अब समाचार पत्रों और मीडिया के ‘तथ्यों’ की जांच करेंगे योगी सरकार के मंडलायुक्त और जिलाधिकारी

नई दिल्ली। बीजेपी की केंद्र और राज्य सरकारें मीडिया को अपनी गोद में बैठाने के बाद भी संतुष्ट नहीं दिख रही हैं। उस पर शिकंजा कैसे और मजबूत किया जाए आए दिन उसी की जुगत में लगी रहती हैं। केंद्र सरकार ने तो बाकायदा ‘फैक्ट चेकिंग’ के नाम पर मीडिया प्लेटफार्म की खबरों को चेक करने का रास्ता तलाश लिया है। जिसका एक मात्र मकसद अपने विरोध में चलने वाली खबरों को कैसे रोका जाए। यह बात अलग है कि मामला अभी बांबे हाईकोर्ट में है और उसने सुनवाई के दौरान सरकार की इस पहल पर कई तीखी टिप्पणियां की हैं।

केंद्र तो केंद्र बीजेपी की राज्य सरकारें भी इस काम में पीछे नहीं रहना चाहती हैं। यूपी की योगी सरकार ने इस दिशा में वह कदम बढ़ाया है जिसकी अभी तक कोई सरकार हिम्मत नहीं कर सकी थी। 16 अगस्त को यूपी के मुख्य सचिव संजय प्रसाद की ओर से सूबे के मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को एक सर्कुलर जारी किया गया है। जिसमें कहा गया है कि “दैनिक समाचार पत्रों द्वारा मीडिया माध्यमों में प्रकाशित नकारात्मक समाचारों का संग्रहण सूचना विभाग द्वारा किया जाता है। इन नकारात्मक समाचारों के तथ्यों की त्वरित जांच करना आवश्यक है, क्योंकि इन समाचारों से शासन की छवि भी धूमिल होती है”।

कोई सरकार एकबारगी किसी खबर की तथ्यात्मक जांच-परख कर ही सकती है। लेकिन उसके लिए भी एक प्रक्रिया है। यहां तो सीधे-सीधे यह अधिकार मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों को दे दिया गया है। आम तौर पर मीडिया का काम सरकार के कामकाज की समीक्षा और जनता की तरफ से उस पर सवाल खड़े करना है। ऐसे में सरकार के प्रति उसका नकारात्मक रुख का होना उसके अस्तित्व की बुनियादी शर्तों में शामिल है। अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो सरकार के पीआईबी और स्वतंत्र मीडिया में भला क्या अंतर रह जाएगा? लेकिन योगी सरकार ने शायद मीडिया को अब अपने ‘लैप डॉग’ में बदलने का संकल्प ले लिया है। इसके बावजूद अगर कुछ लोग अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखना चाहते हैं तो उसके लिए अब प्रशासन का डंडा तैयार किया जा रहा है।

सर्कुलर में आगे कहा गया है कि अगर किसी लेख पर किसी तरह का कोई संदेह होता है तो  “ऐसे Article को IGRS में दर्ज कराया जाएगा और संबंधित मंडलायुक्तों, जिलाधिकारियों, विभागाध्यक्षों को प्रेषित कर कार्यवाही की अपेक्षा की जाएगी। अंतरिम रिपोर्ट को मान्य नहीं माना जाएगा।”

इसमें आगे कहा गया है कि “इस प्रकार के प्रकरणों में जिलाधिकारी द्वारा संबंधित विभाग को पत्र प्रेषित किए जाने के उपरांत जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा उक्त पत्र की स्कैंड कॉपी जनसुनवाई समाधान IGRS पोर्टल पर भी अपलोड की जाएगी, जिस हेतु IGRS पोर्टल पर व्यवस्था की जा रही है।”

और फिर इसके साथ ही आगे संबंधित समाचार पत्र और उसके प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही संबंधी दिशा निर्देशों का इस सर्कुलर में उल्लेख किया गया है।

जिसमें कहा गया है कि “यदि यह संज्ञान में आता है कि किसी दैनिक समाचार पत्र/मीडिया में घटना को तोड़-मरोड़ कर अथवा गलत तथ्यों का उल्लेख कर नकारात्मक समाचार प्रकाशित कर राज्य सरकार एवं जिला प्रशासन की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया है तो संबंधित जिलाधिकारी द्वारा इस संबंध में संबंधित मीडिया ग्रुप/समाचार पत्र के प्रबंधक को स्थिति स्पष्ट किए जाने हेतु पत्र प्रेषित किया जाएगा तथा सूचना विभाग को भी पृष्ठांकित किया जाएगा।“

अब इसके बाद क्या कोई पत्रकार सूबे की सरकार और जिला प्रशासन के खिलाफ लिखने की हिम्मत कर पाएगा? अब अगर कोई पूछे कि जो पार्टी दिन भर झूठ और फरेब की खेती करती है। उसके आईटी सेल झूठ की फैक्ट्री बने हुए हैं और उसके द्वारा जारी पोस्ट ह्वाट्सएप से लेकर सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्मों में रोजाना परनाले की तरह बहते हैं। उनको पैदा करने वाली पार्टी की सरकार और उसका प्रशासन तथ्यों की जांच करेगा।

दिन रात झूठ को अफवाह बनाकर प्रचारित करने वाली पार्टी और उसकी सरकार तथ्यों और उसकी जांच की बात कर रही है। ऐसे में समझा जा सकता है कि सरकार की मंशा क्या है। दरअसल अभी भी जो कुछ मीडिया संस्थान सरकार के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत कर पा रहे हैं उन्हें कैसे आखिरी तौर पर चुप करा दिया जाए यह सारा कुछ उसी का हिस्सा है।

इस सिलसिले में जब इंडियन एक्सप्रेस ने संजय प्रसाद से प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की तो उन्होंने उसका कोई जवाब नहीं दिया। शासन के एक दूसरे वरिष्ठ अफसर ने ज़रूर कहा कि फैक्ट ‘चेकिंग इसका उद्देश्य था’। तर्क यह है कि ढेर सारे न्यूज आइटम प्रकाशित होते हैं और सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ता है। क्योंकि इस तरह के समाचारों को लोग पढ़ते हैं और फिर उसे दूसरों द्वारा फैलाया जाता है…अब इस तरह की खबरों की जांच होगी। यह केवल फैक्ट चेकिंग है।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

Leave a Reply