‘एक्सलॉजिक’ मामला : सुप्रीम कोर्ट से केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को राहत, एफआईआर की जांच पर अंतरिम रोक

सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ केरल विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो द्वारा दर्ज एफआईआर की जांच पर 7 दिनों के लिए रोक लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, उनकी बेटी वीणा टी. और दामाद मोहम्मद रियाज़ (जो पूर्व मंत्री हैं) केरल हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने अपील दायर कर सकते हैं।

वे सिंगल बेंच के उस आदेश को चुनौती दे सकते हैं, जिसमें सीएमआरएल -एक्सलॉजिक पे-ऑफ मामले में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। यह निर्देश प्रवर्तन निदेशालय द्वारा केरल पुलिस को दी गई जानकारी के आधार पर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिवीज़न बेंच का यह मानना गलत था कि उनके पास अपील दायर करने का अधिकार नहीं है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने डिवीज़न बेंच के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उन्हें अपील दायर करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया।

जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की एक विशेष बेंच ने कहा कि चूंकि सिंगल बेंच का मानना था कि उनके खिलाफ संज्ञेय अपराध होने के सबूत मौजूद हैं, इसलिए उन्हें ‘पीड़ित पक्ष’ माना जा सकता है। सिंगल बेंच के सामने दायर रिट याचिका में इन लोगों को पक्षकार नहीं बनाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने ईडी और हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करने वाले व्यक्ति के इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया कि FIR दर्ज करने का निर्देश देने से पहले इन लोगों को अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं था।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा: “हम इससे सहमत नहीं हो सकते… यह ऐसा मामला नहीं है, जहां पीएमएलए की धारा 66(2) के तहत सूचना मिलने पर राज्य ने खुद से एफआईआर दर्ज कर ली हो। इसके विपरीत, एफआईआर दर्ज करना और जांच शुरू करना, संवैधानिक कोर्ट द्वारा पारित आदेश के तहत हुआ था।

ऐसा आदेश देते समय, सिंगल बेंच ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा था कि ईडी द्वारा दी गई सूचना में एक संज्ञेय अपराध का पता चलता है, इसलिए राज्य के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य था। यदि याचिकाकर्ताओं को तथ्य के इस निष्कर्ष को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जाती है तो एफआईआर को चुनौती देने वाली किसी अन्य कार्यवाही में भी यह उनके सामने एक बाधा के रूप में खड़ी रहेगी।

इसके अलावा, बीएनएसएस के माध्यम से न्यायिक हस्तक्षेप से एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया, सीआरपीसी के तहत तय की गई प्रक्रिया से बदल गई। पुराने कानून (सीआरपीसी) में धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने का निर्णय लेते समय किसी लोक सेवक या उनके वरिष्ठ अधिकारी की भागीदारी की आवश्यकता नहीं थी। हालांकि, बीएनएसएस की धारा 175(4) में ऐसी शर्त शामिल कर दी गई… हमने बीएनएसएस की धारा 175(4) का जिक्र मामले के गुण-दोष के आधार पर नहीं किया, बल्कि यह स्पष्ट करने के लिए किया कि नए कानून में एफआईआर दर्ज होने से पहले ही, संभावित आरोपी के संबंध में कितना व्यापक अधिकार क्षेत्र दिया गया।

इसके अलावा, हम यह भी देखते हैं कि सिंगल जज ने न केवल एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया, बल्कि जांच शुरू करने और अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ के तहत जांच शुरू करने और उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए इस विशेष कानून की अन्य शर्तों का पालन करना आवश्यक है।

ये तथ्य स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ताओं के लिए एक ‘प्रथम दृष्टया’ आधार बनाते हैं, जिसके तहत वे इस फैसले के खिलाफ अपील करने की अनुमति मांग सकते हैं। इसलिए हम इस फैसले को रद्द करते हैं और याचिकाकर्ताओं को डिवीजन बेंच के समक्ष अपील करने की अनुमति देते हैं।

हम स्पष्ट करते हैं कि ये टिप्पणियां केवल याचिकाकर्ताओं के अपील करने के अधिकार तक सीमित हैं, न कि मामले के गुण-दोष पर। उन्हें अपील दायर करने का मौका देने के लिए हम निर्देश देते हैं कि इस एफआईआर में जांच 7 दिनों तक रुकी रहेगी…” अंतरिम राहत पर राय, जिसे डिवीजन बेंच कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से तय करने के लिए अधिकृत होगी।

(जनचौक ब्यूरो)

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