उत्तराखंड : रामपुर तिराहा कांड जारी है..डॉल्फिन मजदूर आंदोलन को पुलिस और गुंडों के बल पर कुचलने में लगी सरकार

उत्तराखंड राज्य के निर्माण के लिए उत्तराखंड की महिलाओं को जिस अपमान का सामना करना पड़ा था उसके घाव आज भी आम उत्तराखंडी के मन में हरे हैं। यही कारण है कि आज तक उत्तराखंड का आम आदमी मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी से बहुत नफरत करता है। 

लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद भी तमाम कांग्रेस और भाजपा सरकारों में महिलाओं के साथ बलात्कार, दुर्व्यवहार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है। इस हमले का विस्तार फैक्ट्रियों तक हुआ है।

कांग्रेस और भाजपा सरकारों के राज में उत्तराखंड की महिला मजदूर कारखाने के अंदर और बाहर गुण्डों और बाउंसरों के द्वारा अपमानित की जा रही हैं। इसके कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। 

हरीश रावत की कांग्रेस सरकार के दौरान अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रही प्रिकोल कंपनी की अनशनरत  महिला मजदूर को पुरुष पुलिस  ने लाठियां से बुरी तरह मारा और उनके कपड़े फाड़ डाले थे।

फिर बिल्कुल ऐसी कई घटनायें भाजपा राज में भी दोहराई गई थीं। रुद्रपुर की डॉल्फिन फैक्ट्री में इस साल जनवरी में मजदूरों ने न्यूनतम मजदूरी दिए जाने की मांग की और इसके लिए आंदोलन किया। मालिक ने मजबूर हो उनका वेतन बढ़ा कर 10,300 किया। यानि उत्तराखंड में अर्ध-कुशल को देय वेतन।

परंतु मार्च 2024 के बाद आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 48 मजदूरों को फैक्ट्री ने निकाल दिया और कई परमानेंट मजदूरों को ठेके में डाल दिया जो कि भारत में पूंजीपति वर्ग द्वारा किए जाने वाले नए प्रयोग की शुरुआत हो सकती है। यह मानने के पीछे आधार यह है कि उत्तराखंड में श्रम मंत्रालय मुख्यमंत्री धामी के पास ही है।

उत्तराखंड के शहरों में मुख्यमंत्री के बड़े-बड़े होर्डिंग आपको देखने को मिल जाएंगे जिसमें वह निवेशकों से उत्तराखंड में निवेश करके भरपूर फायदा लेने का खुला आमंत्रण पूंजीपतियों को देते हैं। यह याद दिलाना उल्लेखनीय होगा की धर्म नगरी ऋषिकेश में भाजपा के एक मंत्री पुत्र द्वारा चलाए जा रहे एक गेस्ट हाउस में अंकिता भंडारी की दुर्व्यवहार  के बाद हत्या गई थी।

अंकिता भंडारी और उसके मित्र के बीच में हुई व्हाट्सएप कॉल से पता चलता है कि अंकिता भंडारी को किसी VVIP को खास सेवा के लिए ₹10,000 का लालच दिया गया था (वाह रे मुलायम सरकार नंबर दो)।

अंकिता की मौत के बाद उत्तराखंड की एक महिला भाजपा विधायक के आदेश पर गेस्ट हाउस में अंकिता के रहने के कमरे को बुलडोजर से तोड़फोड़ दिया गया था ताकि कोई सबूत ना मिले। 

अब तो खुद सीएम धामी ने किसी भी वीवीआईपी के होने से ही इंकार कर दिया है। 

क्या कोई गुजराती VVIP तो नहीं है धामी जी ? 

निसंदेह भारत का कोई बहुत बड़ा VVIP है जिसे बचाने की कोशिश है। मुख्यमंत्री को खुद मैदान में उतरना पड़ा है। कमाल है।

लगभग इसी शैली में मुख्यमंत्री धामी के संरक्षण में डॉल्फिन का मालिक प्रिंस धवन खुली गुंडई कर रहा है। बहुत तेजी से वायरल हो रहे एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में डॉल्फिन का मालिक प्रिंस धवन प्रेमपाल सिंह नामक सुपरवाइजर को धमकी देता है कि उसने इरफान पाशा और लाल सिंह जैसे रुद्रपुर के जाने-माने गुंडों  को उनकी टीमों के साथ पुरुष और महिला मजदूरों से निपटने के लिए लगा रखा है।

फैक्ट्री से वापस आती हुई डॉल्फिन की महिला मजदूरों को एक दिन जब इन गुंडों ने अपनी गाड़ी में जबरन बिठाना चाहा तो वे इंकलाबी मजदूर केंद्र के दफ्तर में घुस गईं। इस पर ये गुंडे दूर से ही महिलाओं को गंदे-गंदे इशारे करने लगे। इस पर कई साथी इन गुंडों को पकड़कर इंकलाबी मजदूर केंद्र के दफ्तर के अंदर ले आये और इनका वीडियो बनाया जिसमें इन्होंने अपने कृत्य  के लिए माफी भी मांगी।

परंतु इस बीच लाल सिंह गुंडे ने फोन कर (वर्दीधारी गुंडों) पुलिस वालों को बुला लिया। पुलिस वाले उल्टा मजदूरों और इंकलाबी केंद्र के भूतपूर्व अध्यक्ष कैलाश भट्ट को थाने चलने की जिद करने लगे और मुकदमा दर्ज करने की धमकी देने लगे। 

 इस बात की शिकायत जब मजदूर एसएसपी से करने गए तो उसने कहा कि FIR से डॉल्फिन कंपनी का नाम हटा दो। लेकिन मजदूरों का कहना था कि आप रेकॉर्डिंग की जांच कर खुद फैसला कर लें। 

इरफान पाशा और लाल सिंह ऐसे पेशेवर गुंडा तत्व हैं जो आती-जाती महिलाओं को छेड़ते हैं और साइकिल पर ड्यूटी से वापस जाते हुए मजदूरों की साइकिल रुकवा कर उनसे मोबाइल और पैसे छीन ले लेते हैं।

लेनिन अपने मशहूर ग्रंथ ” राज्य और क्रांति ” में  कुछ ऐसा उल्लेख करते हैं कि पूंजीवादी जनतंत्र में किसी भी पार्टी या नेता में कोई भी बदलाव पूंजीवादी लोकतंत्र के शोषणकारी चरित्र पर कोई प्रभाव नहीं डालता है और पूंजीवादी जनतंत्र द्वारा व्यापक मेहनतकश जनता के लिए राज्य सत्ता का स्वरूप दमनकारी ही रहता है। 

मजदूरों को याद रहे कि शहीद भगत सिंह अपनी जेल डायरी में यह लेनिन के कोट को नोट किया था कि “बुर्जआ जनतंत्र सामंतवाद की तुलना में एक महान ऐतिहासिक प्रगति होने के बावजूद बहुत ही सीमित, बहुत ही पाखंडपूर्ण संस्था है जो धनिकों के लिए स्वर्ग और शोषितों, गरीबों के लिए एक जाल और छलावे के अलावा न तो कुछ हो सकता है और न है।”

(डॉ. उमेश चंदोला पशु चिकित्सक हैं)

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