वाजपेयी काल के विनिवेश का घड़ा फूटा, शौरी समेत 5 लोगों पर केस दर्ज़

अरुण शौरी और होटल।

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में अलग बने विनिवेश (डिसइन्वेस्टमेंट) मंत्रालय ने कई बड़ी सरकारी कंपनियों को बेचने की मंजूरी दी थी। मंत्रालय के मुखिया के तौर पर अरुण शौरी को तब आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ा था। इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे। राजस्थान में जोधपुर की विशेष सीबीआई अदालत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी समेत पांच लोगों के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया है।

अदालत ने यह आदेश लक्ष्मी विलास होटल को बाजार मूल्य से बहुत कम दाम में बेचने के मामले में दिया है। कोर्ट ने कहा कि जिस होटल की कीमत ढाई सौ करोड़ रुपये से भी ज्यादा थी, उसे सिर्फ सात करोड़ रुपये के औने-पौने दाम लेकर बेच दिया गया। राजस्थान की सीबीआई कोर्ट ने उदयपुर के होटल लक्ष्मी विलास के इन्वेस्टमेंट में एनडीए की पहली सरकार को दोषी करार देते हुए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विनिवेश मंत्री रहे अरुण शौरी को गिरफ्तारी वारंट तलब किया है।

उदयपुर के सबसे शानदार होटल लक्ष्मी विलास पैलेस को 2004 में वाजपेयी सरकार के विनिवेश मंत्रालय ने केवल 7.5 करोड़ कि डिसइन्वेस्टमेंट करते हुए ललित ग्रुप को बेच दिया था। इसे लेकर उदयपुर में काफी हंगामा मचा था, क्योंकि इतने बड़े होटल की इतनी कम कीमत लगाने पर हर कोई आश्चर्य में था।

पूरे मामले की जांच यूपीए सरकार ने नहीं कराई और उसके बाद आश्चर्यजनक रूप से एक सूचना के आधार पर 13 अगस्त, 2014 को एफआईआर दर्ज की गई थी।सीबीआई ने जांच के बाद इसमें कुछ मिलता हुआ नहीं बताकर क्लोजर रिपोर्ट लगा दिया, मगर कोर्ट ने इसे मानने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि सीबीआई ने अपनी जांच में पाया है कि जमीन की कीमत 151 करोड़ बनती है तो फिर जांच में क्लोजर रिपोर्ट कैसे लग सकती है।

सीबीआई जोधपुर कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले को फिर से जांचने के आदेश दिए, मगर सीबीआई ने एक बार फिर से क्लोजर रिपोर्ट लगा दिया। इस बात पर नाराज सीबीआई कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगाते हुए उसकी भूमिका पर सवाल उठा दिया और कहा कि जिन तथ्यों को आपने लिखा है उस पर जांच का रिपोर्ट दीजिए। आखिरी बार 13 अगस्त, 2019 को सीबीआई कोर्ट ने सीबीआई से फिर से जांच के आदेश दिए थे। इस पर सीबीआई ने तीसरी बार जांच किया और इस बार मंत्री और अफसरों के पद का दुरुपयोग का मामला बताते हुए कहा कि जमीन की डीएलसी 500 से लेकर 1000 रुपये के मध्य थी। इसके बावजूद इसे कम दाम पर बेचा गया और करीब 244 करोड़ रुपए का नुकसान सरकार को हुआ है।

सीबीआई की आखिरी रिपोर्ट पर कोर्ट ने तत्कालीन विनिवेश मंत्री अरुण शौरी, तत्कालीन विनिवेश सचिव प्रदीप बैजल, मेसर्स लजार्ड इंडिया लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर आशीष गुहा, भारत होटल की निदेशक ज्योत्सना सूरी के खिलाफ धारा 120 बी, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 डी के तहत अपराध पाया है और सभी आरोपियों को गिरफ्तारी वारंट से तलब किया है।

गौरतलब है कि एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने विनिवेश कार्यक्रम को जोरशोर से आगे बढ़ाया था, लेकिन इस पर घपलों और घोटालों के तमाम आरोप लगे। विनिवेश के समर्थक यह तर्क देते हैं कि सरकार का काम कारोबार करना नहीं, देश चलाना है, इसलिए सरकार को सार्वजनिक कंपनियों से विनिवेश करके अलग हट जाना चाहिए।

विनिवेश असल में किसी कंपनी में निवेश की उलटी प्रकिया होती है। जब किसी कारोबार या इंडस्ट्री में सरकार या कोई कंपनी पैसा लगाती है तो उसे निवेश कहते हैं।लेकिन जब किसी कारोबार से सरकार या कंपनी अपना हिस्सा बेचकर पैसा निकालती है तो उसे विनिवेश कहते हैं। विनिवेश प्रक्रिया के जरिए सरकार अपने शेयर किसी और को बेचकर संबंधित कंपनी से बाहर निकल जाती है और इस तरह से हासिल रकम का इस्तेमाल दूसरी योजनाओं में किया जाता है। अब हर साल सरकार विनिवेश के बड़े लक्ष्य रखती है। जैसे इस साल ही सरकार ने विनिवेश से 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाने का लक्ष्य रखा है। विनिवेश या तो किसी निजी कंपनी के हाथ किया जा सकता है या फिर उनके शेयर पब्लिक में जारी किए जा सकते हैं।

सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश की प्रक्रिया तो मनमोहन सिंह के नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहने के दौरान ही शुरू हो गई थी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे जबरदस्त रफ्तार दी। वाजपेयी ने 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक नया मंत्रालय ही बना दिया जिसके मंत्री अरुण शौरी बनाए गए थे।इस मंत्रालय का काम निजीकरण के प्रस्तावों को फटाफट मंजूरी देना था। इसलिए इसके साथ ही विनिवेश के लिए एक कैबिनेट कमेटी का भी गठन किया गया ताकि इन प्रस्तावों को जल्द मंजूरी दी जा सके।

शौरी के मंत्रालय ने वाजपेयी के नेतृत्व में भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान जिंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कॉर्पोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की थी।अटल सरकार ने मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज को हिंदुस्तान यूनिलीवर को बेचने का फैसला लिया। आईटी फर्म सीएमसी लिमिटेड को बेच दिया गया। कई सरकारी होटल बेच दिये गये। 14 मई, 2002 को मारुति उद्योग लि. के विनिवेश को भी मंजूरी दे दी गई। दो चरणों में विनिवेश के बाद 2006 में भारत सरकार का मारुति उद्योग में स्वामित्व पूरी तरह खत्म हो गया। तब बीपीसीएल और एचपीसीएल के विनिवेश की भी बात चली लेकिन तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री के भारी विरोध के बाद ये दोनों कंपनियां सरकार के पास ही रह गईं।

भारत में विनिवेश प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। असल में इसमें घोटालों की काफी गुंजाइश रहती है। वाजपेयी सरकार के दौरान किये गये कई विनिवेश में भी घपलों और घोटालों के जबरदस्त आरोप लगे, जिनकी अभी तक जांच चल रही है।वाजपेयी सरकार को इसके लिए तीखे विरोध का भी सामना करना पड़ा। बाल्को के निजीकरण के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने वाजपेयी जी के फैसले को बरकरार रखा।

कई फाइव स्टार होटल कौड़ियों के भाव बेचने को लेकर सबसे ज्यादा विवाद रहा। वाजपेयी सरकार ने घाटे में चल रहे कई सरकारी होटल को निजी क्षेत्र को दे दिया। इनमें नई दिल्ली में स्थित रंजीत होटल, कुतुब होटल और होटल कनिष्क, कोवलम अशोक बीच रिजॉर्ट, कोलकाता का होटल एयरपोर्ट अशोक तथा उदयपुर का लक्ष्मी विलास होटल शामिल था। नई दिल्ली का रंजीत होटल बहुत कम दाम में अनिल अंबानी समूह को बेच दिया गया। मुंबई के हवाई अड्‌डे के पास स्थित सेंटूर होटल को साल 2002 में वाजपेयी सरकार ने बेच दिया। इस होटल को 115 करोड़ रुपए में बत्रा हॉस्पिटैलिटी ने खरीदा था। उसने चार महीने के भीतर ही इसे सहारा समूह को 147 करोड़ रुपए में बेच दिया। यानी इतने कम समय में उसने 32 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा लिया।

यह मोदी सरकार के लिए खतरे की घंटी है। जिस तरह से मोदी सरकार एक के बाद एक सरकारी संपत्ति बेचने की घोषणा करती जा रही है एक न एक दिन इनकी भी पूरी पोलपट्टी खुलेगी जैसे 2001 में किया गया घोटाला आज खुला है कुछ सालों बाद इनके पाप भी फूटेंगे और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से लेकर रेल मंत्री पीयूष गोयल तक इसकी आंच पहुंचेगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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