लोकतंत्र का संकट और समाज

डॉ. राममनोहर लोहिया का मानना था कि लोकतंत्र की असली ताक़त केवल संसद में नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता, नागरिक भागीदारी और जनचेतना में निहित होती है। 

हम लोग सोचते हैं कि लोकतंत्र केवल संसद और संविधान में जीवित है। लेकिन ऐसा नहीं है। लोकतंत्र केवल एक शब्द नहीं हैं, यह व्यवहार है। और, इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा संसद से पहले समाज में होती है और संविधान से पहले नागरिक के चरित्र में। यदि मनुष्य के व्यवहार में समानता, सम्मान, सहिष्णुता और संवाद के लिए स्थान नहीं है, तो दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संविधान भी लोकतंत्र को जीवित नहीं रख सकता। इसलिए इसे केवल शासन की व्यवस्था मानना उसके अर्थ को सीमित करना है।

वह एक राजनीतिक प्रणाली जरूर है, किंतु उससे पहले वह मनुष्य के जीने का ढंग है। एक ऐसी जीवन-पद्धति, जो स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और परस्पर सम्मान को दैनिक व्यवहार में उतारने की अपेक्षा करती है। लोकतंत्र का भविष्य केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों के संस्कारों से तय होता है। जहाँ ऐसे संस्कार मजबूत होंगे वहाँ का लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

हम प्रायः लोकतंत्र को संविधान, चुनाव, संसद और मतदान के अधिकार तक सीमित कर देते हैं। ये उसकी अनिवार्य संस्थाएं ज़रूर हैं, किंतु केवल यही उसकी सम्पूर्ण परिभाषा नहीं है। संविधान लोकतंत्र की देह है, लेकिन उसका प्राण उसके नागरिकों का लोकतांत्रिक आचरण है। जब लोकतांत्रिक मूल्य समाज के व्यवहार में नहीं उतरते, तब संस्थाएं भी धीरे-धीरे अपना नैतिक बल खोने लगती हैं।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट तब नहीं आता जब सरकार बदलती है। वह तब जन्म लेता है जब समाज में संवाद की जगह शोर, सहिष्णुता की जगह कटुता, समानता की जगह वर्चस्व, प्रेम की जगह घृणा स्थापित होने लगती है और असहमति को देशद्रोह समझा जाने लगता है।

संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने लोकतंत्र को केवल शासन की प्रणाली नहीं, बल्कि साथ मिलकर जीने की एक पद्धति बताया था। उनके अनुसार उसका सार साझा अनुभव, संवाद और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा के प्रति सम्मान में निहित है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं रह सकता, जब तक उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ संविधान के शब्दों, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के व्यवहार में उतारना है।

संयोग नहीं है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को राष्ट्र-जीवन के मूल आधार के रूप में स्थापित करती है। ये केवल राज्य के आदर्श नहीं हैं बल्कि प्रत्येक नागरिक के नैतिक दायित्व भी हैं। यह व्यवस्था तभी परिपक्व होती है जब संविधान की भाषा समाज की भाषा बन जाए और उसके मूल्य नागरिकों के स्वभाव और व्यवहार का हिस्सा बन जाएं।

संविधान लागू होने के अवसर पर अंबेडकर ने एक और बात के लिए हमें चेताया था। उन्होंने कहा था कि यदि देश में सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बनी रहीं, तो राजनीतिक लोकतंत्र भी संकट में पड़ जाएगा। उनका आशय था कि यदि समाज जन्म, जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर मनुष्य की गरिमा तय करता रहेगा, तो मतदान का अधिकार भी लोकतंत्र को स्थायी नहीं बना सकेगा। आज सात दशक बाद भी यह चेतावनी उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है।

भारत में नियमित चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएँ अपना कार्य करती हैं। फिर भी जाति आधारित हिंसा, सांप्रदायिक तनाव, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, दलितों और आदिवासियों के साथ भेदभाव तथा असहमति के प्रति बढ़ती असहिष्णुता यह सवाल उठाती है कि क्या राजनीतिक समानता वास्तव में सामाजिक समानता में बदल सकी है? संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए हैं, किंतु समाज अभी सभी को समान सम्मान देने की प्रक्रिया में अधूरा है।

महात्मा गांधी लोकतंत्र को नैतिक अनुशासन मानते थे। उनका विश्वास था कि सच्चा लोकतंत्र वही है जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति को भी वही अवसर और सम्मान मिले जो सबसे शक्तिशाली को प्राप्त हैं। वे असहिष्णुता को लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु मानते थे, क्योंकि जहाँ मतभेद को शत्रुता समझ लिया जाता है, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है।

आगे चलकर अमर्त्य सेन ने इस विचार को सार्वजनिक विमर्श की अवधारणा से समृद्ध किया। उनके अनुसार लोकतंत्र का वास्तविक आधार केवल चुनाव नहीं, बल्कि ऐसा समाज है जहाँ नागरिक निर्भय होकर प्रश्न पूछ सकें, अपने विचार व्यक्त कर सकें और सत्ता उत्तरदायी बनी रहे। लोकतंत्र की ताक़त मतपेटियों या ईवीएम मशीनों से कम और सवाल पूछने वाले समाज से अधिक आती है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भयमुक्त मन को स्वतंत्र समाज की पहली शर्त माना था। भयभीत नागरिक कभी लोकतांत्रिक नागरिक नहीं बन सकता। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी लोकतंत्र को केवल शासन-व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य माना। उनकी ‘समग्र क्रांति’ का मूल संदेश यही था कि राजनीतिक परिवर्तन तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन भी जुड़ेंगे।

फ्रीडम हाउस और इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की लोकतंत्र संबंधी रिपोर्टें लगातार संकेत देती हैं  कि अनेक देशों में चुनाव नियमित रूप से होने के बावज़ूद लोकतांत्रिक गुणवत्ता कमजोर हुई है।

इन अध्ययनों का साझा निष्कर्ष है कि लोकतंत्र की सेहत केवल चुनावों से नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों, संस्थागत जवाबदेही और असहमति के सम्मान से भी मापी जाती है। लोकतंत्र संस्थाओं से जितना बनता है, उतना ही सामाजिक संस्कृति से भी।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा संसद में नहीं, घर में होती है, जहाँ बच्चों और महिलाओं की राय सुनी जाती है या नहीं। विद्यालय में होती है, जहाँ सवाल पूछने की स्वतंत्रता है या नहीं। और, समाज में होती है, जहाँ मतभेद के बावजूद संवाद बना रहता है या नहीं। लोकतंत्र मतदान के दिन नहीं, बल्कि नागरिक के रोज़मर्रा के व्यवहार में जीवित रहता है।

अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र की आत्मा को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था कि मनुष्य न किसी का गुलाम बने और न किसी का मालिक। यही लोकतंत्र का नैतिक सार है। लोकतंत्र बहुमत का शासन अवश्य है, किंतु बहुमत की मनमानी नहीं। उसकी मर्यादा अल्पमत के अधिकारों, विधि के शासन और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा से निर्धारित होती है।

आज ज़रूरत केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नागरिक तैयार करने की है। संविधान हमें अधिकार देता है, पर लोकतंत्र को जीवन हमारा व्यवहार देता है। जब हम असहमति का सम्मान करेंगे, बल के स्थान पर सेवा को महत्व देंगे, विविधता को विभाजन नहीं बल्कि समृद्धि मानेंगे और प्रत्येक व्यक्ति को समान गरिमा के साथ देखेंगे, तभी लोकतंत्र अपने वास्तविक अर्थ में जीवित रहेगा।

लोकतंत्र अंततः शब्द नहीं है, व्यवस्था भी नहीं। वह एक संस्कार है, एक सतत् अभ्यास है, एक जीवन-शैली है। उसकी सबसे बड़ी रक्षा संसद, न्यायालय या चुनाव आयोग नहीं करते। उसकी सबसे मजबूत सुरक्षा उस नागरिक के चरित्र में छिपी होती है जो दूसरे मनुष्य की गरिमा का सम्मान करना जानता है। संविधान लोकतंत्र की रूपरेखा दे सकता है, पर उसे आत्मा नागरिक ही देता है।

इसलिए लोकतंत्र का भविष्य कानूनों से पहले हमारे व्यवहार में और संस्थाओं से पहले हमारे संस्कारों में तय होता है। लोकतंत्र की रक्षा का सबसे बड़ा दायित्व अंततः प्रत्येक नागरिक के आचरण पर है।

लोकतंत्र अंततः संविधान की किताबों में नहीं, नागरिकों के चरित्र में बसता है। जब तक वह हमारे व्यवहार का स्वभाव नहीं बनता, तब तक उसकी संस्थाएं भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि मनुष्य होने की सबसे सुंदर और सबसे कठिन कला है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और एक दशक तक पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की पत्रिका यंग इंडियन के प्रभारी रहे हैं)

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