उत्तर प्रदेश सरकार ने जाति आधारित राजनीतिक रैलियों पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि यह “कानून व्यवस्था” और “राष्ट्रीय एकता” के लिए खतरा हैं।
इंडियन एक्स्प्रेस में छपी एक खबर के अनुसार कार्यवाहक मुख्य सचिव दीपक कुमार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 16 सितंबर के आदेश का हवाला देते हुए आदेश जारी किया है जिसके अनुसार राजनीतिक उद्देश्य से आयोजित जाति आधारित रैलियाँ समाज में टकराव का कारण बनती हैं और यह कानून व्यवस्था व राष्ट्रीय एकता के खिलाफ हैं और प्रदेश भर में प्रतिबंधित हैं।
जाति आधारित राजनीतिक रैलियों पर प्रतिबंध का राज्य की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ सकता है। प्रदेश में विधानसभा चुनाव दो वर्ष बाद होने वाले हैं लेकिन तमाम राजनीतिक दल, जिनमें सत्तारूढ़ भाजपा, उसके सहयोगी दल जैसे निषाद पार्टी, सुहैलदेव भारतीय समाज पार्टी और अपना दल ही नहीं विपक्षी पार्टियां भी चुनाव के समय लोगों तक पहुँचने के लिए जाति आधारित सभाओं/बैठकों/रैलियों पर निर्भर रहते हैं।
कार्यवाहक मुख्य सचिव के आदेश के अनुसार समाज में “जाति आधारित भेदभाव” समाप्त करने के उद्देश्य से पुलिस रिकार्ड में जाति आधारित उल्लेख और सार्वजनिक रूप से जाति आधारित उल्लेख को भी प्रतिबंधित किया जाता है। वाहनों पर जातिसूचक उल्लेख, नारों और स्टिकर लगाने पर अब चालान कटेगा।
आदेश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया गया है जिसमें गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक को आदेश दिया था कि सभी पुलिस दस्तावेज़ों में जाति के उल्लेख को प्रतिबंधित करने (अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज मामलों को छोड़कर) के लिए पुलिस मैनुअल\नियमों में संशोधन कर स्टैन्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर बनाएं व लागू करने।
कार्यवाहक मुख्य सचिव के आदेश के अनुसार पुलिस रिकार्ड जैसे पंचनामा, गिरफ़्तारी मेमो, तलाशी मेमो और पुलिस थानों में लगे नोटिस बोर्ड पर आरोपी/संदिग्ध की जाति की सूचना नहीं होगी। अधिकारी नैशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्युरो से भी सीसीटीएन पोर्टल पर आरोपी की जाति बताने वाला कॉलम हटाने के लिए पत्राचार करेंगे और इसीके साथ आरोपी के पिता के नाम के साथ मां का नाम भी दिया जाएगा। जब तक यह व्यवस्था होती है पोर्टल से जाति संबंधी जानकारी पूरी तरह से हटाई जाएगी।
इसके अलावा जाति का महिमामंडन करते, भौगोलिक क्षेत्रों को जाति विशेष क्षेत्र घोषित करने वाले सिगनबोरे हटाने होंगे और सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे बोर्ड भविष्य में फिर न लगें।
किसी जाति के महिममंडन अथवा अपमान करने वाले सोशल मीडिया संदेशों की निगरानी की जाएगी और सोशल मीडिया के जरिए जातिगत नफरत फैलाने या भावनाएं भड़काने के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
अदालत ने अपने आदेश में राज्य सरकार से सेंट्रल मोटर वेहीकल में संशोधन कर सभी निजी व सार्वजनिक वाहनों पर जाति-आधारित नारे प्रतिबंधित करने, सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया एथिक्स संहिता) नियम, 2021 में सोशल मीडिया में जाति महिममंडन, नफरती सामग्री के खिलाफ प्रावधानों को मजबूत करने को भी कहा था।