Friday, August 12, 2022

प्रियंका गांधी की अति सक्रियता से यूपी की राजनीति में उबाल, सेमीफाइनल का असर फ़ाइनल में दिखना तय

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हाल के दिनों में प्रियंका की ‘रफ्तार’ने विरोधियों के साथ ही तमाम राजनीतिक विश्‍लेषकों को चौंका दिया है। चाहे लखीमपुर खीरी हिंसा का मामला हो या आगरा में पुलिस कस्‍टडी में मौत केस, प्रियंका सरकारी मशीनरी से सीधे मोर्चा लेते हुए पीड़ित परिवार तक पहुंच रही हैं। इससे प्रियंका ने कांग्रेस की खोयी जमीन वापस ला पाने में सफलता पाई है या नहीं यह तो 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन से आंका जा सकेगा लेकिन इतना तय है कि यदि प्रियंका गांधी इसे वोट में बदलने में कामयाब रहीं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम कांग्रेस के पक्ष में जाने से रोकना मुश्किल होगा।

दरअसल यूपी के सवर्ण मतदाता, विशेषकर ब्राह्मण राजनीति में हाशिये पर पहुंच गये हैं। ब्राह्मणों का मानना है कि चाहे सपा हो या बसपा ,चाहे भाजपा शासित यूपी हो ,हिमाचल हो ,उत्तराखंड हो, एमपी हो ,बिहार हो या हरियाणा हो सभी राज्यों में ब्राह्मण हाशिये पर हैं और पिछड़े या अन्य सत्ता के शीर्ष पर हैं ,यह तक कि केंद्र में भी पहले तीन स्थान पर ब्राह्मण नहीं हैं, तो बैकबेंचर बनकर ब्राह्मण क्यों रहे? ब्राह्मण यूपी कि राजनीति में प्रियंका गांधी के उभार को बहुत आशा भरी नजरों से देख रहे हैं, जिसका सकारात्मक फायदा कांग्रेस को भविष्य में मिल सकता है।

जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तारीखें करीब आती जा रही हैं, तमाम राजनीतिक दल जनता से जुड़ने की हर संभव कोशिश में जुट गए हैं। सत्तारूढ़ बीजेपी से लेकर सभी विपक्षी दल और तमाम संगठन अपने-अपने अंदाज में रैलियों, यात्राओं वगैरह के माध्‍यम से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। इन्‍हीं सबके बीच कांग्रेस पार्टी भी यूपी में खोई जमीन वापस पाने की कोशिश में है। कांग्रेस महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा लगातार पसीना बहा रही हैं।

हाल के दिनों में प्रियंका की ‘रफ्तार’ ने विरोधियों के साथ ही तमाम राजनीतिक विश्‍लेषकों को चौंका दिया है। चाहे लखीमपुर खीरी हिंसा का मामला हो या आगरा में पुलिस कस्‍टडी में मौत केस, प्रियंका सरकारी मशीनरी से सीधे मोर्चा लेते हुए पीड़ित परिवार तक पहुंच रही हैं। महीने भर में वह दो बार पुलिस हिरासत में ली जा चुकी हैं। अपने दौरे में प्रियंका पीड़ित परिवार से उनके घर के सदस्‍य की तरह ढांढस बंधाती हैं, यही नहीं अपनी पार्टी की तरफ से मुआवजे और समर्थन का भी ऐलान करती हैं। वैसे यूपी में तमाम राजनीतिक दल पहले भी ऐसा करते रहे हैं ले‍किन एक के बाद एक लगातार इस तरह का ट्रेंड पहली बार दे‍खने को मिल रहा है।

यूपी विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 40 फीसदी सीटों की घोषणा करके प्रियंका गांधी ने एक तरह से यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस सीटों की एक बड़ी संख्या पर चुनाव लड़ेगी। यानी अन्य पार्टियों के साथ कोई समझौता या गठबंधन नहीं करेगी। प्रियंका गांधी के इस फैसले ने काफी हलचल मचाई है। प्रियंका ने निश्चित ही उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में एक नया विमर्श खड़ा किया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में 40 फीसदी वोट हासिल करने वाली भाजपा निश्चित ही एक बढ़त के साथ शुरुआत कर रही है, क्योंकि यह 8 से 10 फीसदी मतों को गंवाने की स्थिति में भी बिखरे विपक्ष की मेहरबानी से टक्कर में रहेगी।

नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राह्मण समुदाय से मुख्यमंत्री नहीं बन सका। सूबे में पिछले 3 दशकों से राजनीतिक पार्टियों के लिए ब्राह्मण समुदाय महज एक वोटबैंक बनकर रह गया है। आजादी के बाद यूपी की सियासत में 1989 तक ब्राह्मण का वर्चस्व कायम रहा और 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने। गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने। ये सभी कांग्रेस से थे। इनमें नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे।

अगर इन मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को देखें तो करीब 23 साल तक प्रदेश की सत्ता की कमान ब्राह्मण समुदाय के हाथ में रही है। लेकिन, मंडल और कमंडल की राजनीति ने उन्हें हाशिए पर धकेल किया। बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी से लेकर कलराज मिश्रा जैसे ब्राह्मण नेता चेहरा हुआ करते थे, पर सूबे की सत्ता में कांग्रेस की तरह उनकी हनक नहीं रही।भाजपा में कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त, राजनाथ सिंह और अब योगी आदित्य नाथ यूपी के मुख्यमंत्री बने पर इनमें से कोई ब्राह्मण नहीं है। भाजपा शासित किसी भी राज्य में ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं है। संघ ने महाराष्ट्र में ब्राह्मण देवेन्द्र फणनवीस को मुख्यमंत्री बनवाया था लेकिन भाजपा के ओबीसी नेताओं के आन्तरिक राजनीति का वे शिकार बनकर सत्ता से बाहर हो गये।

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के यूपी का प्रभारी बनाए जाने के बाद से पार्टी किसी न किसी मुद्दे को लेकर लगातार चर्चा में है। खासकर कानून-व्यवस्था, उत्पीड़न और किसानों के मुद्दों पर या तो लगातार आंदोलन कर रही है या चल रहे आंदोलनों में सक्रिय भूमिका में है। सार्वजनिक मंच से पार्टी भले ही सर्व समाज की बात करती हो, पर उसके नेता स्वीकार करते हैं कि अपना आधार वोट बनाने की पुख्ता रणनीति भी बनाई गई है।

प्रदेश में 80 के दशक तक अधिकांश समय कांग्रेस की ही सरकारें रहीं। इस दौरान उसने छह मुख्यमंत्री ब्राह्मण जाति से दिए। अपने जमीनी छोटे-छोटे अभियानों में कांग्रेस के नेता इसका प्रचार करने से भी नहीं चूकते, ताकि ब्राह्मण मतदाताओं के बीच फिर से अपनी पैठ बना सकें। यूपी में वर्तमान में ब्राह्मणों की अनुमानित संख्या 10-12 फीसदी है। पार्टी ने विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण नेता को सीएम चेहरे के रूप में पेश करने की अंदर ही अंदर योजना बना ली है। ब्राह्मण चेहरा कौन होगा, इसके लिए मंथन जरूर चल रहा है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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