कॉकरोच जनता पार्टी को इसका श्रेय है कि उसने भारत की ढहती शिक्षा एवं परीक्षा व्यवस्था को अहम मुद्दा बना दिया। शिक्षा की बिगड़ती हालत पर अब गांव-कस्बों तक में चर्चा होने के संकेत मिल रहे हैं। असल में अक्सर वो समस्या ही मुद्दा बनती है, जो लोगों के मन को पहले से परेशान किए होती है। जब उसको लेकर कोई विश्वसनीय पहल होती है, तो लोग उसकी तरफ आकर्षित हो जाते हैं।
वैसे अभिजीत दीपके ने जो पहल की, वह सिर्फ शिक्षा को लेकर नहीं थी। बल्कि प्राथमिक तौर पर वह भारतीय समाज में बढ़ती जा रही घुटन को लेकर थी। यह घुटन यह विश्वास टूटने से बढ़ी है कि व्यवस्था में लोगों की कोई भूमिका या भागीदारी रह गई है। सरकार, संवैधानिक संस्थाओं, और लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था पर एक विशेष राजनीतिक परियोजना का कब्जा हो जाने की धारणा गहराती चली गई है। ऐसे में इस यकीन का आधार लगातार क्षीण होना लाजिमी ही है।
इसी बीच निरंतर गहराती जा रही अवसरहीनता की स्थिति में युवा वर्ग को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है, तो इसे आसानी से समझा जा सकता है। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत ने जब इस स्थिति के शिकार युवाओं को कॉकरोच कहकर उनके प्रति शासक समूहों की हेयदृष्टि का इज़हार किया, तो जाहिर है, उस पर बड़े पैमाने पर आक्रोश और बेचैनी महसूस की गई। उसी पृष्ठभूमि में जब दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी के रूप में सोशल मीडिया पहल की, तो वह वायरल हो गई।
फिर वो पहल अब एक व्यापक जमीनी आंदोलन में तब्दील हो गई।
ढहती गई परीक्षा व्यवस्था के लिए जवाबदेही का सवाल उठा कर यह आंदोलन ठोस रूप लेने में कामयाब हुआ है। जवाबदेही के प्रथम बिंदु के रूप में उसने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग रखी। चूंकि सत्ताधारी भाजपा अब तक इस सिद्धांत पर चलती आई है कि उसकी सरकार में ‘इस्तीफे नहीं होते’, तो यह आंदोलन उत्तरदायित्व के व्यापक प्रश्न से जुड़ गया। इस तर्क ने लोगों के मानस को छुआ कि जो सरकार उनके वोट से चुनी जाती है, वह अपनी बड़ी से बड़ी विफलता, अकुशलता, और यहां तक कि भ्रष्टाचार के मामलों में भी जवाबदेही लेने से इनकार कर रही है। दिल्ली में 20 जुलाई को कॉकरोचों ने ‘संसद मार्च’ का आयोजन किया, तो वह सत्ताधारियों की इसी सोच के खिलाफ जन लामबंदी का मौका बन गया।
केंद्र सरकार ने जुटे नौजवानों के प्रति दमन की नीति अपना कर अब तक उदासीन रहे बहुत से लोगों को भी यह सोचने को मजबूर किया है कि
- क्या “लोकतंत्र” में जवाबदेही की मांग करना गलत है?
- क्या दोषमुक्त परीक्षा व्यवस्था की मांग करना जुर्म है?
- लोगों के वोट से निर्वाचित नरेंद्र मोदी सरकार शिक्षा व्यवस्था की खामियों को दूर करने की मांग के खिलाफ क्यों है?
- अगर पुलिस लोगों की रक्षा के लिए है, तो उसने किशोर उम्र छात्र-छात्राओं पर जुल्म क्यों ढाए?
- छात्राओं के कपड़े फाड़ने, नौजवानों को लाठी से पीटने, उन्हें करंट लगाने, और यहां तक कि (एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक) उन पर छर्रे (पैलेट) दागने की बर्बरता का क्या औचित्य हो सकता है?
- आरोप यहां तक हैं कि पुलिस के संरक्षण में सादी पोशाक में आए सत्ताधारी जमात के समर्थक असामाजिक तत्वों ने छात्र-नौजवानों पर हमले किए। अगर ऐसा हुआ, तो इसे किस तर्क पर कानून-व्यवस्था लागू करने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माना जाएगा?
- क्या ऐसा होना लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों को तिलांजलि देने के रूप में नहीं देखा जाएगा?
इस सवालों से छात्र-नौजवान ही नहीं, बल्कि आम जनता का बहुत बड़ा हिस्सा बेचैन हुआ है। इस अहसास ने उनकी बेचैनी को और बढ़ाया है कि जिन सूत्रों के जरिए सत्ताधारियों की जिम्मेदारी तय करने का भरोसा उन्हें रहता था, वे आज हाथ से फिसलते हुए नजर आ रहे हैं। संस्थाओं पर ‘कैप्चर’ की आम धारणा इस अहसास का एक पहलू है। उससे भी बड़ा पहलू भटके सत्ताधारी को अपने वोट से दंडित कर सकने का टूट रहा भरोसा है। चुनावों में समान धरातल का ना रह जाना इस अनुभूति का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह परिघटना है कि सत्ताधारी दल को दंडित करने के लिए आप चाहे जिसे चुनो, निर्वाचन के बाद दल-बल करवा कर उसे सत्ताधारी खेमे से मिला लिया जाएगा। तो फिर लोग क्या करें?
यही आज सबसे बड़ा सवाल है। और यही सवाल कॉकरोच आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बना। कॉकरोचों के दमन ने इस प्रश्न के परिमाण को कई गुना और बढ़ा दिया। वैसे, इस तरह का दमन पहली बार हुआ हो- ऐसा नहीं है। इससे भी अधिक बर्बर दमन की कहानियां मौजूद रही हैं। लेकिन तब शिकार या तो समाज के वंचित और पिछड़े वर्ग थे, या फिर ऐसी घटनाएं देश की परिधि पर स्थित इलाकों में हुईं। आम तौर पर मनुष्य की चेतना या संवेदनशीलता हर मामले में समान अथवा यूनिवर्सल नहीं होती। अक्सर वह वर्ग एवं क्षेत्र सापेक्ष होती है।
अतः नोएडा या अन्य स्थलों पर 12-13 हजार रुपये की मासिक तनख्वाह पर रोज 12 घंटे काम करने पर मजबूर मजदूरों; मणिपुर, लद्दाख या कश्मीर में पीड़ित समुदायों, अथवा हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में अल्पसंख्यक (खासकर मुस्लिम) समुदाय के लोगों के प्रति पुलिस/सुरक्षा बलों के लगभग ऐसे ही व्यवहार से समाज के प्रभु वर्ग में यह सवाल नहीं उठा कि क्या यह ‘पुलिस हमारे (यानी नागरिकों) लिए’ है। लेकिन दिल्ली की घटनाओं के बाद इस प्रश्न ने उनके मन को झकझोर रखा है?
इस सवाल से भारत के इलीट (प्रभु) वर्ग में दरार और चौड़ी होती दिख रही है। दरअसल, कॉकरोच परिघटना मूल रूप से भारतीय इलीट में आरंभिक दरार का परिणाम रही है। प्रभु वर्ग (उच्च मध्यम एवं मध्य वर्ग) का एक हिस्सा अब इसको लेकर जागरूक हुआ है कि जब वे लोग हिंदू धर्म का “पुराना गौरव” वापस लाने और भारत को विश्व गुरु बनाने की तमाम कहानियों में खोये हुए थे, तब असल में सबकी खुशहाली एवं देश की उन्नति की जमीन परत-दर-परत दरकाई जा रही थी। पहले जिस भ्रष्टाचार और अकुशलता का साया रहता था, इस नए दौर में उसका साम्राज्य कई गुना और फैल गया। इन सबका सघन रूप आज शिक्षा से लेकर परीक्षा और अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक में देखने को मिल रहा है। चूंकि प्रभु वर्ग का यह तबका अब जागा है, तो शासक वर्ग जिस हद तक निरंकुश हो चुका है, उसकी मार से ये समूह भी बच नहीं सके हैं।
बहरहाल, इसलिए आंदोलन के सामने अब कठिन चुनौतियां हैं। फिलहाल, उसके सामने दो संभावनाएं हैं। पहली सूरत नरेंद्र मोदी के राज में असंतोष और असहमति के आंदोलनों के हुए हश्र की है। 2021 में किसान आंदोलन को मिली सीमित सफलता को छोड़ दें, तो इस राज में हर आंदोलन गतिरोध की स्थिति में पहुंच कर ठहराव का शिकार हुआ है। किसान भी सिर्फ अपने खिलाफ बने तीन कानूनों को वापस कराने में सफल हुए- वे स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने, कर्ज माफी, और विद्युत विधेयक को वापस कराने जैसी अपनी सकारात्मक मांगों को नहीं मनवा पाए।
बाकी आंदोलनों से उठी मांगें गतिरोध की अवस्था में बनी हुई हैं। इनमें नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुआ व्यापक आंदोलन, अग्निवीर योजना के खिलाफ भड़का आक्रोश, केन-बेतवा जैसी कथित विकास परियोजनाओं के खिलाफ विस्थापितों के संघर्ष आदि जैसी अनेक मिसालों का जिक्र किया जा सकता है। दरअसल, गतिरोध के स्थल देश भर में फैले हुए हैं। मणिपुर, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, वक्फ़ कानून, उपासना स्थल अधिनियम के उल्लंघन, बुल्डोजर ‘जस्टिस’, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, हिंदी थोपने की शिकायतें, परिसीमन से संबंधित विवाद, सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग, राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण…. दरअसल ये सूची इतनी लंबी है कि सबकी चर्चा हो, तो उसे किसी एक आलेख में समेटना असंभव होगा।
यहां इन मिसालों का जिक्र सिर्फ इसलिए किया गया कि क्या कॉकरोच आंदोलन भी इसी तरह के गतिरोध के साथ ठहराव का शिकार हो जाएगा, अथवा वह कोई नई दिशा दिखा सकेगा?
इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए राजनीतिक अर्थव्यवस्था (political economy) के उस संदर्भ पर गौर करना अनिवार्य हो जाता है, जिसमें लोकतांत्रिक आकांक्षाओं वाले आंदोलन होते हैं। यह दुनिया भर का अनुभव है कि नव-उदारवादी नीतियों को अपनाए जाने के बाद संबंधित देशों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के स्वरूप में क्रमशः, लेकिन मूलभूत परिवर्तन आए हैं। उसके पहले जब इन देशों में कल्याणकारी राज्य (welfare state) की अवधारणा थी, तब उन आंदोलनों के प्रति सरकारों का नजरिया अपेक्षाकृत उदार एवं संवेदनशील होता था, जो सीधे व्यवस्था के वर्गीय आधार या देश की अखंडता को चुनौती नहीं देते थे। लेकिन नव-उदारवादी दौर में, जैसे-जैसे राज्य पर एकाधिकारी (monopoly) पूंजी का शिकंजा कसता गया है, संवैधानिक दायरे के लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति भी नजरिया दमनकारी हो गया है।
भारतीय राज्य के चरित्र में ऐसे परिवर्तन की शुरुआत वैसे तो साढ़े तीन दशक पहले हो गई थी, लेकिन 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इसमें गुणात्मक एवं मात्रात्मक दोनों प्रकार के बदलाव देखने को मिले। एक समझ यह है कि मोदी काल में भाजपा की असल ताकत मोनोपॉली पूंजी है, जिसने अपने धनबल, प्रचार तंत्र और संस्थाओं पर नियंत्रण की क्षमता के जरिए मोदी सरकार को संवैधानिक लोकतंत्र को सिकोड़ देने में सक्षम बना रखा है। इस भूमिका के साथ मोदी सरकार उसका कुशल उपकरण साबित हुई है।
अगर इस दौर के आंदोलन यह बुनियादी समझ विकसित नहीं करते और उसके अनुरूप रणनीति नहीं अपनाते, तो उनके टिकाऊ सकारात्मक योगदान की संभावना सीमित ही रहेगी। जहां तक कॉकरोच आंदोलन की बात है, तो जाहिरा तौर पर इसका रूप काफी कुछ हाल के वर्षों में पास-पड़ोस के देशों में दिखी जेन-ज़ी परिघटना से मिलता-जुलता है। इसीलिए यह अध्ययन उपयोगी रहेगा कि बांग्लादेश या नेपाल में इस परिघटना के तहत हुई उतनी बड़ी उथल-पुथल से अंततः ठोस क्या हासिल हुआ?
धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री पद से हटना पड़ा है। अब प्रश्न है कि कॉकरोच आंदोलन का अगला एजेंडा क्या होगा? क्या शिक्षा व्यवस्था में सुधार या सिकुड़ गईं लोकतांत्रिक आजादियों को बहाल कराने का कोई ठोस एजेंडा और उसके लिए कार्ययोजना आंदोलन दे पाएगा? यहां यह स्पष्ट कर लिया जाए कि इन सवालों को उठाने का मतलब इस आंदोलन की अहमियत को कम करके आंकना नहीं है। इस स्तंभकार ने कॉकरोच परिघटना को उस रोज से एक सकारात्मक घटनाक्रम के रूप में देखा है, जिस रोज इसने सोशल मीडिया पर ध्यान खींचा था। लेकिन अब बात जमीन पर आ चुकी है, तो आंदोलन की प्रशंसा के लिए जमीनी सवालों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
इस आंदोलन का अब तक स्वतःस्फूर्त (spontaneous) स्वरूप रहा है। आंदोलनकारी महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीरों तथा भारतीय संविधान की कॉपी हाथ में रखकर इसका संकेत देते रहे हैं कि वे किस दायरे में इसे चलाना चाहते हैं। आरंभिक हफ्तों में, जब उनके सामने नौजवानों को लामबंद करने की चुनौती थी, तो उन्होंने वामपंथी छात्र संगठनों और उनके नारों को अपने मंच पर जगह दी। लेकिन जैसे ही आंदोलन बड़ा हुआ, उन्होंने ‘हम क्या चाहते- आजादी’ जैसे नारों को प्रतिबंधित कर दिया। इससे आंदोलन नेतृत्व का रुझान एवं प्राथमिकताएं और स्पष्ट हो गई हैं।
वैसे रुझान और प्राथमिकताएं चाहे जो हों, आगे चल कर आंदोलन के सामने संगठन के ढांचे, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और उनके प्रशिक्षण, उनके जरिए समाज के विभिन्न वर्गों से संबंध या गठबंधन बनाने, और एक व्यापक एजेंडे पर आम सहमति तैयार करने का मुद्दा उनके सामने आएगा। अगर इस बात की समझ और इस चुनौती को स्वीकार करने का जज्बा नेतृत्व ने नहीं दिखाया, तो उसका परिणाम होगा गतिरोध की अवस्था में आंदोलन का ठहर जाना।
यह बात इसलिए इतने भरोसे के साथ कही जा रही है, क्योंकि कुछ हाथों में पूंजी के अति-संकेंद्रण, उसे संभव बनाने के लिए समाज में सांप्रदायिक वैमनस्य को हवा, और ज्ञान-विज्ञान विरोधी मानसिकता के प्रसार के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाली वैसी शिक्षा व्यवस्था अमल में नहीं रह सकती, जो रोजगार, खुशहाली एवं उदात्त संस्कृति का जनक बने।
इन बातों का सार यह है कि किसी एक मुद्दे पर सीमित रह कर बेहतर नतीजे हासिल कर लेना फिलहाल संभव नहीं रह गया है। इसीलिए ऐसी दीर्घकालिक राजनीति की जरूरत उत्तरोत्तर अधिक स्पष्ट होती जा रही है, जो पांच साल के चुनावी चक्र से प्रेरित ना हो। वैसी राजनीति, जो वोट के अधिकार एवं वोटिंग मशीनों से आगे जाकर सोचने में समर्थ हो- जिसके एजेंडे पर परिवर्तन, रचना एवं निर्माण का बड़ा लक्ष्य हो।
खैर, अभी भारत में विमर्श का जो स्तर है, उसके बीच पेपर लीक जैसी घटनाओं से अपने भविष्य को लेकर चिंतित युवा वर्ग से राजनीति की नई और व्यापक समझ दिखाने की अपेक्षा यथार्थवादी नजरिया नहीं होगा। जिनसे ऐसी अपेक्षा हो सकती थी, उनकी नाकामियों का बोझ इन युवाओं के कंधों पर डालना उचित भी नहीं होगा। फिलहाल, तो यही कहा जा सकता है कि इन युवाओं ने अपनी ताजा सक्रियता एवं गतिविधियों से समाज में गहराती गई निराशा को एक हद तक तोड़ा है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि नई पीढ़ी नफरत एवं झूठे दिलासों पर टिकी सियासत के प्रभाव से निकल रही है। ये आस जगाई है कि ठोस हालात ने बात यहां तक पहुंचाई है, तो आगे वह वहां तक भी जा सकती है, जहां से समाधान का असल रास्ता शुरू होता है!
(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।)