इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने वाले फैकल्टी सदस्यों को राज्य सरकार के दफ्तरों से अटैच किए जाने पर हैरानी जताई है। कोर्ट ने कहा, “यह बहुत हैरानी की बात है कि मेडिकल कॉलेजों के फैकल्टी सदस्यों को राज्य सरकार के दफ्तरों में अटैच किया जा रहा है, जिससे मेडिकल छात्रों के साथ-साथ संबंधित मेडिकल कॉलेजों में मरीज़ों को भी परेशानी उठानी पड़ रही है।”
इस अहम टिप्पणी के साथ, कोर्ट ने बहराइच के एक स्वायत्त राज्य मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आलोक पाल के अटैचमेंट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे डॉक्टर को तुरंत कार्यमुक्त करें। कोर्ट ने याचिकाकर्ता डॉक्टर को भी निर्देश दिया कि कार्यमुक्त होने के तुरंत बाद वे अपनी पोस्टिंग की जगह पर जाकर ड्यूटी जॉइन करें।
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार जस्टिस राजीव सिंह की एकल पीठ ने 26 मई को यह आदेश पारित किया, जिसमें डॉ. आलोक पाल की याचिका को स्वीकार कर लिया गया। याचिकाकर्ता ने 15 जुलाई, 2025 को जारी किए गए अटैचमेंट आदेश को चुनौती दी थी और उसे रद्द करने की मांग की थी। उन्होंने बहराइच के ऑटोनॉमस राज्य मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर काम जारी रखने की भी अनुमति मांगी थी।
याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्हें चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक (डीजीएमई) के दफ्तर से अटैच किया गया था। बहराइच के मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल से बार-बार गुज़ारिश करने के बावजूद, उन्हें इस पद से कार्यमुक्त नहीं किया गया। नतीजतन, उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
इस बीच, सरकारी वकील ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि स्टाफ की कमी के कारण याचिकाकर्ता को कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता। हालाँकि, वे डीजीएमई दफ्तर में किसी फैकल्टी सदस्य को अटैच करने से जुड़ा कोई भी नियम या प्रावधान पेश नहीं कर पाए।
कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि इस तरह के अटैचमेंट के लिए कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने याचिकाकर्ता के लिए अटैचमेंट का जो आदेश जारी किया था, वह गलत था। इसलिए, कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने उपरोक्त टिप्पणियों और आदेश के साथ याचिका को स्वीकार कर लिया।
(जनचौक ब्यूरो)