Tuesday, August 9, 2022

कब बनेगा यूपी की बदहाली चुनाव का मुद्दा?

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सोचता हूं कि इसे क्या नाम दूं। नेताओं के नाम एक खुला पत्र या रिपोर्ट। बहरहाल आप ही तय करें कि इसे क्या कहेंगे। उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान शुरू हो गया है और नेता जाति, धर्म एवं संप्रदाय का झुनझुना बजाने लगे हैं। तो क्या अब उत्तर प्रदेश में कोई चुनावी मुद्दा नहीं रह गया है। पूरे पांच साल तक सबका साथ सबका विकास और डबल इंजन सरकार की राग अलापने वाले अब 80:20 की बात करने लगे हैं। बात यहीं तक नहीं है कमंडल का भी सहारा लेने लगे हैं। क्या 21वीं सदी में भी उत्तर प्रदेश में जातिवाद और धर्म के नाम पर चुनाव लड़े जाएंगे। कब तक उत्तर प्रदेश के माथे पर यह कलंक लगा रहेगा। देश के अन्य राज्यों के लोग मजाक उड़ाते हैं उत्तर प्रदेश की इस बदहाली का।

गुजरात में भाजपा साड़ियां बनवा रही है जिनके पल्ले पर किसी में सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो किसी में मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की तस्वीर लगी है। यानी महिलाओं की साड़ी मोदी योगी का प्रचार करेगी। साड़ी का एक और पहलू भी है। राष्ट्रीय महिला आयोग को पिछले साल महिलाओं के खिलाफ अपराध की 31 हजार शिकायतें मिली हैं। उनमें से आधे से अधिक उत्तर प्रदेश की हैं। यह 2014 के बाद से सर्वाधिक है। मोदी-योगी की तस्वीर वाली साड़ी पहन कर अगर महिलाएं यह सवाल करें कि हमारे खिलाफ जुल्म के मामले में हमारा प्रदेश ही आगे क्यों है। तो क्या जवाब देंगे। क्या महिलाओं की सुरक्षा का सवाल चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता है। पर योगीजी तो 80:20 की बात करते हैं।

जब महिलाओं की सुरक्षा की बात उठेगी तो फिर बात उन्नाव और हाथरस तक जाएगी। उन्नाव में भाजपा के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने एक नाबालिगा से बलात्कार किया था। उन्हें मिली उम्र कैद की सजा यह साबित करती है कि वह अपराधी हैं। उन्हीं के इशारे पर नाबालिग के पिता की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। उसके दो रिश्तेदारों को ट्रक से कुचल कर मार डाला गया। और सरकार जब तक गले तक पानी नहीं आया तब तक बेशर्मी से कुलदीप सिंह सेंगर का बचाव करती रही। हाथरस में एक नाबालिगा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने उसकी लाश उसके घर के सामने ही जला दी। इस दौरान उसके परिवार के लोग उसके करीब भी नहीं जा पाए थे। हिंदू धर्म के पंडित यह भूल गए कि हिंदू धर्म में मुखाग्नि नाम की एक प्रथा भी है। घटना को छुपाने के लिए उसके घर के आस-पास 144 धारा लगा दी गई थी। वहां जाने वाले पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया। शाहजहांपुर के स्वामी चिन्मयानंद का नाम भी बलात्कारियों की सूची में रहा है। इसके अलावा दलित लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या के बेशुमार आरोप हैं। क्या नाबालिगों और महिलाओं को बलात्कारियों से बचाने का सवाल चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता है।

उन्नाव सदर से चुनाव लड़ रही आशा सिंह महिलाओं की सुरक्षा के सवाल का क्या एक प्रतीक नहीं बन सकती हैं। इन्हीं की बेटी के साथ कुलदीप सिंह सेंगर ने बलात्कार किया था। क्या सभी राजनीतिक दल आशा सिंह का समर्थन करते हुए महिलाओं की इज्जत को चुनावी मुद्दा नहीं बना सकते हैं। बसपा ने वहां से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी है। मायावती भी तो एक महिला हैं। क्या वहां से अपने उम्मीदवार का नाम वापस लेकर महिलाओं की इस लड़ाई का अलंबरदार नहीं बन सकती हैं। अगर भाजपा की बी टीम के रूप में काम नहीं कर रही हैं तो निश्चित रूप से इस लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं। यहां मोदी जी की एक टिप्पणी का उल्लेख करना बड़ा मौजू साबित होगा। मोदी जी कहते हैं, मातृशक्ति ही हमारी असली ताकत है, महिलाओं के समर्थन के कारण ही सरकार महत्वपूर्ण फैसले ले पाई है। मोदी जी की इस टिप्पणी के जवाब में आइए ना सब मिलकर मातृशक्ति को ही एक चुनावी मुद्दा बना दें।

क्या बेरोजगारी चुनावी मुद्दा नहीं बन सकती है। कोरोना के पहले चरण में क्या यह तस्वीर उभर कर नहीं आई थी कि उत्तर प्रदेश के लाखों लोग दूसरे विकसित राज्यों में जाकर नौकरी करते हैं। अगर प्रदेश में नौकरी उपलब्ध होती तो परदेश में नौकरी करने क्यों जाते। क्या यह सवाल चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता है कि पुलिस, स्कूल-कॉलेज, सचिवालय, स्वास्थ्य विभाग और अस्पतालों में लाखों पद खाली पड़े हैं, और उन पर नियुक्तियां क्यों नहीं की जा रही हैं। योगी सरकार यह आंकड़ा क्यों नहीं पेश कर पा रही है कि पिछले पांच साल में कितने लोगों को रोजगार दिया गया। जब सत्ता में आए थे तब और आज बेरोजगारों का आंकड़ा कितना है। क्या कोरोना के दूसरे चरण के दौरान सरकार की नाकामी चुनावी मुद्दा नहीं बन सकती है।

दवा देने की बात तो दरकिनार रही सरकार मृतकों को जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं दे पाई थी। श्मशान घाट पर मृतकों को जलाने के लिए रिश्वत भी देनी पड़ेगी यह लोगों ने पहली बार इस सरकार के जमाने में ही जाना था। क्या यह सच नहीं है कि लोगों ने नदी के किनारे बालू हटाकर शवों को दफनाया था। क्या यह सच नहीं है कि लोगों ने अपने परिजनों के शव को पुल पर से नदी में फेंक दिया था। जब गंगा में बहते हुए शव बंगाल तक आए थे तो यहां की सरकार ने उन्हें जलाने का काम किया था। क्या यह सवाल चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता है।

मोदी जी, ने वाराणसी में भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि लोगों के पास जाएं और जाकर उन्हें वोट की ताकत को समझाएं। जब किसान एक साल तक गाजियाबाद में धरना देते रहे तो उस समय क्या मोदी जी को वोट की ताकत का एहसास नहीं हो पाया था। इस दौरान जब सात सौ किसानों की मौत हो गई क्या तब भी मोदी जी को वोट की ताकत का एहसास नहीं हो पाया था। क्या लखीमपुर खीरी में जब किसानों को कार के तले कुचल दिया गया तब भी मोदी जी को वोट की ताकत का एहसास नहीं हो पाया था। अगर होता तो मिश्राजी आज मंत्रिमंडल में नहीं होते।

सच तो यह है कि सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। जवाब देने का मतलब खुद को कटघरे में खड़ा करना है। इसीलिए 80:20 की बात करने लगे हैं। भाजपा के नेता आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी उन लोगों के साथ तालमेल कर रही है जो हिंदुओं को निशाना बनाती है। ये हिंदुओं के खिलाफ नफरत का माहौल बना रहे हैं। तो क्या योगी जी उत्तर प्रदेश के सिर्फ 80 फ़ीसदी लोगों के ही मुख्यमंत्री हैं। सच तो यही है कि ये नेता उत्तर प्रदेश को जाति धर्म और संप्रदाय के बंधन से मुक्त नहीं करेंगे। लिहाजा उत्तर प्रदेश के लोगों को ही कहना पड़ेगा कि अब हम मुद्दों पर मतदान करेंगे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह का लेख।)

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