गए इस भाषण का अनुवाद जितेन्द्र कुमार ने किया है।)