इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन वकीलों की पहचान करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने 27 अक्टूबर को जस्टिस अजय भनोट से जुड़ी घटना के विरोध में कोर्ट के गलियारों में नारेबाजी की और अदालती कार्यवाही में बाधा डाली।
कोर्ट ने उनके इस व्यवहार को “पूरी तरह से अवमाननापूर्ण” बताया है। कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए यूपी बार काउंसिल को भेज सकता है, और साथ ही उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही भी शुरू कर सकता है।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने आज एक जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। कोर्ट ने दर्ज किया कि कुछ वकीलों ने कोर्ट रूम के बाहर गलियारे में शोर मचाना शुरू कर दिया, जिससे अदालती कार्यवाही में बाधा आई।
यह घटना 27 अक्टूबर को कोर्ट नंबर 49 में हुई एक घटना के बाद हुए वकीलों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ी है, जहां जस्टिस अजय भनोट सुनवाई कर रहे थे। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली को पत्र लिखकर जस्टिस भनोट की कोर्ट का बहिष्कार करने की चेतावनी दी।
एसोसिएशन का आरोप है कि जस्टिस भनोट ने अदालती कार्यवाही के दौरान एक वकील को अपमानित किया और एक वरिष्ठ वकील का मजाक उड़ाया।
एसोसिएशन के पत्र के अनुसार, एक वकील ने कोर्ट रूम में एक पुलिस अधिकारी के किसी विशेष सीट पर बैठने पर आपत्ति जताई थी। एसोसिएशन का आरोप है कि इसके बाद जस्टिस भनोट ने उस वकील को जेल भेजने का आदेश दिया और उसे पुलिस अधिकारी से माफी मांगने के लिए मजबूर किया।
पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि जज ने वरिष्ठ वकील वीपी श्रीवास्तव का मजाक उड़ाया। पत्र में चेतावनी दी गई है कि अगर कोई उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन जस्टिस भनोट की कोर्ट का बहिष्कार करेगा।
इसी पृष्ठभूमि में, बुधवार को वकीलों ने विरोध प्रदर्शन किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ वकीलों ने जस्टिस भनोट के कोर्ट रूम के अंदर फर्नीचर भी फेंका।
इस हंगामे के कारण बगल के कोर्ट रूम में मौजूद जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालती कार्यवाही भी बाधित हुई, जिन्होंने इस घटना का गंभीर संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा: “इस तरह की घटना अदालत की कार्यवाही में दखल देने के बराबर है।
अदालत ने कहा, “गरीब लोग अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हाई कोर्ट आते हैं। सिर्फ इसलिए कि कुछ वकीलों को किसी खास अदालत से कोई दिक्कत है, उन्हें नारे लगाने, शोर मचाने, दूसरी अदालतों की कार्यवाही में बाधा डालने या ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जा सकती, जिससे अदालत को डराया-धमकाया जा सके। यह पूरी तरह से गलत है।”
इस व्यवहार को “अदालत की अवमानना” करार देते हुए, कोर्ट ने रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को निर्देश दिया कि वे कोर्ट नंबर 66 के बाहर लगे कैमरे से सीसीटीवी फुटेज लें, इसमें शामिल वकीलों की पहचान करें और अगली तारीख पर अपनी रिपोर्ट पेश करें। मामले की सुनवाई 19 नवंबर तक के लिए टाल दी गई।
बार एसोसिएशन ने मंगलवार को आरोप लगाया था कि जस्टिस भनोट ने एक वकील को पुलिस अधीक्षक से माफी मांगने के लिए मजबूर किया। वकील ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि एसपी उस कतार में बैठे थे, जो आमतौर पर वकीलों के लिए आरक्षित होती है।
बार एसोसिएशन ने बताया कि जस्टिस भनोट के कोर्ट रूम में पुलिस अधिकारियों और अन्य उच्च पदस्थ अधिकारियों के लिए अलग से कुर्सियां लगाई जा रही थीं। वकील ने एसपी से पीछे की ओर बैठने के लिए कहा था।
बार एसोसिएशन का आरोप है कि जज ने वकील को जेल भेजने की धमकी दी और एक अन्य वरिष्ठ वकील का मजाक भी उड़ाया।
एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश से वकील के साथ हुए इस कथित दुर्व्यवहार का संज्ञान लेने का आग्रह किया है। साथ ही चेतावनी दी है कि अगर कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो उनके सदस्य जस्टिस भनोट की अदालत का बहिष्कार करेंगे।
बुधवार को हाई कोर्ट से सामने आए वीडियो में कई वकील जस्टिस भनोट के कोर्ट रूम के बाहर इकट्ठा होते दिखे, जहां वे जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत के साथ बैठे थे।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)