भारत की पहली महिला फोटोजर्नलिस्ट होमाई व्यारावाला (1913 – 2012) के जीवन पर आधारित
वह फोटो किसने खींची? किताब के शीर्षक में ही सवाल है तो उत्सुकता होना लाजिमी है। आज जब अधिकांश हाथों में मोबाइल कैमरा आम है, कवर के चित्र को देखते ही बड़ी उम्र के पाठक नास्टाल्जिक हो उठेंगे और छोटी उम्र के पाठक कौतूहल से भरे होंगे कि ये दो लेंस वाला कैमरा तो हमें देखने को नहीं मिला। बात फोटो की है तो फ्रेम तो होंगे ही, तो कवर पेज को पलटते ही सुंदर सी जाली दिखती है मानो खूब सारे फ्रेम हों, बस इनमें तस्वीरें टांकनी हों।
कहानी की शुरुआत सुबह से होती है मतलब यह भी कि रात निकल चुकी है। मां कहती है कि परी! अपना कैमरा छोड़ो और ब्रश कर लो। फोटो खींचने के चक्कर में आज फिर क्लास गोल करने वाली हो। इस वाक्य से परी का कैमरे के प्रति पैशन झलकता है। परी को मालूम है कि आज गणेश चतुर्थी है और मिस्टर नखरावाला का अखबार त्यौहारों की बढ़िया तस्वीरों के लिए पूरा एक रुपया देता है, परी यह रुपया कमाना ही चाहती है, उससे वह जाने क्या-क्या खरीदना चाहती है।
परवेज के साथ एक बढ़िया तस्वीर की तलाश में परी साइकिल से निकलती है। परवेज़ परी से कैमरा छीनता है और परी की एक फोटो लेता है। परी कहती है कि इस रील से मैं दस तस्वीरें खींच सकती थी, पर अब सिर्फ नौ बची हैं। कुछ पाठकों को आश्चर्य हो सकता है कि अखबार में तस्वीर के लिए एक रुपया का और दस में से नौ तस्वीरों को बचने का क्या मतलब है। कयास लगा सकते हैं कि यह बात आज या कल की नहीं बरसों पुरानी बात है। होमाई मारावाला के जीवन से प्रेरित यह कहानी नंदिनी ड कूना ने लिखी है, चिंत्रांकन प्रिय कूरियन ने किया है। यह चित्रकथा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, हिन्दी में भी उपलब्ध है जिसका अनुवाद सारिका ठाकुर ने किया है। आगे देखते हैं कि कौन है होमाई मारावाला।
गणेश चतुर्थी पर हर जगह चहल-पहल है, बच्चे हैं, ढोलकिए हैं, उत्सव का माहौल है, हर दो पेज के कैनवास पर परी एक धांसू फोटो खींचने का प्रयास करती है और हर बार फ्रेम में कुछ मज़ेदार और कुछ अलग होता है, जो कि परी नहीं चाहती और हर बार वह चिंता भी करती है और उल्टी गिनती करती है कि कितनी तस्वीरें बचीं हैं। भीड़ भाड़ से बच कर निकलते हुए परी के ब्लाउज़ की आस्तीन की सिलाई उधड़ जाती है, वह घर जाने की जगह दूसरी आस्तीन भी खींच कर अलग कर लेती है। पुस्तक के हर दो पेज का अंत एक प्रश्न या अचरज से होता रहता है जैसे सोचो मैंने किसकी तस्वीर ली? पर किसकी? अरे-अरे यह क्या हुआ….देखो तो किसका फोटो खींचा? देखो तो क्या कैद हुआ?
परी को याद आता है कि मां अपने चरखे पर खादी बुनती थी, ताकि मैं तस्वीरों वाली कहानी बुन सकूं, पर वह बेच दिया तो फिल्म रोल खरीदने के लिए अब उसे पैसे चाहिए ही जो कि मिस्टर नखरावाला के अखबार से ही मिल सकते हैं, मगर अब केवल दो तस्वीरें ही बची हैं। एक खाली बालकनी दिखती है मगर क्या इस पर चढ़ना सुरक्षित है? ऊपर चढ़कर पगड़ियां, टोपियां, ढोलकें, धौतियां, टोकरियों और डोलियों के रेले की एक फोटो लेती है, पर यह तो कमाल की फोटो नहीं है। अब आखिरी तस्वीर की गुंजाइश बचती है। एक ज़ोरदार धमक होती है, बारिश की पहली बूंदें गिरते ही बच्चे खुशी से नाचने लगते हैं, ऊपर देखते हैं…..तभी क्लिक-क्लिक-क्लिक और आखिरी तस्वीर भी खत्म।
नीचे खुले छातों का समन्दर दिखता है, बारिश होती रहती है बालकनी से बमुश्किल कैमरे को ढांकते हुए निकलते हैं। यह फोटो परवेज के नाम से बेच रही हैं। यह भी संशय में रहती है कि मिस्टर नखरावाला को मालूम चला कि फोटो एक लड़की ने खींचा है तो क्या वह छाप देंगे? जब वह शीर्षक “जुलूस”, छायाकार परवेज़ मिस्त्री देखते ही गरज पड़े। तुम दोनों की हिम्मत कैसे हुई। परी कारण बताती है, कबूल करती है। वे कहते रहे “चले जाओ! मैं तय करूंगा जो मुझे करना है।”
सुबह मां फिर परी का नाम लेकर चिल्लाती है, उसको लगता है कहीं उसकी शिकायत तो नहीं हो गई। मां खुशी से कहती है “क्या यह मेरी परी है? कहीं और नहीं, अखबार के पहले पेज पर” परी भी खुशी के हुर्रे कह हवा में मुक्का उछाल देती है। द बाम्बे बज़ अखबार की प्रतिछाया सुखद अहसास देती है। कहानी खत्म नहीं होती, परी की इस कहानी की बुनाई में बहुत सारी कहानियों के बीज भी थे, जो कि आगे के पन्ने पलटने पर आकार लेते हैं। जैसे कि “यह फोटो किसने खीचीं” की बहस से बचने के लिए परी चुपचाप से परवेज़ को फ्रेम में शामिल कर लेती थी।
यह कहानी भारत की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट होमाई व्यारावाला (1913 – 2012) के जीवन पर आधारित है, यह भी की उस दौर में जब पेशेवर फोटोग्राफर के रूप में किसी महिला के वजूद को नकार ही हासिल थी। इकतारा ट्रस्ट की प्रकाशन छाप जुगनू इस किताब को पाठकों के लिए लाए हैं। प्रिया कुरियन के चित्रांकन को लेकर इस पुस्तक को बिग लिटिल बुक अवार्ड भी मिल चुका है, प्रिया के चित्रांकन की सहजता उनके आस-पास के जीवन के सूक्ष्म अवलोकन से आती है, जो किताब को भी ज्यादा खास बना देती है।
(मनोज निगम लेखक और पत्रकार हैं।)