राफेल से आरोग्य सेतु ऐप तकः सब कुछ क्यों पर्दे में रखना चाहती है केंद्र सरकार!

एक के बाद एक ऐसे महत्वपूर्ण मामले सामने आ रहे हैं जिससे स्पष्ट हो रहा है कि कुछ तो ऐसा है जिसकी केंद्र सरकार पर्देदारी कर रही है। किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता बुनियादी मूल्य हैं पर मोदी सरकार जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं चाहती। अब चाहे पीएम केयर फंड हो या नये संसद भवन सेंट्रल विस्टा का मामला हो, मोदी सरकार पर अपारदर्शिता के आरोप लगते रहे हैं। सबसे ताजा मामला प्रधानमंत्री के आरोग्य सेतु ऐप का है, जिसमें मुख्य सूचना आयुक्त के यहां इस पर छीछालेदर होने के बाद अब केंद्र सरकार का गोलमोल जवाब आया है।

उच्चतम न्यायालय में बुधवार को सेंट्रल विस्टा केस में बहस करते हुए वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी तरह से अपारदर्शी है और पारदर्शिता के मूल्यों की अनदेखी की गई है। सरकार कानून के शासन के बजाय कानून से शासन का सहारा ले रही है। इसकी योजना और नियोजन में सब कुछ एक अपारदर्शी तरीके से किया गया है।

इसी तरह पीएम केयर फंड का मामला है, जिसका ऑडिट सीएजी से करने का प्रावधान नहीं है। यही नहीं सूचना के अधिकार कानून से यह बाहर है। कोई भी जब आय-व्यय का ब्यौरा एवं कितनी-कितनी राशि कहां-कहां से प्राप्त हुई और कोरोना काल में उपरोक्त प्राप्त राशि को कहां-कहां व्यय किया गया, उसका हिसाब एवं पीएम केयर फंड के गठन से पूर्व गठित कमेटी को गठन करने से पूर्व पूरी कमेटी में पदस्थ सदस्यों के नाम पदनाम के संबंधित सूचना आरटीआई एक्ट 2005 के तहत मांगी गईं। प्रधानमंत्री कार्यालय साउथ ब्लॉक न्यू दिल्ली द्वारा केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी द्वारा यही कहा गया कि पीएम केयर फंड सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धाराओं के अंतर्गत लोक प्राधिकरण में नहीं है, इसलिए सूचना का अधिकार के तहत सूचना उपलब्ध कराया जाना संभव नहीं है।

इसी तरह आरोग्य सेतु ऐप का मामला सामने आया है। यह पहले से विवादों में रहा है। अब एक बार फिर से इस ऐप को लेकर विवाद है। सवाल ये है कि आरोग्य सेतु ऐप को बनाया किसने? रिपोर्ट्स आई कि मिनिस्ट्री ने ये आरटीआई दाखिल होने के बावजूद ये जानकारी देने से इनकार किया कि आरोग्य सेतु ऐप को बनाया किसने है। इस कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ऐप को लेकर विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर रहा है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो इसे लोगों पर नजर रखने वाला सिस्टम यानि जासूसी करने वाला बताया था, जिसे किसी प्राइवेट ऑपरेटर से लिया गया है। सरकार ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज किया था। अब तो विवाद बढ़ने पर सरकार ने इसे बनाने में प्राइवेट ऑपरेटर का सहयोग लिया जाना मान लिया है।

कोरोना काल में आरोग्य सेतु ऐप की अहमियत यह है कि हवाई यात्राओं से लेकर मेट्रो और ट्रेनों में सफर से पहले इसे जांचा जाता है। प्रधानमंत्री मोदी बार-बार लोगों से इस ऐप को डाउनलोड करने की अपील कर चुके हैं। अब इसे लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सरकारी वेबसाइटों को डिजाइन करने वाले नैशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर ने कहा है कि आरोग्य सेतु ऐप को किसने बनाया, यह उसे पता ही नहीं है। इसे लेकर मुख्य सूचना आयुक्त ने एनआईसी को फटकार लगाई है और तमाम मुख्य चीफ जन सूचना अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। एनआईसी मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स के तहत आती है।

मुख्य सूचना आयुक्त ने तमाम विभागों के मुख्य जन सूचना अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनसे कहा था कि वे आरोग्य सेतु ऐप के बारे में पूछे गए आरटीआई सवालों पर जवाब दें। साथ में यह हिदायत भी दी थी कि सवालों के जवाब टालमटोल वाला नहीं होना चाहिए। मामले को तूल पकड़ता देख सरकार ने इस मसले पर सफाई दी है। केंद्र सरकार ने कहा कि आरोग्य सेतु ऐप भारत सरकार का उत्पाद है, जिसे इंडस्ट्री के बेस्ट माइंड्स और शिक्षाविदों के साथ सहयोग के जरिए बनाया गया है।

हुआ यह कि सौरव दास नाम के एक शख्स ने मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। दास ने दावा किया है कि उन्होंने आरोग्य सेतु ऐप को बनाने वाले के बारे में जानकारी के लिए एनआईसी, नेशनल ई-गवर्नेंस डिवीजन और मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से संपर्क किया था। किसी रेस्टोरेंट, सिनेमा हॉल, मेट्रो स्टेशन जैसी जगहों पर जाने के लिए मोबाइल में इस ऐप का डाउनलोड होना जरूरी है।

दास ने अपनी शिकायत में कहा कि न हो एनआईसी और न ही मिनिस्ट्री ने उन्हें इस बारे में कोई जानकारी दी। मुख्य सूचना आयुक्त ने नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर से यह भी पूछा है कि वह बताए कि उसकी वेबसाइट पर आरोग्य सेतु ऐप का नाम क्यों है, जबकि उसके पास इसके बारे में जानकारी ही नहीं है।

मुख्य सूचना आयुक्त ने कारण बताओ  नोटिस जारी किया और इसके बाद सरकार की तरफ़ से एक बयान जारी कर दिया गया है। सरकार ने कहा है कि इस ऐप को सरकार ने प्राइवेट सेक्टर के साथ मिल कर तैयार किया है। सरकार के स्पष्टीकरण में  कहा गया है कि कोरोनो वायरस से लड़ने के लिए रिकॉर्ड समय में सार्वजनिक-निजी सहयोग से आरोग्य सेतु ऐप को तैयार किया गया। साथ ही इसे काफी पारदर्शी तरीके से विकसित किया गया था। सरकार ने कहा कि आरोग्य सेतु ऐप को लगभग 21 दिनों के रिकॉर्ड समय में विकसित किया गया था। सरकार की तरफ से कहा गया है कि आरोग्य सेतु ऐप के संबंध में कोई संदेह नहीं होना चाहिए और भारत में कोविड-19 महामारी को रोकने में मदद करने में इसकी काफी भूमिका रही है।

गौरतलब है कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने पारदर्शिता को परिभाषित करते हुए कहा है, ‘पारदर्शिता नियमों, योजनाओं, प्रक्रियाओं, क्रियाओं पर प्रकाश डालने की स्थिति है। यह क्यों कैसे, क्या और कितना को जानने की स्थिति है।’ पारदर्शिता यह सुनिश्चित करती है कि लोक अधिकारी, सिविल सेवक, प्रबंधक, बोर्ड निदेशक और व्यवसायी बेहतर समझ और खुले रूप से कार्य करें। किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता बुनियादी मूल्य हैं। सरकार हो या नौकरशाही, पार्टियां हों या गैरसरकारी स्वयंसेवी संगठन, सभी से आशा की जाती है कि वे लोगों के प्रति जवाबदेह और पारदर्शी होंगे। फिर भी जनप्रतिनिधियों की सरकार जनता से ही क्या और क्यों छिपाना चाहती है यह शोध का विषय बनता जा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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