लोकतंत्र, पूँजी और सत्ता का निजीकरण

अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप का उदय केवल एक व्यक्ति का सत्ता में आना नहीं था, बल्कि वह पूँजी, राष्ट्रवाद, कॉरपोरेट हितों और जन असंतोष के एक विचित्र गठजोड़ का परिणाम था। ट्रंप ने स्वयं को “एंटी-एस्टैब्लिशमेंट” नेता के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी नीतियों और निर्णयों ने बार-बार यह संकेत दिया कि वे राज्य को सार्वजनिक संस्था नहीं, बल्कि निजी व्यापारिक साम्राज्य की तरह संचालित करना चाहते हैं।

हाल में प्रकाशित रिपोर्ट “द प्राइस ऑफ़ करप्शन : हाउ ट्रम्प’स पे-टू-पे एडमिनिस्ट्रेशन इज़ ड्राइविंग अप कोस्ट्स फॉर वर्किंग फैमिलीज” (भ्रष्टाचार की कीमत: ट्रंप के रिश्वतखोरी वाले प्रशासन ने कामकाजी परिवारों के लिए लागत कैसे बढ़ा दी है) इसी प्रवृत्ति को रेखांकित करती है। यह रिपोर्ट केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की सूची नहीं है; यह उस व्यापक राजनीतिक अर्थव्यवस्था का दस्तावेज़ है जिसमें लोकतांत्रिक संस्थाएँ धीरे-धीरे कॉरपोरेट हितों और निजी लाभ के औजार में बदलती जाती हैं।

रिपोर्ट का सबसे गंभीर निष्कर्ष यह है कि ट्रंप प्रशासन की नीतियाँ केवल राजनीतिक पक्षधरता तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने आम अमेरिकी नागरिकों की जेब पर प्रत्यक्ष आर्थिक बोझ डाला। “ट्रम्पआरएक्स” जैसी योजनाओं को जनता के लिए सस्ती दवाओं के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन वास्तविकता यह बताती है कि ये मंच बड़ी दवा कंपनियों के हितों को आगे बढ़ाने वाले माध्यम बन गए।

दवा बाज़ार में पहले से मौजूद सस्ती जेनेरिक दवाओं की जानकारी छिपाना केवल उपभोक्ता को भ्रमित करना नहीं, बल्कि बाजार को नियंत्रित करने की रणनीति भी है।

यहाँ एक गहरी विडंबना दिखाई देती है। जिस नेता ने चुनाव प्रचार में “भ्रष्ट वाशिंगटन” और “कॉरपोरेट लूट” के विरुद्ध जनता को उकसाया था, वही सत्ता में आने के बाद कॉरपोरेट समूहों और अपने पारिवारिक नेटवर्क के लिए राज्य की संरचनाओं का इस्तेमाल करता दिखाई देता है। यह आधुनिक पूँजीवादी लोकतंत्र की उस बीमारी का लक्षण है जिसमें राजनीति और निजी व्यापार के बीच की सीमाएँ मिटती जा रही हैं।

टैरिफ नीति इसका दूसरा उदाहरण है। सामान्यतः आयात शुल्क को राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जाता है, लेकिन ट्रंप के दौर में यह कई बार व्यक्तिगत राजनीतिक और कारोबारी सौदों का माध्यम प्रतीत हुआ। स्विट्ज़रलैंड के साथ टैरिफ में नरमी और उसके तुरंत बाद महँगे उपहारों का आदान-प्रदान इस बात का संकेत देता है कि आर्थिक नीतियाँ संस्थागत विवेक से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत समीकरणों से संचालित हो रही थीं।

ब्राज़ील पर लगाए गए टैरिफ तो और भी चिंताजनक उदाहरण हैं। वहाँ के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के समर्थन में अमेरिकी व्यापार नीति का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि ट्रंप वैश्विक दक्षिणपंथी राजनीति को वैचारिक गठबंधन की तरह देखते हैं। इसका आर्थिक परिणाम अमेरिकी उपभोक्ताओं ने भुगता, जब कॉफी जैसी रोज़मर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ीं। यहाँ लोकतंत्र और बाजार दोनों ही राजनीतिक प्रतिशोध के औजार में बदलते दिखाई देते हैं।

रिपोर्ट में उल्लिखित क्षमादान की राजनीति भी अमेरिकी लोकतंत्र के नैतिक संकट की ओर संकेत करती है। पूँजी, राजनीतिक निष्ठा और कानूनी संरक्षण के बीच जो संबंध उभरता है, वह किसी आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य की अपेक्षा सामंती संरचना जैसा लगता है। यदि एक धनी कारोबारी दान देकर दंड से मुक्ति प्राप्त कर सकता है, तो कानून की समानता का सिद्धांत अर्थहीन हो जाता है।

क्रिप्टोकरेंसी और ऑनलाइन प्रिडिक्शन मार्केट से जुड़े मामलों में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हो जाती है। नियामक संस्थाओं का काम बाजार को नियंत्रित करना और सार्वजनिक हित की रक्षा करना होता है, लेकिन जब वही संस्थाएँ सत्ता से जुड़े कारोबारी हितों की संरक्षक बन जाएँ, तब राज्य का चरित्र बदलने लगता है। यह “रेगुलेटरी कैप्चर” का चरम रूप है, जिसमें नियमन करने वाली संस्था स्वयं कॉरपोरेट हितों के प्रभाव में आ जाती है।

ट्रंप मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भ्रष्टाचार को छिपाता नहीं, बल्कि उसे आक्रामक राजनीतिक शैली में सामान्य बनाने की कोशिश करता है। यह पारंपरिक भ्रष्टाचार से अलग है। पहले सत्ता अपने अनैतिक गठबंधनों को पर्दे के पीछे रखती थी; अब उन्हें “राष्ट्रवाद”, “व्यापारिक दक्षता” और “एंटी-एलीट राजनीति” के नाम पर वैध ठहराया जाता है।

यही कारण है कि यह प्रश्न केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में उभरती दक्षिणपंथी लोकलुभावन राजनीति में यह पैटर्न दिखाई देता है—लोकतांत्रिक जनादेश का उपयोग कर राज्य को निजी पूँजी और पारिवारिक सत्ता के नेटवर्क में बदल देना। इसमें जनता को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, पहचान की राजनीति और भय के विमर्शों में उलझाकर आर्थिक प्रश्नों से दूर रखा जाता है।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम सामाजिक असमानता का बढ़ना है। जब नीतियाँ सार्वजनिक कल्याण के बजाय निजी लाभ के लिए बनाई जाती हैं, तब महँगाई, स्वास्थ्य संकट, बेरोज़गारी और असुरक्षा का बोझ सामान्य नागरिकों पर स्थानांतरित हो जाता है। ट्रंप की राजनीति इसी प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करती है—लाभ ऊपर की ओर जाता है और लागत नीचे की ओर धकेल दी जाती है।

लोकतंत्र का संकट केवल चुनावों से हल नहीं होता। यदि संस्थाएँ कमजोर हों, मीडिया कॉरपोरेट प्रभाव में हो, और राजनीति पूँजी के साथ विलीन हो जाए, तो लोकतांत्रिक संरचना औपचारिक रह जाती है। ट्रंप का दौर इसी चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए।

आज आवश्यकता केवल किसी एक नेता की आलोचना की नहीं, बल्कि उस आर्थिक-सामाजिक संरचना को समझने की है जिसमें राजनीति धीरे-धीरे सार्वजनिक उत्तरदायित्व से हटकर निजी संपत्ति में बदलती जा रही है। अन्यथा लोकतंत्र अंततः नागरिकों का नहीं, धन और प्रभाव के गठजोड़ का तंत्र बनकर रह जाएगा।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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