लोकतंत्र के सीने पर सुप्रीम कोर्ट का वज़्रपात!

आज संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी लेने वाली देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के हाथों ही उसकी हत्या कर दी गयी। इसके साथ ही उसने एक और काम किया जिन नागरिकों के अधिकारों को किसी भी कीमत पर सुरक्षित और संरक्षित रखने का उसने संकल्प लिया था आज उसने उस जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ लिया। 

संविधान में लिखा है कि नागरिकों की नागरिकता तय करने का अधिकार गृह मंत्रालय का है। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने अपने एसआईआर के फैसले में इसको स्वीकार करते हुए साथ ही यह भी कह दिया कि चुनाव आयोग भी नागरिकता की जांच कर सकता है। 

मी लॉर्ड, अगर आयोग को आप यह अधिकार दे देंगे तो फिर गृहमंत्रालय का क्या काम रहेगा? कल को कोई और भी संस्था आती है और वह कहती है कि उसे सिर्फ देश के किसी नागरिक को ही वह सुविधा देने का अधिकार है। और उसके पहले वह उसकी नागरिकता की जांच करेगी। तो आप उसे भी यह अधिकार दे देंगे? क्या कोई देश इस तरह से चल सकता है? आपके फैसले से फिर तो चुनाव आयोग अब तय करेगा कि कौन नागरिक है और कौन वोट देने का अधिकार रखता है। और इससे आगे जाकर कब और किस इलाके का वह एसआईआर कर सकता है? 

कितने लोगों को जब चाहे तब वह संदिग्धों की सूची में रख सकता है। और जितने लोगों को चाहे वह हरी झंडी दे सकता है। यानि सुप्रीम कोर्ट ने परोक्ष तौर पर यह कह दिया कि सरकार अगर चाहे तो अपने चहेते चुनाव आयोग से अपने उन लोगों का इलेक्टोरल रोल गठित कर सकता है जिसके बारे में उसे लगता है कि वे उसे फिर से वोट देकर उसकी सरकार बनवाने की गारंटी करेंगे। इस तरह से इस देश में एक स्थाई सरकार के गठन और निर्माण का मी लॉर्ड ने रास्ता साफ कर दिया है। अब कम से कम यह बात अमित शाह पूरे दावे के साथ कह सकते हैं कि पीएम मोदी जी लोगों को दिए गए 2047 के सपने को पूरा करके ही कुर्सी छोड़ेंगे।

और कम से कम उनके भी स्थाई गृहमंत्री बने रहने की गारंटी हो गयी है। अब यही दिन देखना बाकी रह गया था। हालांकि पहले ही इस बात का अंदेशा था कि फैसला कुछ इसी तरह का आएगा। क्योंकि इसी बेंच के एक सदस्य ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में वोट देने से वंचित कर दिए गए लोगों को कहा था कि चलिए इस बार आप वोट नहीं दे पाए अगली बार दे लीजिएगा। 

अब सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की किसी नागरिक के वोट के अधिकार को लेकर अगर यही सोच है तो फिर उस लोकतंत्र का क्या होगा और उस संविधान का क्या होगा जिसके तहत वह चलता है? और देश की दूसरी संस्थाओं का क्या होगा जो इन नागरिकों के सहारे चलती और काम करती हैं। 

मी लॉर्ड शायद आप यह भूल गए हैं कि अगर नागरिक नहीं होगा, तो लोकतंत्र भी नहीं होगा, न ही होगा कोई रिपब्लिक। और तब संविधान से लेकर संसद, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ आप भी नहीं होंगे। इसलिए अभी भी वक्त है आपके पास आपने जो लोकतंत्र विरोधी विचार दिए हैं उसके लिए देश से माफी मांग लीजिए। 

बहरहाल आज के फैसले से देश के लोकतंत्र के सीने पर सुप्रीम कोर्ट ने जो वज्रपात किया है उसकी कोई भरपाई नहीं है। इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा मी लॉर्ड। और आज हमेशा-हमेशा के लिए आपका नाम काले अक्षरों में दर्ज हो गया है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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