भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास में कुछ गिने-चुने राजनेता ही ऐसे हुए हैं जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था की चूलें हिलाने का माद्दा दिखाया। इन चेहरों में लालू प्रसाद यादव का नाम सबसे ऊपर, सबसे मुखर और सबसे विवादास्पद रूप में दर्ज है। करीब पांच दशकों के अपने राजनीतिक जीवन में वे कभी मसीहा बनकर उभरे, तो कभी उन पर व्यवस्था को पंगु बनाने का आरोप लगा। एक साधारण, निर्धन पृष्ठभूमि और गंवई परिवेश से निकलकर देश के सबसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य बिहार की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना और फिर राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बन जाना—लालू यादव का सफर केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े सामाजिक, भाषाई और वैचारिक संक्रमण की गाथा है।
लालू प्रसाद यादव को पूरी तरह समझने के लिए किसी एक राजनीतिक चश्मे या पूर्वाग्रह से मुक्त होना पड़ेगा। वे भारतीय लोकतंत्र के एक ऐसे ‘पैराडॉक्स’ (विरोधाभास) हैं, जिन्हें न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही बिना आलोचना के स्वीकार किया जा सकता है। एक तरफ वह उस सामाजिक चेतना के प्रतीक हैं जिसने सदियों से हाशिए पर पड़े वंचितों को सिर उठाकर जीना सिखाया, तो दूसरी तरफ वे एक ऐसी प्रशासनिक विफलता के मुख्य सूत्रधार भी रहे जिसने बिहार को आर्थिक और औद्योगिक रूप से दशकों पीछे धकेल दिया।
एक जन नेता की शैली और जनमानस से जुड़ाव
लालू यादव की राजनीति पारंपरिक अर्थों में संभ्रांत राजनीति के ताबूत पर आखिरी कील की तरह थी। 1990 के दशक से पहले तक, देश की राजनीति और मुख्यधारा के विमर्श पर एक खास तरह के शास्त्रीय, गंभीर और अभिजात्य वर्ग का नियंत्रण था। लालू यादव ने इस पूरे ढांचे को अपनी अनूठी भाषाई शैली और थियेट्रिक्स से ध्वस्त कर दिया। उन्होंने विशुद्ध देसी, ठेठ और गंवई अंदाज को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनाया।
उनकी भाषा में कबीर की फक्कड़ता और लोकजीवन के मुहावरे थे। विरोधियों पर चुटीले तंज कसना, जनता के बीच जाकर उसी की शैली में बात करना और खुद को कभी भी ‘शासक’ के रूप में पेश न करके ‘उन्हीं में से एक’ दिखाना उनकी वह कला थी, जिसने बिहार के आम गरीब, रिक्शे वाले, चरवाहे और मल्लाह को सत्ता के बेहद करीब ला खड़ा किया। जहां अन्य राजनेता मंचों से उपदेश देते थे, वहीं लालू यादव जनता से संवाद करते थे। यह ‘मास कनेक्ट’ ही था जिसने उन्हें एक राजनेता से आगे बढ़ाकर एक जननायक और जनमानस का हिस्सा बना दिया।
सामाजिक न्याय का स्वर्णिम दौर: वंचितों का सशक्तिकरण
1990 का दशक भारतीय राजनीति में ‘मंडल युग’ के नाम से जाना जाता है। इस दौर में लालू यादव सामाजिक न्याय के सबसे बड़े झंडाबरदार बनकर उभरे। आजादी के बाद से बिहार की सत्ता और नौकरशाही पर पारंपरिक रूप से सवर्णों का एकाधिकार था। लालू यादव ने इस ऊर्ध्वाधर सत्ता ढांचे को पूरी तरह से क्षैतिज कर दिया।
सम्मान की लड़ाई और मनोवैज्ञानिक बदलाव
लालू यादव की राजनीति का सबसे बड़ा अवदान नौकरियों या आर्थिक लाभों से परे ‘मनोवैज्ञानिक सशक्तिकरण’ का था। उनका एक प्रसिद्ध नारा था—”स्वर्ग नहीं दिया, स्वर दिया।” उन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े दलितों, पिछड़ों और अकलियतों के भीतर यह विश्वास जगाया कि वे भी सत्ता के बराबर के साझीदार हैं। जब उन्होंने सार्वजनिक मंचों से शोषितों को ललकारा कि वे सामंतों के सामने अपनी रीढ़ सीधी करके खड़े हों और आंखों में आंखें डालकर बात करें, तो यह केवल राजनीतिक भाषण नहीं था। यह सदियों पुरानी हीनभावना से एक बड़े जनमानस की मुक्ति का उद्घोष था।
धर्मनिरपेक्षता की अग्निपरीक्षा
लालू यादव के राजनीतिक जीवन का दूसरा सबसे मजबूत और अटूट स्तंभ उनकी धर्मनिरपेक्ष साख रही है। 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी की ‘रथ यात्रा’ पूरे देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की लहर पैदा कर रही थी और कई राज्यों की सरकारें मूकदर्शक बनी हुई थीं, तब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लालू यादव ने बेहद कड़ा और ऐतिहासिक राजनीतिक फैसला लेते हुए समस्तीपुर में उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब देश के कई राज्य दंगों की आग में झुलस रहे थे, तब लालू यादव ने अपनी प्रशासनिक कड़ाई के बल पर बिहार में साम्प्रदायिक सौहार्द को आंच नहीं आने दी। इस कदम ने उन्हें मुस्लिम समाज का एकछत्र रक्षक और ‘एम-वाई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण का निर्माता बना दिया, जो अगले ढाई दशकों तक बिहार की राजनीति का सबसे अजेय किला रहा।
प्रशासनिक क्षमता की एक झलक
अक्सर बिहार के संदर्भ में उनकी प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठाए हैं, लेकिन 2004 से 2009 के बीच जब वे केंद्र की यूपीए-1 सरकार में रेल मंत्री बने, तो उन्होंने आलोचकों को चौंका दिया। उनके कार्यकाल में भारतीय रेलवे, जो लगातार घाटे में चल रही थी, करीब 85,000 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक सरप्लस में आ गई। उन्होंने बिना यात्री किराया बढ़ाए, माल ढुलाई की रणनीतिक क्षमता बढ़ाकर और कमियों को दूर करके रेलवे का कायाकल्प किया। उनके इस ‘बिजनेस मॉडल’ का अध्ययन करने के लिए आईआईएम अहमदाबाद और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल जैसे वैश्विक संस्थानों के प्रोफेसर और छात्र आए। यह इस बात का प्रमाण था कि जब लालू यादव को एक स्थापित और सहयोगी तंत्र मिला, तो उन्होंने अपनी व्यावहारिक सोच से बड़े परिणाम दिए।
गांधी मैदान और ‘रैली पॉलिटिक्स’
लालू यादव के पहले कार्यकाल (1990-1995) के दौरान पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की एक अभूतपूर्व प्रयोगशाला बन चुका था। इस दौर में लालू यादव के सीधे राजनीतिक संरक्षण और शह के तहत गांधी मैदान में “रैली पॉलिटिक्स” का एक नया अध्याय शुरू हुआ, जिसने मंडल आंदोलन को जमीन पर संस्थागत रूप दिया।
1991 से 1994 के बीच गांधी मैदान में लगभग हर पिछड़ी, अति-पिछड़ी और दलित जाति की अलग-अलग विशाल महा-रैलियां आयोजित की गईं। इसमें कुर्मी चेतना रैली, कुशवाहा रैली, निषाद रैली, धानुक रैली, कानू रैली, नाई रैली और रविदास रैली शामिल थीं। इन रैलियों का स्वरूप पारंपरिक रैलियों से बिल्कुल जुदा था। बिहार के सुदूर गांवों से गरीब, शोषित और वंचित समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में, हाथों में लाठियां लिए और झोले में सत्तू-प्याज बांधकर ट्रेन और बसों की छतों पर सवार होकर पटना पहुंचने लगे। संभ्रांत वर्ग द्वारा यह कहकर मज़ाक उड़ाया जाता था कि “ये लोग राजधानी की हवा और गांधी मैदान की घास खराब कर रहे हैं”, लेकिन लालू यादव ने इसी भीड़ को सत्ता का असली मालिक घोषित कर दिया।
लालू की द्विआधारी रणनीति
इस रैली पॉलिटिक्स को शह देने के पीछे लालू यादव की एक बेहद चतुर और गहरी राजनीतिक रणनीति काम कर रही थी। इसके दो मुख्य उद्देश्य थे:
* सवर्ण प्रभुत्व को चुनौती: वे पटना के सवर्ण प्रशासनिक अमले, न्यायपालिका और राजनीतिक विरोधियों को यह दिखाना चाहते थे कि सरकार के पीछे कौन सा जनसैलाब खड़ा है। यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक दबाव और शक्ति प्रदर्शन था।
* जातीय अस्मिता और आत्मविश्वास का उदय: लालू यादव खुद इन रैलियों में शामिल होते थे, उनके पारंपरिक प्रतीकों (जैसे लाठी या मवेशी) को अपनाते थे और उनकी मांगों को जायज ठहराते थे। इससे इन जातियों के भीतर सदियों का डर खत्म हुआ और वे राजनीतिक रूप से सजग हो गए।
विरोधाभास: इसी रणनीति से फूटा विद्रोह
इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास यह रहा कि जिन रैलियों को लालू यादव ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए शह दी थी, अंततः उन्हीं रैलियों ने उनके सामाजिक न्याय के कुनबे में पहली बड़ी दरार पैदा कर दी। 1994 में गांधी मैदान में आयोजित ‘कुर्मी चेतना रैली’ इसका टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस रैली का नेतृत्व सतीश कुमार और नीतीश कुमार जैसे नेता कर रहे थे।
इस रैली में पहली बार खुलेआम लालू यादव की नीतियों के खिलाफ तीखा असंतोष व्यक्त किया गया। गैर-यादव पिछड़ी जातियों ने आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता का मलाईदार हिस्सा केवल एक विशेष जाति (यादव) को मिल रहा है और बाकी पिछड़ों को दरकिनार किया जा रहा है। इसी रैली ने नीतीश कुमार को लालू यादव से हमेशा के लिए अलग होने का वैचारिक और सामाजिक आधार दिया, जिसके बाद समता पार्टी का गठन हुआ और मंडल की सामूहिक ताकत बिखर गई।
* विजन की सीमाएं और ‘थिंक टैंक’ का अभाव
लालू यादव की सबसे बड़ी रणनीतिक और वैचारिक चूक यह थी कि उनके पास कभी भी एक आधुनिक और संस्थागत ‘थिंक टैंक’ नहीं रहा। वे ‘सोशल जस्टिस’ (सामाजिक न्याय) के तो उस्ताद थे, लेकिन वे सामंती जकड़न में उलझे बिहार जैसे राज्य में ‘इकोनॉमिक जस्टिस’ (आर्थिक न्याय) की गंभीरता व अति-आवश्यकता (अर्जेंसी) और उसके महत्व को समय रहते नहीं समझ सके।
शुरुआती दिनों में पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रंजन यादव जैसे अकादमिक लोग उनके साथ थे, जिन्हें लालू जी का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। लेकिन, रंजन यादव जैसे लोग न तो ‘पॉलिटिकल स्ट्रेटेजिस्ट’ थे, न ही ‘पॉलिसी मेकर्स’। वे निजी हित के लिए लालू यादव के व्यक्तिगत सलाहकार थे जिन पर लालू यादव की अत्यधिक निर्भरता थी, जिसमें समय के साथ महत्वाकांक्षाओं का टकराव होना तय होता है। जब चारा घोटाले के बाद लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता सौंपी, तो रंजन यादव जैसे सलाहकारों की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को धक्का लगा और यह ‘वन-मैन थिंक टैंक’ बिखर गया और वे खुद लालू के धुर विरोधी बन गए।
लालू यादव ने कभी भी अपनी पार्टी के भीतर एक ऐसा स्वतंत्र संस्थान या बुद्धिजीवियों का समूह खड़ा नहीं किया जो जातियों से ऊपर उठकर बिहार के दूरगामी आर्थिक विकास, कृषि सुधार, और औद्योगिक ब्लूप्रिंट पर काम कर सके।
विकास को ‘अभिजात वर्ग’ का एजेंडा मानना
थिंक टैंक न होने के कारण लालू यादव का विजन इस बात पर आकर सिमट गया कि विकास, शहरीकरण, चमचमाती सड़कें और औद्योगीकरण केवल ‘अमीरों’ या सवर्णों के काम आते हैं। उनका यह अनौपचारिक दृष्टिकोण कि “सड़क बनाने से वोट नहीं मिलता, गरीब को सम्मान चाहिए” उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। एक प्रबुद्ध थिंक टैंक उन्हें यह समझा सकता था कि खराब सड़कें, बिजली का अभाव और उद्योगों की कमी का असर गरीबों पर भी पड़ता है, क्योंकि इसके अभाव में रोजगार पैदा नहीं होते और बड़े पैमाने पर पलायन शुरू होता है। 1980 के दशक में शुरु हुआ पलायन आज लगभग एक चौथाई बिहारी को बिहार से बाहर कर दिया है। उन्होंने बिहार को सामाजिक चेतना तो दी, लेकिन उस चेतना को आर्थिक समृद्धि और रोजगार में बदलने का कोई ढांचा नहीं दे पाए।
सवर्णों की भयानक गोलबंदी और ‘यादवीकरण’ का सच
1990 के दशक में बिहार ने सामाजिक और वर्ग संघर्ष का एक अत्यंत हिंसक दौर देखा। लालू यादव के उभार के खिलाफ सवर्णों की गोलबंदी बहुत भयानक और आक्रामक थी। यह गोलबंदी केवल दो राजनीतिक विचारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह सदियों पुराने सामंती सत्ता के ढांचे के ढहने की प्रतिक्रिया थी।
जब शासन-प्रशासन, थानों और प्रखंडों की चाबी पारंपरिक शोषक वर्ग के हाथों से निकलकर पिछड़ों और दलितों के पास जाने लगी, तो पुराने जमींदार वर्ग को गहरा झटका लगा। मंडल कमीशन के विरोध में सवर्ण युवा सड़कों पर उतर आए। लालू यादव ने इसे रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दी। इसी दौर में बिहार के ग्रामीण इलाकों में भूमिहीन दलितों (जिनके साथ नक्सली संगठन थे) और सवर्ण जमींदारों की निजी सेनाओं (जैसे रणवीर सेना और कुंवर सेना) के बीच खूनी मुठभेड़ और भीषण नरसंहार हुए। सवर्णों को लगा कि लालू सरकार उनके दमन को परोक्ष संरक्षण दे रही है, जिसके कारण वे उनके खिलाफ पूरी तरह लामबंद हो गए।
विरोधियों और मीडिया द्वारा लालू यादव पर यह सबसे बड़ा आरोप लगाया गया कि उन्होंने बिहार का ‘यादवीकरण’ कर दिया है। इस आरोप को यदि हम सांख्यिकीय और तथ्यात्मक रूप से देखें, तो सच्चाई बेहद संतुलित और अलग नजर आती है।
• नौकरियों में सवर्णों का दबदबा: यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि लालू यादव के पंद्रह वर्षों के शासनकाल के दौरान भी बिहार की ब्यूरोक्रेसी, सचिवालय और क्लास-1 व क्लास-2 की नौकरियों में यादवों या अन्य पिछड़ों की संख्या न के बराबर थी। ऊंचे प्रशासनिक पदों (जैसे मुख्य सचिव, डीजीपी, सचिव) पर सवर्ण अधिकारियों का ही भारी बहुमत था। इसलिए “नौकरियों का यादवीकरण हो गया”, यह दावा आंकड़ों की कसौटी पर पूरी तरह गलत साबित होता है।
• सत्ता के अहसास का बदलाव: लेकिन ‘यादवीकरण’ की यह धारणा आंकड़ों से नहीं, बल्कि ‘सत्ता के अहसास’ से पैदा हुई थी। हालांकि लालू यादव ने जमीनी स्तर पर—विशेषकर थानों और प्रखंडों में—यादव दरोगाओं और अधिकारियों की तैनाती को प्राथमिकता दी। आम जनता के लिए सचिवालय दूर था, थाना पास था। जब सवर्णों ने देखा कि थाने में बैठा यादव दरोगा उसकी धौंस को खारिज कर रहा है, तो उनके लिए यह ‘यादवीकरण’ था, जबकि लालू समर्थकों के लिए यह ‘प्रशासन का लोकतांत्रीकरण’ था।
• अति-पिछड़ों में असंतोष: हालांकि, गांधी मैदान की रैलियों से उपजा असंतोष यह साफ करता है कि सत्ता का राजनीतिक लाभ, टिकटों का वितरण और सरकारी ठेकेदारी धीरे-धीरे यादव जाति और लालू परिवार के इर्द-गिर्द अधिक केंद्रित होने लगा था। इससे मंडल आंदोलन के भीतर शामिल अन्य छोटी और कमजोर पिछड़ी जातियां खुद को अलग-थलग महसूस करने लगीं, जिससे “यादवीकरण” का यह नैरेटिव विरोधियों के लिए एक अचूक हथियार बन गया।
मीडिया का चरित्र और नैरेटिव की जंग
लालू यादव की छवि को देश और दुनिया के सामने ‘विलेन’ या एक विदूषक के रूप में स्थापित करने में 1990 के दशक के मुख्यधारा के मीडिया (जो आज भी सवर्णों के हाथ में ही है) बहुत बड़ी भूमिका निभाई। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर मुख्य रूप से बड़े कॉर्पोरेट घरानों और पारंपरिक संभ्रांत वर्ग का नियंत्रण रहा, जिनकी सांस्कृतिक और जातीय पृष्ठभूमि सवर्ण है।
मीडिया ने गढ़ा लालू का चरित्र
जब लालू यादव खटाल से फाइलें निपटाते थे, कुएं पर नहाते थे या अपनी अनगढ़ भाषा में बात करते थे, तो दिल्ली और पटना के संपादकों को उसमें पिछड़ापन और गंवारपन दिखता था। मीडिया ने उनके सामाजिक कार्यों—जैसे गरीबों के बच्चों के लिए ‘चरवाहा विद्यालय’ खोलना या साम्प्रदायिक दंगों को रोकना—को वह सुर्खी नहीं दी, जो उनके चुटकुलों और बाद की कमियों को दी। उनके हर कदम को एक नकारात्मक रंग में पेश किया गया।
धारणा की लड़ाई: यदि लालू यादव के पास अपना कोई मजबूत मीडिया हाउस या अनुकूल मीडिया तंत्र होता, तो निश्चित रूप से उनकी छवि बहुत अलग होती। तब उनकी विफलताओं को ‘ऐतिहासिक साजिशों’ या ‘संसाधनों की कमी’ के रूप में पेश किया जाता और उनके सामाजिक न्याय के नैरेटिव को और अधिक साख मिलती।
परंतु, मीडिया केवल छवि बनाता नहीं है, वह जमीन को दिखाता भी है। लालू शासनकाल के उत्तरार्ध में बिहार में जो ‘अपहरण उद्योग’, रंगदारी, डॉक्टरों-व्यापारियों का पलायन और सड़कों का पूरी तरह गायब हो जाना जैसी जमीनी हकीकतें थीं, वे वास्तविक थीं।
गोविंदाचार्य की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और मंडल का बिखराव
लालू यादव के ‘सोशल जस्टिस’ (सामाजिक न्याय) के इस किले को ढहाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने एक बेहद बारीक और दीर्घकालिक रणनीति तैयार की। इस रणनीति के मुख्य रणनीतिकार थे भाजपा के तत्कालीन महासचिव के. एन. गोविंदाचार्य। उन्होंने ही ‘सोशल जस्टिस’ की काट के रूप में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का सिद्धांत गढ़ा।
गोविंदाचार्य ने भांप लिया था कि राम मंदिर आंदोलन (कमंडल) के जरिए वे हिंदुओं को पूरी तरह एकजुट नहीं रख सकते क्योंकि मंडल आंदोलन ने पिछड़ों को सवर्णों के खिलाफ खड़ा कर दिया था। भाजपा केवल सवर्णों के दम पर कभी सत्ता में नहीं आ सकती थी। इसलिए उन्होंने पिछड़ी और दलित जातियों के भीतर के आंतरिक अंतर्विरोधों को हवा देना शुरु किया।
अति-पिछड़ों की लामबंदी और नीतीश कुमार का उभार
गोविंदाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग का मूल मंत्र था—”यादव और जाटव जैसी मजबूत पिछड़ी-दलित जातियों के वर्चस्व के खिलाफ, अन्य सैकड़ों छोटी और कमजोर उप-जातियों को एकजुट करना।
2014 में नरेंद्र मोदी का उदय: सोशल इंजीनियरिंग का चरम बिंदु
गोविंदाचार्य ने 1990 के दशक में जिस सोशल इंजीनियरिंग का पौधा रोपा था, उसका सबसे विशाल फल 2014 और उसके बाद के लोकसभा चुनावों में दिखा। नरेंद्र मोदी के रूप में भाजपा ने देश के सामने एक ऐसा चेहरा पेश किया जो हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की बात भी करता था और खुद ‘पिछड़ी जाति’ से आता था।
जो गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और गैर-जाटव दलित वर्ग दशकों से सामाजिक न्याय के आंदोलन में हाशिए पर था, वह सामूहिक रूप से नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा के साथ आ गया। 2014, 2019 और 2024 के चुनाव परिणाम इस बात के गवाह हैं कि भाजपा की प्रचंड जीत की असली रीढ़ यही ‘लोअर ओबीसी’ और अति-पिछड़ा वर्ग रहा है, जिसे कभी सामाजिक न्याय की ताकतों का आधार माना जाता था।
सामाजिक न्याय के पुरोधाओं की विफलता
इस पूरी राजनीतिक यात्रा का सबसे दुखद और विचारणीय पहलू यह है कि लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और मायावती जैसे सामाजिक न्याय के पुरोधाओं के पास आंदोलन के पहले चरण की सफलता के बाद न तो कोई नया शोध था और न ही कोई नई सोच थी और न ही भविष्य को लेकर कोई विजन था। वे पूरी तरह से एक वैचारिक ठहराव का शिकार हो गए।
बदली हुई पीढ़ी की आकांक्षाओं को न पढ़ पाना
इन नेताओं की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वे दशकों तक केवल अपने ‘अतीत के गौरव’ को ही बेचते रहे। लेकिन वे इस बुनियादी तथ्य को भूल गए कि ‘अतीत के गौरव’ का पैंतरा दक्षिणपंथी राजनीतिक फलसफे का सबसे पहला हर्फ़ होता है। ये राजनेता इस जरूरी राजनीतिक पाठ को भुला देने की गलती कर बैठे कि सामाजिक न्याय को आर्थिक न्याय की दिशा में न मोड़कर जब उसे पहचान की राजनीति (आइडेंटिटी पॉलिटिक्स) में सिकोड़ दिया जाता है, वह दक्षिणपंथ की घर्षण मुक्त जमीन (फ्रिक्शनलेस सरफेस) पर बेलगाम लुढ़कने लगता है, क्योंकि छोटी पहचान (स्मॉलर आइडेंटिटी) के बड़ी पहचान में समा जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है।
हजारों जातियों में बंटे एक समाज को हमेशा इस ख़तरे के प्रति सचेत होने की जरूरत होती है। लालू जैसे राजनेता को इस चूक की भारी कीमत चुकानी पड़ी। वे रैलियों में कहते रहे कि “हमने तुम्हें सम्मान दिया” लेकिन वे यह भूल गए कि 1990 के बाद जो नई पीढ़ी पैदा हुई थी, उसने सवर्णों का वह पुराना सामंती जुल्म नहीं देखा था। उस नई पीढ़ी के लिए ‘आत्मसम्मान’ एक सामान्य बात थी; उसकी नई आकांक्षाएं थीं—विश्वस्तरीय शिक्षा, कंप्यूटर, तकनीकी कौशल, नौकरियां, अच्छी सड़कें और आधुनिक जीवन।
इन दलों के पास कोई ऐसा वैचारिक विंग नहीं था जो नई आर्थिक नीति, वैश्वीकरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था के दौर में इन पिछड़ों और दलितों की बदलती जरूरतों पर शोध करता। उन्होंने माना कि पुराना जातीय कार्ड और गांधी मैदान की रैलियों का पुराना नुस्खा ही हमेशा काम आता रहेगा।
वैकल्पिक आर्थिक मॉडल देने में पूरी तरह नाकामी
जहां दक्षिण भारत के द्रविड़ आंदोलनों ने सामाजिक न्याय के साथ-साथ तमिलनाडु को एक औद्योगिक और शैक्षणिक हब बना दिया, वहीं उत्तर भारत के ये सामाजिक न्याय के नेता कोई भी वैकल्पिक आर्थिक मॉडल पेश नहीं कर पाए। इनका समाजवाद केवल पूंजीवाद के अंधविरोध और सरकारी बैसाखियों तक सीमित रह गया।
आंदोलन का ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ में तब्दील होना
इस वैचारिक ठहराव की अंतिम और सबसे कड़वी परिणति यह हुई कि यह महान सामाजिक आंदोलन अंततः ‘मिशन से पारिवारिक जागीर’ में बदल गया। लालू यादव और मुलायम सिंह यादव ने अपनी पूरी राजनीति को अपने बेटे, बेटियों, साले, और अन्य रिश्तेदारों के इर्द-गिर्द समेट दिया। जो आंदोलन कभी लाखों प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के त्याग से बना था, वह ‘पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ तब्दील हो गया। इसे देखकर न सिर्फ गैर-यादव पिछड़े बल्कि संपन्न, पढे-लिखे व राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखनेवाले यादवों ने अपना भी अपना रास्ता बदल लिया।
लालू प्रसाद यादव और उनके समकालीन सामाजिक न्याय के आंदोलन का मूल्यांकन इतिहास के पन्नों में हमेशा दो विरोधी धाराओं के बीच तैरता रहेगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि लालू यादव ने बिहार के इतिहास में वह काम किया जो सदियों से नहीं हुआ था। उन्होंने मूक और शोषित जनमानस को ‘आवाज’ दी, गांधी मैदान जैसी जगहों पर हाशिए के समाज का महाकुंभ खड़ा करके लोकतंत्र को सचमुच ‘संख्याबल की ताकत’ से रूबरू कराया और साम्प्रदायिक ताकतों के सामने कभी घुटने नहीं टेके। इस रूप में वे हमेशा भारतीय लोकतंत्र के एक महानायक रहेंगे।
परंतु, एक राजनेता की त्रासदी यह भी है कि वह केवल अतीत के सहारे भविष्य नहीं बदल सकता। लालू यादव ने समाज को बदलने के लिए “मशीन का ढांचा” तो खड़ा किया, लेकिन समय के साथ उस मशीन में “नया सॉफ्टवेयर” (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक उद्योग, सुशासन, और व्यापक आर्थिक सोच) डालना भूल गए।
उनकी इसी वैचारिक शून्यता और रणनीतिक ठहराव का परिणाम था कि के. एन. गोविंदाचार्य की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और बाद में नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ सबका विकास’ ने उस सामाजिक न्याय की पूरी जमीन को ही अपनी तरफ खींच लिया। लालू यादव ने पिछड़ों को सम्मान और रैलियों का मंच तो भरपूर दिया, लेकिन वे उन्हें वह आर्थिक समृद्धि और आधुनिक दृष्टि नहीं दे सके जिसके बिना सम्मान की रक्षा दीर्घकाल तक असंभव होती है। यही लालू प्रसाद यादव के पूरे राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा सच, सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे बड़ी त्रासदी है।
(जितेंद्र कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)