Saturday, October 1, 2022

महाराष्ट्र पर चीफ जस्टिस ने कहा-हमने 10 दिन के लिए सुनवाई टाली, आपने सरकार बना ली, स्पीकर बदल गए

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महाराष्ट्र के सियासी संकट पर उच्चतम न्यायालय में बुधवार को उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट की ओर से दाखिल 5 याचिकाओं पर दोनों पक्षों के वकीलों में गरमागरम बहस हुई। चीफ जस्टिस एनवी रमना ने शिंदे पक्ष के वकील से कहा कि हमने 10 दिन के लिए सुनवाई टाली थी। आपने सरकार बना ली, स्पीकर बदल दिया। इस पर शिंदे गुट के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने खुद ही सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। एक व्यक्ति या नेता पूरी पार्टी नहीं हो सकता है। चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि हम कल (गुरुवार को) इस केस को सुबह साढ़े दस बजे सुनेंगे।

चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस हेमा कोहली की पीठ अयोग्यता कार्यवाही, अध्यक्ष के चुनाव, पार्टी व्हिप की मान्यता के संबंध में शिवसेना पार्टी के एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुटों से संबंधित याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

सबसे पहले उद्धव कैंप के वकील कपिल सिब्बल ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अगर 2 तिहाई विधायक शिवसेना से अलग होना चाहते हैं, तो उन्हें किसी से विलय करना होगा या नई पार्टी बनानी होगी। वह नहीं कह सकते कि वह मूल पार्टी हैं। चीफ जस्टिस ने पूछा कि मतलब आप कह रहे हैं कि उन्हें भाजपा  में विलय करना चाहिए था या अलग पार्टी बनानी थी। सिब्बल बोले कि 10वीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत तो यही करना था।

सिब्बल ने कहा कि जिस तरह से उन्होंने (शिंदे गुट) पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। वे मूल पार्टी होने का दावा नहीं कर सकते। 10वीं अनुसूची इसकी अनुमति नहीं देती है। पार्टी सिर्फ विधायकों का समूह नहीं होती है। इन लोगों को पार्टी की बैठक में बुलाया गया। वह नहीं आए। डिप्टी स्पीकर को चिट्ठी लिख दी। अपना व्हिप नियुक्त कर दिया। असल में उन्होंने पार्टी छोड़ी है। वह मूल पार्टी होने का दावा नहीं कर सकते। आज भी शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे हैं।

सिब्बल ने कहा कि जब संविधान में 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी प्रावधान) को जोड़ा गया, तो उसका कुछ उद्देश्य था। अगर इस तरह के दुरुपयोग को अनुमति दी गई तो विधायकों का बहुमत सरकार को गिरा कर गलत तरीके से सत्ता पाता रहेगा और पार्टी पर भी दावा करेगा। पार्टी की सदस्यता छोड़ने वाले विधायक अयोग्य हैं। चुनाव आयोग जाकर पार्टी पर दावा कैसे कर सकते हैं?

सिब्बल ने कहा कि पार्टी सिर्फ विधायकों का समूह नहीं होता है। इन लोगों को पार्टी की बैठक में बुलाया गया। वह नहीं आए। डिप्टी स्पीकर को चिट्ठी लिख दी। अपना व्हिप नियुक्त कर दिया। असल में इन लोगों ने पार्टी छोड़ी है। वह मूल पार्टी होने का दावा नहीं कर सकते।आज भी शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे हैं।उन्होंने आगे कहा कि जब संविधान में 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी प्रावधान) को जोड़ा गया, तो उसका कुछ उद्देश्य था। अगर इस तरह के दुरुपयोग को अनुमति दी गई तो विधायकों का बहुमत सरकार को गिरा कर गलत तरीके से सत्ता पाता रहेगा और पार्टी पर भी दावा करेगा।

उद्धव कैंप के दूसरे वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि इन लोगों को किसी पार्टी में विलय करना था। वह जानते हैं कि असली पार्टी नहीं हैं, लेकिन चुनाव आयोग से मान्यता पाने की कोशिश कर रहे हैं।

शिंदे गुट के वकील हरीश साल्वे ने दलील दी कि जिस नेता को बहुमत का समर्थन न हो वह कैसे बना रह सकता है? सिब्बल ने जो बातें कही हैं, वह प्रासंगिक नहीं हैं। किसने इन विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया? जब पार्टी में अंदरूनी बंटवारा हो चुका हो तो दूसरे गुट की बैठक में न जाना अयोग्यता कैसे हो गया?

इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा: इस तरह से तो पार्टी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। विधायक चुने जाने के बाद कोई कुछ भी कर सकेगा।

साल्वे ने जवाब दिया कि हमारे यहां एक भ्रम है कि किसी नेता को ही पूरी पार्टी मान लिया जाता है। हम अभी भी पार्टी में हैं। हमने पार्टी नहीं छोड़ी है। हमने नेता के खिलाफ आवाज उठाई है। किसी ने शिवसेना नहीं छोड़ी है। बस पार्टी में 2 गुट हैं। क्या 1969 में कांग्रेस में भी ऐसा नहीं हुआ था? कई बार ऐसा हो चुका है। चुनाव आयोग तय करता है। इसे विधायकों की अयोग्यता से जोड़ना सही नहीं। वैसे भी किसी ने उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया।

चीफ जस्टिस ने फिर पूछा कि आप चुनाव आयोग क्यों गए हैं?

साल्वे ने जवाब दिया कि सीएम के इस्तीफे के बाद स्थिति में बदलाव हुआ है। अब बीएमसी चुनाव आने वाला है। यह तय होना जरूरी है कि पार्टी का चुनाव चिह्न कौन इस्तेमाल करेगा।

चीफ जस्टिस ने फिर पूछा कि आप दोनों में पहले सुप्रीम कोर्ट कौन आया था?

साल्वे ने कहा कि हम आए थे क्योंकि डिप्टी स्पीकर ने अयोग्यता का नोटिस भेजा था। लेकिन, उनके खिलाफ खुद ही पद से हटाने की कार्रवाई लंबित थी। वह नबाम रेबिया फैसले के चलते ऐसा नहीं कर सकते थे।

इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि हमने 10 दिन के लिए सुनवाई टाली थी। इस बीच आपने सरकार बना ली। स्पीकर बदल गए। अब आप कह रहे हैं, सारी बातें निरर्थक हैं।साल्वे ने कहा कि मैं ऐसा नहीं कह रहा कि इन बातों पर अब विचार ही नहीं होना चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि ठीक है हम सभी मुद्दों को सुनेंगे।

शिंदे कैंप के दूसरे वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि दूसरा पक्ष चाहता है कि कोई भी दूसरी संवैधानिक संस्था अपना काम न करे। उसकी जगह सब कुछ सुप्रीम कोर्ट तय करे। चीफ जस्टिस ने कहा कि सबसे पहले आप ही सुप्रीम कोर्ट आए थे। कौल ने कहा कि मैं स्वीकार करता हूँ कि हम पहले हाईकोर्ट भी जा सकते थे।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि या तो आप डिप्टी स्पीकर को फैसला लेने देते। बाद में कोर्ट उस पर विचार कर लेता।

साल्वे ने कहा कि  डिप्टी स्पीकर कार्रवाई करने के अयोग्य थे। दूसरे पक्ष का यह दावा भी गलत है कि हमने पार्टी सदस्यता छोड़ी है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि लेकिन दूसरे पक्ष का कहना है कि इस तरह तो कुछ एमएलए के ज़रिए स्पीकर को नोटिस भेज कर उन्हें काम करने से रोका जा सकता है। साल्वे ने कहा कि इन बातों का नबाम रेबिया फैसले में जवाब दिया जा चुका है। हमने पार्टी नहीं छोड़ी है। स्पीकर को इस पर फैसला लेने दीजिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि साल्वे साहब आप अपने बिंदुओं को ठीक से ड्राफ्ट कर हमें सौंपिए। हम कल 10 से 15 मिनट विचार करेंगे।

राज्यपाल के वकील तुषार मेहता ने दलील दी कि लोग एक विचारधारा को चुनते हैं। एक गठबंधन में चुनाव लड़कर, दूसरे के साथ सरकार बना लेना गलत है। राजेन्द्र सिंह राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सार यही है।

शिंदे कैंप के वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि दूसरा पक्ष कोशिश कर रहा है कि चुनाव आयोग को पार्टी चुनाव चिह्न पर कार्रवाई न करने दी जाए। लेकिन, यह अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। सिंबल रूल्स में भी यही व्यवस्था है। उसे उसके काम से नहीं रोका जा सकता।

शिंदे गुट के एक और वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि दूसरे पक्ष की दलील इसी बात पर है कि यह विधायक अयोग्य माने जाने चाहिए थे, लेकिन सच यही है कि किसी ने उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया। फ्लोर टेस्ट की नौबत भी नहीं आई।सीएम ने खुद इस्तीफा दे दिया। उसके बाद राज्यपाल ने अपने विवेक से फैसला लिया।

सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई से पहले उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया है। हलफनामे में कहा कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे सरकार जहरीले पेड़ का फल है। इस जहरीले पेड़ के बीज बागी विधायकों ने बोए थे। शिंदे गुट के विधायकों ने संवैधानिक पाप किया है। शिंदे और बागी विधायक अशुद्ध हाथ लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं।

सोमवार को शिंदे गुट ने हलफनामा दाखिल किया था, जिसमें कहा कि उद्धव गुट की याचिका को खारिज किया जाए। शिंदे गुट ने कहा कि उद्धव ठाकरे ने विधानसभा में बहुमत खो दिया था। शिवसेना में लोकतांत्रिक तरीके से विभाजन हुआ, इसलिए कोर्ट इसमें हस्तक्षेप न करे। शिंदे गुट ने कहा कि शिवसेना पर फैसला चुनाव आयोग को लेने दें। कोर्ट में यह तय नहीं होगा कि विभाजन सही है या नहीं?

शिंदे गुट ने पिछली सुनवाई में तर्क दिया था कि उद्धव ठाकरे के पास सिर्फ 16 विधायक हैं, जबकि हमारे पास 39 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। ऐसे में हम बागी कैसे हो गए? उद्धव की याचिका पर सुनवाई करने का मतलब है कि बहुमत का अपमान।

30 जून को महाराष्ट्र के सीएम एकनाथ शिंदे के साथ डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस ने शपथ ली थी। उनके शपथ ग्रहण के बाद से मंत्रिमंडल विस्तार का कार्यक्रम अटका हुआ है। विधायकों की सदस्यता पर फैसला होने के बाद ही मंत्रिमंडल विस्तार होने की संभावनाएं हैं।

हरीश साल्वे ने कहा कि जिस नेता को बहुमत का समर्थन न हो वह कैसे बना रह सकता है? शिवसेना के अंदर ही कई बदलाव हो चुके हैं। सिब्बल ने जो बातें कही हैं, वह प्रासंगिक नहीं हैं। किसने इन विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया। जब पार्टी में अंदरूनी बंटवारा हो चुका हो तो दूसरे गुट की बैठक में न जाना अयोग्यता कैसे हो गया?

चीफ जस्टिस  ने कहा कि इस तरह से तो पार्टी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। विधायक चुने जाने के बाद कोई कुछ भी कर सकेगा।

इससे पहले इस मामले की सुनवाई 20 जुलाई को हुई थी। इस मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन किया जा सकता है। उस दिन कोर्ट ने सभी पक्षों से कहा था कि वह आपस में बात कर सुनवाई के बिंदुओं का एक संकलन जमा करवाए ।बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में दोनों गुटों के नेताओं की कई याचिकाएं लंबित हैं और इन याचिकाओं में विधायकों की अयोग्यता, राज्यपाल की तरफ से शिंदे गुट को आमंत्रण देने, विश्वास मत में शिवसेना के दो व्हिप जारी होने जैसे कई मसलों को उठाया गया है।

(जनचौक ब्यूरो की रिपोर्ट।)

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