डूबती इकोनॉमी और हारता लोकतंत्र 

संघ नीति मोदी सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार और सरकार समर्थक नौकरशाह सुरजीत भल्ला के कथन से भला और क्या अर्थ निकाला जा सकता है। जब वे 21 मई इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में कह रहे हैं कि मोदी सरकार चुनावी मोर्चे पर लगातार जीत रही है। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर हार रही है। उनके निष्कर्ष से यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि जनता की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होने के दौर में चुनावी मोर्चे पर विजय के क्या राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। 

क्योंकि अंततोगत्वा वह अर्थव्यवस्था ही है जो किसी समाज के सामाजिक राजनीतिक सांस्कृतिक ढांचे और उसके व्यवहार का नियंत्रण करती है। सुरजीत भल्ला कोई आम नागरिक नहीं हैं। वे सत्ता संस्थानों में रहे हैं और उसके अंतर्विरोधों को व्यवस्थित करने के काम में दक्ष हैं। 

इसलिए उनके निष्कर्ष को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। हम जानते हैं कि पूंजीवादी समाज में उत्पादन के साधनों के मालिकों और उत्पादक शक्तियों के बीच चल रहे न हल होने वाले संघर्ष के बीच से ही सामाजिक राजनीतिक गतिविधियां आगे बढ़ती हैं और ऊपरी ढांचा निर्मित होता है। जिसे राज्य कहते हैं। जो दो विरोधी वर्ग शक्तियों के द्वंद्व को नियंत्रित करता है। राज्य की वर्ग प्रतिबद्धता असंदिग्ध है। आर्थिक संबंध ही वह मूलाधार है। जिस पर पूंजीवादी लोकतंत्र की आधारशिला खड़ी है । अगर मूल आधार ही ढह रहा हो। तो ऊपरी ढांचा दीर्घकाल तक कैसे सुरक्षित रह सकता है।

ऐसा लगता है कि 21वीं सदी के प्रथम चौथाई तक आते-आते मूल आधार और उसके ऊपरी ढांचे के बीच संघर्ष ऐसी मंजिल पर पहुंच गया है ।जहां लोकतंत्र व तानाशाही के बीच, लोकशाही और हिंदुत्व कारपोरेट फासीवाद के बीच, नागरिक और राज्य के बीच संबंधों में बदलाव अवसंभावी है। 

हम देख रहे हैं कि भारतीय समाज और राज्य के अंदर चल रहा तीखा टकराव व उतार चढ़ाव संरचनागत बदलाव की दिशा में बढ़ रहा है। स्पष्ट है कि बुनियादी अंतर्विरोध हल करने में अक्षम शासक वर्ग बहुत कमजोर जमीन पर खड़े लोकतांत्रिक ढांचे में अंदर से संरचनात्मक बदलाव करते हुए चुनावी तानाशाही थोपने में कामयाब होता दिखाई दे रहा है।जिससे जनता की बढ़ती हुई राजनीतिक आर्थिक सामाजिक आकांक्षा का दमन किया जा सके। स्पष्ट है भारत उस चौराहे पर खड़ा है ।जहां से उसे लोकतंत्र और फासीवाद में से एक को चुनना है।

इस समय राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जिस तरह से विस्फोटक बनी हुई हैं। उसमें दोनों संभावनाएं एक साथ दिखाई दे रही हैं। भारतीय समाज में बढ़ रहे आर्थिक राजनीतिक संकट और उस पर पार पाने के लिए बढ़ते राज्य दमन ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया है। पाखंड प्रोपेगंडा पैसा प्रलोभन वोटर पर्जिंग और पिछड़ी सामाजिक चेतना को विध्वंसक स्तर पर ऊंचा उठा कर वर्तमान रुलिंग रिजीम संकट का बोझ जनता के कंधे पर डालकर बच निकलना चाहती है। 

अक्षम नेतृत्व द्वारा संस्थागत विध्वंस और विभाजनकारी नीतियों को आगे बढ़ाकर बिगड़ती आर्थिक स्थिति की जवाबदेही से भाग रहा है।( विदेश यात्रा पर जाने के पहले पीएम द्वारा सात सूत्रीय सुझाव )जिस कारण जन प्रतिरोध और जन उभार दिखाई दे रहा है ।उससे परिस्थितियों के दिलचस्प हो जाने के संकेत हैं । सरकार युद्ध की आड़ में नाकामियों को छिपाने के असफल प्रयास में लगी है। जबकि सबको पता था कि संकट तो पहले से ही गहरा हो चुका था। इस युद्ध ने सिर्फ जर्जर पर्दे को फाड़ कर हिंदुत्व कॉर्पोरेट की विध्वंसक विचारधारा और नेतृत्व की अक्षमता को बेपर्दा कर दिया है।

हम पोस्ट ग्लोबलाइजेशन के दौर में पहुंच गए हैं। जहां पूंजीवाद पुनः संरक्षणवादी रास्ते पर लौट आया है और अपने ही द्वारा पैदा की गई समस्याओं को हल करने की क्षमता खो बैठा है। हमको पता है कि जब राजनीतिक समाधान के दरवाजे बंद हो जाते हैं तब युद्ध ही विकल्प बचता है। 

यह दो देशों के मध्य हो सकता है और देश के अंदर ही शासक वर्गों के मध्य व जनता और सत्ता धारियों के बीच भी। इस समय दुनिया वर्ग संघर्ष के उस मंजिल की तरफ बढ़ रही है। जहां युद्धरत दो विरोधी खेमों (वर्गों )में से एक के पराजय के साथ ही फैसला होना है। बात साफ है कि वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है ।दुनिया नये वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ बढ़ गई है। इसलिए लोकतांत्रिक भारत का आंतरिक संकट भी नई मंजिल में प्रवेश कर रहा है । यही कारण है कि पिछले 12 वर्षों में हिंदुत्व वादी सामाजिक आर्थिक नीतियों के रचनाकार भी अब चेतावनी देने के साथ कह रहे हैं कि आर्थिक संकट को सिर्फ वैश्विक संकट के संदर्भ में न देखकर मोदी सरकार की एकांगी विभाजनकारी दृष्टि और क्रोनी कैपिटलिस्ट पक्षधर नीतियों में देखे जाने की जरूरत है ।ठोस अर्थों में कहा जाए कि अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट की जड़ों को संघ नीति मोदी सरकार की नीतियों में तलाशने की जरूरत है।

पूर्व वित्त सलाहकार सुरजीत भल्ला के बाद भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग और पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी वर्तमान संकट को लेकर कुछ इसी तरह की बात कह रहे हैं। इन लोगों के अनुसार यह नेतृत्व व नीति का संकट है। यह उस प्रतिबद्धता से जुड़ा है जो जनता और कॉर्पोरेट के बीच में किसी एक पक्ष को चुनने से तय होती है। 

दोनों पूर्व सलाहकारों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था फ्रेजाइल स्थिति में है।जो 2013 के फ्रेजाइल 5 से गिरकर अब फ्रेजाइल दो में पहुंच गई है।दुनिया के दो सबसे जोखिम भरे मुल्कों में {तुर्की और भारत} हम शामिल हो गए हैं। (यहां याद रखना चाहिए कि तुर्की में राष्ट्रपति तैयब एर्दोआन ने भी इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी कायम कर रखी है। जहां विपक्ष और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है ।तुर्की एक मात्र मुस्लिम देश है।जहां जनतंत्र और आधुनिकता के मूल्य गहराई तक समाज में घुसे हुए हैं ।अब तुर्की कट्टर इस्लामिक देश में बदल रहा है ।)

दूसरा -निजी निवेश में भारी गिरावट। जो सन् 2000 के 17% के समकक्ष आज 10% रह गया है । कॉर्पोरेट निवेश में भारी गिरावट कमजोर होते मध्य अवधि के विकास परिदृश्य व आर्थिक नेतृत्व में नीतिगत भटकाव।( इंडियन एक्सप्रेस) जैसे कारक काम कर रहे हैं। तीन-रुपए की कमजोरी। निवेशकों द्वारा भारतीय विकास की संभावनाओं पर किए जा रहे संदेश को दर्शाता है।

नीतिगत भटकाव -आर्थिक नीतियों में भटकाव की स्थिति चौतरफा बैलेंस शीट की समस्या और कमजोर मांग में परिलक्षित है।नई सोच और आर्थिक नेतृत्व में बदलाव की सख्त जरूरत है। इसे मंत्रालय और नौकरशाही के स्तर पर ठीक किया जाना चाहिए। विश्वसनीयता और डाटा पर सवाल। फिर जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठते रहे हैं ।बीजेपी के आंकड़े जमीनी हकीकत को नहीं दर्शाते ।समाधान के लिए विश्वसनीयता को बहाल करना होगा।निवेश आकर्षित करने के लिए नीतियों को लागू करना और व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर देना ।सरकार को झूठे तथ्यों और दावों पर रोक लगानी चाहिए।

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा 2019 तक फुस्स हो गया था । 7% या उसके ऊपर जीडीपी के विकास का दावा तथ्यात्मक रूप से गलत है। जिसे प्रति व्यक्ति आय में भारत के पिछड़ने में देखा जा सकता है ।( बांग्लादेश से भी पीछे)इस सवाल पर प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि डॉलर की मजबूती रुपए में गिरावट और इन्फ्लेशन को जोड़ देने के बाद जीडीपी माइनस हो जाती है। उनका कहना है कि नोटबंदी के बाद से वास्तविक जीडीपी कभी तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं रही ।

यही बात अर्थशास्त्री सुभाष गर्ग भी कह रहे हैं ।वे भारत सरकार में वित्त सचिव रह चुके हैं।सुभाष गर्ग के अनुसार सर्वाधिक असुरक्षित अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारतीय अर्थव्यवस्था है। जैसे 2029 तक भारत ने पांच ट्रिलियन इकोनॉमी का दावा किया था। किसानों की आय 2022 तक दुगनी होनी थी। 

आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य या भारत दुनिया का चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। जैसे अव्यवहारिक दावे।इसी समय डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए के कमजोर होने से स्थितियां और बदतर हुई हैं ।जिससे अर्थव्यवस्था का वास्तविक विकास नकारात्मक हो गया है ।तीसरी जो बात दोनों अर्थशास्त्रियों ने कही ।वह गलत नेतृत्व और गलत नीतियों को आगे बढ़ाना।जिसे नीतिगत प्रबंधन के रूप में देखा जा रहा है। महंगाई पर सरकार की बढ़ती हताशा भारी प्रतिक्रिया संकट को और गहरा बना रही है । जो सरकार की दिशाहीनता और पॉलिसी के पॉलिटिकली मोटिवेटेड होने को प्रदर्शित करता है। 

यही बात भारत सरकार के समर्थक डॉ. रथीन राय और पंकज पचौरी भी कह रहे हैं। शीतल पी सिंह से बातचीत के दौरान पंकज पचौरी ने कहा कि प्रधानमंत्री की जनता को दी गई सलाह वस्तुतः “अमृत महोत्सव” के “आफत महोत्सव” में बदलने का संकेत है। उनके अनुसार सारे नियम कानून जनता पर लागू होते हैं। पूंजीपतियों को पूरी छूट मिली हुई है। इन सभी आर्थिक विशेषज्ञों में एक बात पर सहमति है कि भारत गहरे आर्थिक संकट में फंस गया है।

भारत से पूंजी का पलायन-पचौरी के अनुसार पूंजी निवेश घट रहा है ।जो 2003 में जीडीपी का 2.7 % था और बढ़ता हुआ 2010 में 4.5% हो गया था ।अब वह नेगेटिव होने की तरफ जा रहा है ।

भारत के उद्योगपतियों के समूह ने फैसला किया कि वे अमेरिका में 20 अरब डॉलर का निवेश करेंगे। अमेरिका में आपराधिक केस झेल रहे मोदी मित्र अदानी ने अकेले 10 अरब डॉलर का अमेरिका में निवेश करने का अलग से ऐलान किया है ।जिससे वहां 15 हजार नए रोजगार का सृजन होगा।

तेल का निर्यात – मोदी देश की जनता से तेल बचाने के लिए कह रहे हैं।लेकिन भारतीय प्राइवेट तेल कंपनियां अरबों डॉलर का तेल विदेशों को निर्यात कर रही हैं। जिसे उन्होंने सस्ते रेट पर ईरान और रूस से खरीदा है।देश विरोधी धंधे पर मोदी की चुप्पी सब कुछ बयां करने के लिए काफी है। भारत में सोने का सबसे बड़ा आयातकर्ता रिजर्व बैंक है।जिसने पिछले वर्ष 850 बिलियन डॉलर का सोना आयात किया । इस पर चुप्पी क्या कहती है संघ नीति मोदी सरकार की धूर्तता पाखंड और दोमुंहापन को समझने के लिए क्या कुछ और प्रमाण चाहिए।

जीडीपी का गोरखधंधा- कई अर्थशास्त्री सरकार द्वारा जारी किए गए जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल खड़ा करते रहे थे। लेकिन आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं सरकारी आंकड़े के आधार पर भारत की जीडीपी का आकलन 6.5 से 7% दर्शाती रही हैं। लेकिन अब इन संस्थाओं ने भी कहा है कि भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं। उन्होंने जीडीपी वृद्धि साढ़े छः प्रतिशत से घटाकर तीन से चार के मध्य कर दिया है। 

अगर डॉलर के सापेक्ष रुपए के कमजोर होने के संदर्भ में देखें जीडीपी माइनस चली जाएगी। प्रोफेसर अरुण कुमार पहले से ही कह रहे थे कि सरकार द्वारा दिए जा रहे आंकड़े सही नहीं हैं। मुख्य बात यह है कि हमारी विकास दर 2019 तक आते-आते घटने लगी थी। विनाशक नोटबंदी और पाखंडी जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था का पहिया जाम हो चुका था। विश्व में किसी भी देश में पांच स्लैब वाली जीएसटी नहीं है। लेकिन यहां तो ‘मोदी महान की’ हिंदुत्व राष्ट्रवादी सरकार है। जहां सब कुछ प्रचार पाखंड और षड्यंत्र के इर्द-गिर्द रचा जाता है। जहां सामंती मूल्यों विचारों और जड़ जातिवादी पिछड़ी और खंडित चेतना में जी रहा अतीतोन्मुखी समाज को चमत्कृत करने वाले इवेंट्स में फंसाकर सत्ता समीकरण हल करना और मित्र कारपोरेट को देश के संसाधन सौंपना उद्देश्य हो। वहां आर्थिक प्रश्न भी पाखंडी बाबाओं द्वारा पर्ची निकाल कर हल किए जाएंगे और मीडिया इसे मास्टर स्ट्रोक बताकर जनता के विवेक पर पटक देगा। ऐसे में अर्थव्यवस्था को यह दिन देखना ही था। ‌

विध्वंस के चार कदम- नोटबंदी जीएसटी लॉकडाउन और कारपोरेट टैक्स छूट और लूट ने अर्थव्यवस्था की कमर पहले ही तोड़ दी थी। मैन्युफैक्चरिंग ढहने लगी और सकल घरेलू उत्पाद में उसकी हिस्सेदारी कम होने से रोजगार का सृजन बंद हो गया। प्रत्यक्ष करों में छूट और अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि ने खुदरा व्यापार से लेकर आम जन का जेब खाली कर दिया।

2012 से 2024 के मध्य वेतन जाम से मध्यवर्ग पर भारी असर पड़ा। आउटसोर्सिंग, ठेका मजदूरी और फिक्स्ड टर्म जॉब ने सेवा क्षेत्र को बुरी तरह तोड़ दिया है। पंकज पचौरी के अनुसार अर्बन क्षेत्र में औसत वेतन 25 हजार और रुरल क्षेत्र में 18 हजार पर रुका हुआ है। अगर इसे महंगाई और रुपए की गिरती कीमत के संदर्भ में देखें तो अट्ठारह से पंद्रह हजार भी नहीं ठहरता। यही ग्यारह से बारह करोड़ की संख्या वाला सैलरी क्लास था ।जिसकी पहुंच बाजार तक थी। इस पर पड़ी आर्थिक मार से आंतरिक बाजार की सुस्ती ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी।यह मोदी मेड आपदा है। जो युद्ध काल में असर दिखा रही है।

इन टॉलरेंस और कॉर्पोरेट टेक ओवर-असहमति पर बढ़ रहे राज्य दमन बुलडोजर संस्कृति अल्पसंख्यकों के खिलाफ चल रहे संघी और हिंदुत्व वादी अभियान और कमजोर वर्गों पर बढ़ते हमले “जिसे सीधे राज्य द्वारा संरक्षण हासिल है “ने भारत में पूंजी निवेश की स्थिति खराब कर दी है। ऐसे माहौल में कोई निवेशक क्यों जोखिम मोल लेगा। उद्योग जगत बहुत दूरदर्शी होता है। वह किसी देश के भविष्य को पहले ही भांप लेता है।इसलिए 2021 के बाद से भारत से पूंजी पलायन की गति बहुत तेज हो गई है।

दूसरा प्रश्न -मित्र पूंजीपतियों के द्वारा येनकेन प्रकारेण उद्योगों के अधिग्रहण ने स्थिति को भयावह बना दिया है। यहां तीन उदाहरण से स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। एनडीटीवी के प्रणव को जिस तरह आईटी और सीबीआई के साथ मीडिया द्वारा अपमानित किया गया । इसके दो परिणाम निकले।एक – स्वतंत्र मीडिया को डराकर खत्म कर दिया गया और दूसरा सत्ता संस्थाओं का इस्तेमाल कर एनडीटीवी को अदानी के हाथ सौंप दिया गया। एनडीटीवी पर सीबीआई ईडी और इनकम टैक्स के रेड डाले गए और मेहनत से खड़े किए गए एक संस्थान को डुबो दिया गया ।अंत में उन्हें एनडीटीवी अदानी को सौंपना । आज प्रणव राय एक मोबाइल और एक कैमरा के सहारे अपनी जन पक्षधर पत्रकारिता को जारी रखे हुए हैं।

यह एक पैटर्न है जिसे मुंबई एयरपोर्ट ( GVK )के टेकओवर के लिए आजमाया गया। उसके मालिक पर ईडी आईटी के छापे पड़े। मालिक को जेल जाना पड़ा। जब एयरपोर्ट अदानी के हाथ में चला गया। तो उद्योगपति जेल से बरी हो गया।

सबसे ताजा और दिलचस्प मामला सिंगापुर बेस्ड उद्योगपति असद बुहारी का है।जिनका चेन्नई में एक 1200 MW का थर्मल पावर प्लांट था।जिस पर 2017 से ही छापे पड़ना शुरू हुआ। सीबीआई ईडी ने जांच शुरू की। अंत में उन्हें 2023 में गिरफ्तार कर लिया गया और 31 महीना जेल में रहने के बाद मई 2026 में जेल से बाइज्जत बरी हो गए। 

इस बीच कंपनी के मुख्य कर्ताधर्ता के जेल में रहने के कारण कंपनी घाटे में चली गई और उसे नीलाम कर अदानी को सौंप दिया गया अब पता चला कि ईडी और सीबीआई के पास अहमद बुहारी के ऊपर केस चलाने का कोई आधार ही नहीं है। वे फिर से सुप्रीम कोर्ट में अपनी कंपनी की वापसी के लिए मुकदमा लड़ रहे हैं।

अब आप तय कीजिए कि मोदी सरकार ने देश को कितनी गहरी चोट पहुंचाई है। ईरान युद्ध के दौरान भारत की डूबती अर्थव्यवस्था के पीछे मुख्य कारक युद्ध नहीं है। सत्ता के ऊंचे मुंडेर पर बैठे हुए गिद्ध हैं । जो देश में औद्योगिक वातावरण को विषाक्त कर रहे हैं। पहले पब्लिक इंस्टीट्यूशंस को लूटा गया। कृत्रिम संकट खड़ा कर उन्हें बदनाम किया गया। फिर उन्हें मित्र पूंजीपतियों के हाथ में सौंप दिया गया ।अब यह प्रक्रिया निजी उद्योग घरानों को भी अपनी गिरफ्त में ले रही है।

“क्या आप भी उम्मीद कर रहे हैं कि मोदी राज में कोई उद्योगपति भारत में निवेश करेगा”। स्पष्ट है कि आज के संकट के लिए सिर्फ और सिर्फ मोदी सरकार जिम्मेदार है ।कोई वाह्य कारक नहीं। युद्ध ने सिर्फ उत्प्रेरक का काम किया है। 

जारी…..।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं।)

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