Saturday, October 1, 2022

बहुजन ढो रहे हैं हिंदुत्व की कांवड़

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प्रयागराज। बड़े-बड़े बैनरों से सजा डीजे, मालवाहक वैन और ट्रैक्टरों पर निकलने वाली कांवड़ यात्रा सावन के पहले पाख के साथ ही खत्म हो गई। इसके साथ ही उत्पात, अव्यवस्था और सड़कों पर भगवा वर्चस्व का एक चैप्टर भी पूरा हो गया। इस दौरान उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों के डीएम, एसडीएम, एसपी, डीएसपी, दरोगा हाथों में फूल लिये कहीं सड़क से तो कहीं हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा करने की ड्यूटी पूरी कर्मठता से निभाते दिखे। खुद राज्य के मुख्यमंत्री तमाम ज़रूरी जनकार्यों को छोड़ पुष्पवर्षा में जुटे रहे।

प्रयागराज के सिविल लाइंस से झूंसी तक ऑटो चलाने वाले एक अधेड़ ड्राइवर ने बताया कि हर 2 किलोमीटर पर कांवड़ियों के लिये खाना पानी नाश्ता आराम की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। मैंने उससे पूछा कि क्या यह सरकार ने किया है तो उसने कहा कि नहीं यह सब अपने-अपने क्षेत्र के भाजपा सांसदों, विधायकों ने सुनिश्चित किया है। और फिर उसने झूंसी से लेकर हंडिया भदोही तक के हर 2-2 किलोमीटर की दूरी वाले उन नाकों के नाम बताये जहां कांवड़ियों के लिये स्पेशल व्यवस्था की गई है।  

भले ही ये भाजपा सांसदों, विधायकों ने कांवड़ की तुलना में कोविड महामारी और अन्य ज़रूरी मौकों पर लोगों के लिये कुछ करने की ज़रूरत न समझी हो, तो क्या। भला सत्ता और प्रशासन द्वारा ऐसे दुर्लभ सेवाभाव का अवसर दलित बहुजन वर्ग के लोग भी हाथ से कैसे जाने देते। सो सड़कों पर यदुवंशी कांवड़िया मंडल, चौरसिया कांवड़िया मंडल, पटेल कांवड़िया मंडल, पाल कांवड़िया मंडल, अम्बेडकर कांवड़िया मंडल जैसे नामों वाले बड़े-बड़े बैनर से डीजे, ट्रैक्टर, वैन लेकर वो भी कांवड़ यात्रा में शामिल हो गये। जो बिना जातीय पोस्टर बैनर के कांवड़ यात्रा में चल रहे थे उनकी शिनाख़्त उनके चेहरे की श्यामल मटमैली रंगत व उनकी हरक़तों से की जा सकती है।

जैसे कि वो पक्की सड़क पर बिना जूते चप्पल के पैदल चल रहे हैं। रास्ते में पड़ते तमाम मंदिरों के सामने वो कान पकड़कर उठक बैठक लगाते दिखे क्योंकि उनमें अपनी ग़लतियों के प्रति एक अपराध भाव भी है। भक्ति और श्रद्धा अलग बात है और स्टैमिना अलग बात। कितनी भी भक्ति हो लेकिन यदि आप सुविधाभोगी वर्ग से हैं और श्रम से कोसों दूर हैं तो आप पक्की सड़कों पर सैंकड़ों मील नंगे पांव चलने की सोच भी नहीं सकते। ये सिर्फ़ मज़दूर, मज़लूम, किसान वर्ग ही अंजाम दे सकता है। कोविड-19 लॉकडॉउन के समय पूरी दुनिया ने उनका हजारों मील का पैदल ही रिवर्स माइग्रेशन देखा है, ख़ैर।

आखिर दलित बहुजन समाज के लोग कांवड़ ले जाने के पीछे इतनी तपस्या क्यों कर रहे हैं। जाहिर है इसका कोई तार्किक जवाब नहीं है उन लोगों के पास, तर्कशील होते तो काम काज छोड़कर कांवड़ ढोते क्या? फिर भी जो कुछ जवाब जो राह चलते मुझे तमाम कांवड़ियों ने दिया वो कुछ इस प्रकार है। रमेश पटेल नामक एक कांवड़िये ने कहा कि वो इसलिये कांवड़ लेकर जा रहा है ताकि उसके घर परिवार के लोग खुशहाल रहें, रोग व्याधि दूर हो। वहीं यादव समाज के रमाकान्त यादव ने कहा कि हमारे गांव के सारे लड़के लेकर जा रहे थे तो हम भी लेकर चल दिये।

धर्म-कर्म के लिये किसी वजह की ज़रूरत नहीं होती। बाबा भोलेनाथ जब किसी पर दया दृष्टि करते हैं तो बुला लेते हैं। दलित समाज के एक कांवड़ियें से जब मैं पूछता हूं कि आप लोगों के लिये तो सदियों तक मंदिरों के दरवाजे बंद रहे। ये देवता भी नहीं खोलने आये फिर आप क्यों कांवड़ लेकर जा रहे हैं। तो उस लड़के ने जवाब में कहा कि उन लोगों की करनी उनके संग। अब जब मंदिरों के द्वार खुल गये हैं तो हम लेकर जा रहे हैं। देवी देवता तो किसी के नहीं बँटे हैं ना।

इसके बाद मैंने कांवड़ियों के भगवा ड्रेस में छपे नारों, जयकारों और तस्वीरों में आये भारी फेरबदल पर सवाल जवाब किये। बता दूं कि पहले जिन कांवड़ियों की ड्रेस पर हर हर भोले, हर हर महादेव, बोल बम, ओम नमः शिवाय जैसे जयकारे लिखे होते थे, शिव की तस्वीरें छपी होती थीं उन पोशाकों पर अब योगी-मोदी ज़िंदाबाद, जय श्री राम और बुलडोजर बाबा की जय लिखा मिलता है। योगी-मोदी और बुलडोजर की तस्वीरें छपी हैं। ऐसे सभी कांवड़ियों के पोशाकों पर था ऐसा भी नहीं है लेकिन फिर दुकानों में टँगी और सड़कों पर जाते हुये नोटिस किये जाने लायक कांवड़ियों ने इस तरह के कपड़े पहने थे जिनमें योगी मोदी और बुलडोजर ने शिव और शिवकारे को रिप्लेस कर दिया है। तो क्या योगी-मोदी ने हिंदू धर्म में शिव को रिप्लेस करके शिव की जगह ले ली है।

मैंने जब लोगों से ये सवाल पूछा तो उनमें से कुछ ने बताया कि ऐसी ड्रेस उन्होंने ख़रीदी नहीं है बल्कि उन्हें मुफ़्त में मुहैया करवाई बांटी गई है। किन लोगों ने मुहैया करवाया या बांटा इस सवाल पर उन्होंने कहा कि अपने ही लोग थे। फिर ऐसे भगवा टीशर्ट और शॉर्ट्स बाज़ारों में किसने लाकर टांग दिया। इस सवाल के जवाब में बस इतना ही कहा जा सकता है कि बाज़ार उन्हें प्रमोट कर रहा है।

लोग-बाग़ कहते हैं दरअसल इसकी शुरुआत 2014 से ही हो गई थी जब मोदी ने भोले बाबा के नारे को चुराकर अपना नारा बना लिया था। और हर हर महादेव की तर्ज पर हर हर मोदी घर घर मोदी का नारा दिया था। इस बाबत उस वक्त हिंदू धर्माचार्यों ने नाराज़गी भी जाहिर की थी। आखिर आरएसएस भाजपा योगी-मोदी को देवत्व देने में क्यों जुटी हुई है। इसका सीधा सा जवाब है कि नई पीढ़ी के मनोमस्तिष्क पर इन दोनों की शिवत्व छवि स्थापित करना चाहती है। वो बताना चाहती है कि ये लोग लंबे समय तक सताये गये हिंदुओं के नये धर्म योद्धा हैं। इस तरह आरएसएस अब हिंदू धर्म का डीएनए चेंज कर रही है।

वहीं तमाम क्षेत्रीय लोग कांवड़ यात्राओं से बहुत दुखी हैं। उनका कहना है कि हर साल कांवड़ के चक्कर में रोजमर्रा के यातायात का रूट या तो डायवर्ट कर दिया जाता है या फिर अधिकांश गाड़ियां रोक दी जाती हैं। जिसके चलते किराया बढ़ जाता है। एक बार किराया बढ़ गया तो फिर कांवड़ पखवाड़ा खत्म होने के बाद भी वो कम नहीं होता।

वहीं इलाहाबाद में रूट डायवर्जन के चलते बढ़ी डीजल के खपत का भुगतान नहीं होने के कारण 22-23 जुलाई को सिटी बसों का संचालन करने से ड्राईवरों ने मना कर दिया। जिसके चलते नौकरीपेशा और छात्रों को तकलीफ का सामना करना पड़ा। दरअसल 22 जुलाई को रूट डायवर्जन के चलते पूरामुफ्ती, कचहरी, शांतिपुरम, और गोविंदपुर रूट की बसें प्रभावित रहीं। इन रूटों पर चलने वाली बसों को घुमाकर जाना पड़ रहा था मगर डीजल पुराने रूट के हिसाब से दिया जा रहा था जिसके चलते सभी ड्राईवरों ने बसों का संचालन न करने फैसला लिया। और ड्राईवरों व कंडक्टरों ने मिलकर ज्ञापन सौंपा।

बता दें कि इलाहाबाद स्थित गंगा और संगम से जल भरकर कांवड़िये अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार 4 अलग अलग स्थानों की कांवड़ यात्रा फानते हैं। इसमें सबसे लंबी दूरी तय करके देवघर झारखंड स्थित बाबा वैद्यनाथ तक जाते हैं। इसके बाद दूसरा नंबर काशी विश्वनाथ तक की कांवड़ यात्रा है। तीसरा जौनपुर जिले के सुजानगंज में स्थित गौरीशंकर धाम तक है। और चौथी यात्रा सबसे कम दूरी की इलाहाबाद जिले के फाफामऊ थरवईं गांव स्थित पंड़िला महादेव मंदिर तक की है। तो इलाहाबाद से हर आयु, वर्ग, लिंग, जाति के व्यक्ति अपनी अपनी सुविधानुसार हिंदुत्व की आक्रामक ध्वजा उठाये सड़कों पर सावन की हरीतिमा को भगवा करने में लगे हुये हैं। 

वहीं आज से दो दशक पहले तक कांवड़ लेकर देवघर झारखंड जाने वाले राम प्रसाद मिश्रा बताते हैं कि पहले एक गांव या आस पास के कई गांवों के चुनिंदा घरों के बुजुर्ग या जिम्मेदार व्यक्ति कांवड़ लेकर बाबा धाम जाते थे। तब एक बस बुक होती थी उसमें बैठकर लोग जाते थे। तब दलित समुदाय का कोई नहीं जाता था। क्योंकि इसमें अच्छा खासा पैसा लगता था और पूरे एक सप्ताह का ट्रिप होता था। मुख्यतः ब्राह्मण, ठाकुर, लाला, बनिया आदि जातियों के लोग ही जाते थे। बुजुर्ग राम प्रसाद अपनी बात को सुधारते हुये कहते हैं पैसा एक छोटा कारण था बड़ा कारण एक सप्ताह का समय था। आषाढ़ में धान रोपने वाला किसान सावन में अपने खेतों को छोड़कर देवस्थान नहीं जायेगा। यही हाल यादवों का था वो तो दुधारू जानवरों को एक टाइम के लिये भी नहीं छोड़ते थे, फिर एक हफ्ता तो बहुत दूर की बात थी। राम प्रसाद मिश्र उन दिनों को याद करते हुये विह्वल हो उठते हैं। वो कहते हैं कांवड़ पहले भी लोग लेकर जाते थे। लेकिन तब उसमें इतना दिखावा नहीं था।

कोई ड्रेस कोड नहीं था। भक्ति और श्रद्धा विनम्रता और धैर्य की मांग करती है। तब लोग गाड़ियों के ऊपर बैठकर सड़कों पर उत्पात नहीं मचाते थे। उनमें इतनी हिंसा और इतना शोर नहीं था। आज डीजे पर अश्लील भोजपुरी गानों की धुन पर बजते कर्कश भजनों (हालांकि उन्हें भजन कहीं से भी नहीं कहा जा सकता है। भजन वो होता है जो आपके चित्त को शांत करता है।) और भांग, गांजा, शराब के सेवन करते खाते पीते जा रहे हैं। राम प्रसाद जी आखिर में कहते हैं यह भक्ति और साधना तो नहीं है बाक़ी आप इसे कुछ भी कह लीजिये।

(प्रयागराज से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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