आदिवासी समुदायों के अंदर पितृसत्तात्मक सोच का विश्लेषण करना ज़रूरी : वंदना

प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन की वंदना टेटे का कहना है कि आदिवासी समुदायों के अंदर पितृसत्तात्मक सोच का विश्लेषण करना ज़रूरी है, क्योंकि अन्य समुदायों से वे कैसे भिन्न हैं और आदिवासी महिला के नजरिये से अपनी परिस्थिति चाहे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक का विश्लेषण कर बदलने की दिशा में आगे कार्य करने की ज़रूरत है।”

वंदना आदिवासी विमेंस नेटवर्क ने अपने 17वें स्थापना दिवस के अवसर पर 9 अप्रैल को एचआरडीसी, रांची में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में बोल रही थीं।

कार्यक्रम में बगईचा संस्था से टॉम कावला ने कहा कि ”वर्तमान चुनौतियों के अनुसार वृहत मुद्दे में भागीदारी जरूरी है और नेटवर्क के प्रतिनिधि इसमें सक्रिय रूप से योगदान देते हैं।”
लोकतंत्र राष्ट्र निर्माण मंच की मनीषा ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि “कैसे करीब 93 लाख में 65% महिलाओं का जिसमें 30% आदिवासी महिलाएं हैं SIR के तहत वोटर लिस्ट से नाम काट दिया गया, जो वोट के अधिकार से उन्हें वंचित कर रहा है।”

सम्भवा इंजोत की किरण ने स्त्री के व्यापक दृष्टिकोण पर बात करते हुए कहा की “स्त्री की हर क्षेत्र में भागीदारी जरुरी है। वहीं जहां महिला नेतृत्व को स्वीकारा जाता है वहां मानवीकरण बेहतर होता है।”

आदिवासी एकता परिषद के अशोक चौधरी ने कहा कि “महिलाओं को पुरुषों जैसे बनने का नहीं बल्कि पुरुषों को महिलाओं जैसे बनने की जरुरत है जिससे समाज में बढती हिंसा रुकेगी।”
उन्होंने गुजरात का उदहारण देते हुए बताया की कैसे लिज्जत पापड़ और अमूल्य डेयरी ने ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक स्वतंत्रतता और सशक्तिकरण का एक रास्ता खोला।

कार्यक्रम में महिला समाज में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं को “फूलो-झानो अवॉर्ड” से सम्मानित किया गया।

उल्लेखनीय है कि यह सम्मान उन महिलाओं को समर्पित है, जिन्होंने पितृसत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती देते हुए अपने साहस, नेतृत्व और संघर्ष के माध्यम से सामाजिक बदलाव की नई मिसाल कायम की है। 

“हमारी भागीदारी – हमारा अधिकार” और “महिलाओं का नेतृत्व, समाज का सशक्त भविष्य” की थीम पर आयोजित यह कार्यक्रम पिछले 16 वर्षों की उस सशक्त यात्रा का उत्सव था, जिसमें महिलाओं ने राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत भागीदारी दर्ज कराई है। 

बताते चलें कि इस वर्ष से फूलो-झानो अवॉर्ड की शुरुआत हुई जो कि झारखंड की ऐतिहासिक  वीरांगनाओं फूलो और झानो की विरासत से प्रेरित है। जिन्होंने अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनकर महिलाओं के साहस और नेतृत्व को नई पहचान दी।

यह सम्मान आज की उन महिलाओं को समर्पित है, जो अपने समुदायों में परिवर्तन की अगुवाई कर रही हैं। चाहे वह स्थानीय शासन में भागीदारी हो, आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना हो, शिक्षा के क्षेत्र में पहल करना हो या सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाना हो।

आदिवासी विमेंस नेटवर्क का मानना है कि “जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, समाज बदलता है” और इस तरह के मंच महिलाओं के नेतृत्व को पहचान देने और उन्हें और सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कार्यक्रम के अवसर पर फूलो-झानों सम्मान से झारखण्ड की दो सक्रिय महिलाएं मनोनीत रेबेका तोपनो एवं रोज मधु तिर्की को सम्मानित किया गया, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में संघर्षशीलता की जो मिशाल कायम कर पाई है, वो अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा और ऊर्जा की स्रोत है। उन्होंने अपने प्रेरणादायक कार्यों और संघर्ष के अनुभवों को साझा किया।

कार्यक्रम की शुरूआत में आदिवासी विमेंस नेटवर्क के16 वर्षों की यात्रा और मुख्य उपलब्धियों और चुनौतियों को आदिवासी विमेंस नेटवर्क की संस्थापिका एलिना होरो ने साझा करते हुए कहा “आदिवासी महिला नेटवर्क कोई पंजीकृत NGO या संस्था नहीं, बल्कि छोटे-छोटे महिला समूहों को जोड़ने वाला एक मंच है। इसका उद्देश्य है महिलाओं को राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाना है। यह नेटवर्क तात्कालिक लाभ नहीं देता, बल्कि दीर्घकालिक समाधान और आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करता है। यह हमारी जल, जंगल, ज़मीन और अधिकारों की लड़ाई को सामूहिक शक्ति से आगे बढ़ाता है।”

झारखण्ड जनाधिकार महासभा से मंथन ने आदिवासी विमेंस नेटवर्क के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “आदिवासी विमेंस नेटवर्क, आदिवासी महिलाओं के नेतृत्व को मजबूती देने के लिए जरूरी है, ताकि ऐसे वृहत संगठनों में भी आदिवासी महिलाओं का नेतृत्व व उनके अनुभवों और सन्दर्भ का वृहद मुद्दों में समावेश हो सके।”

छोटानागपुर सांस्कृतिक मंच से सच्ची ने कहा कि “फूलो-झानो सम्मान की शुरूआत से हाशिए पर पड़ी हुई महिलाओं को तलाशना और उनके वजूद को फिर से जिन्दा करना और समाज को उनकी याद दिलाना भी जरूरी है।”

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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