कौन है सही और कौन नहीं?

सवाल यह है कि बतौर नागरिक हमें सरकार की सुननी चाहिए या विपक्ष की। किसी भी जिंदा लोकतंत्र में ये दोनों प्रायः एक-दूसरे से उलट रुख ही अपनाते दिखते हैं। इसलिए ज्यादातर समय यह दुविधा रहती है कि सत्ता पक्ष की सुनी जाए या विपक्ष की। चूंकि नागरिकों का भी एक बड़ा हिस्सा दोनों में से किसी एक पक्ष की ओर झुकाव रखता है, इसलिए आम तौर पर जो जिस पक्ष का समर्थक होता है, उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से सुनता और इसीलिए उसी पक्ष की ओर बना रहता है।

लेकिन सामान्य समझ भी यह बता सकती है कि कोई भी एक पक्ष हमेशा, हर मामले में सही नहीं होता। तो हमारा पक्ष जो भी हो, किसी खास समय में वह सही है या नहीं यह कैसे तय करें।

इस सवाल का सही जवाब तलाशने से पहले, एक बात यह तय मानी जा सकती है कि चूंकि सरकार के पास फैसले करने और उन्हें अमल में लाने की शक्ति होती है, इसलिए उस पर ज्यादा कड़ी निगहबानी की जरूरत रहती है। यानी बतौर नागरिक हमारी राय चाहे जिस किसी पक्ष की ओर हो, हमें सरकार पर उसके कामकाज पर, उसके फैसले करने के ढंग पर और उसके अंदर पनप रही प्रवृत्तियों पर ज्यादा कड़ी नजर बनाए रखनी होती है। यह हमारा सबसे बड़ा लोकतांत्रिक दायित्व होता है। 

और, जब हम अपने उस दायित्व को लेकर सचेत होते हैं तो सरकार की आलोचना कर रहे नागरिकों से मतभेद रखते हुए भी उन्हें वैचारिक शत्रु या विरोधी के रूप में नहीं देखते। हमें वे भी उस नागरिक धर्म का पालन करने वाले बंधु नजर आते हैं जो हमारा भी धर्म होता है। 

जाहिर है, उस स्थिति में अगर सरकार आलोचना कर रहे उन नागरिकों की राह में रोड़े अटकाती है, उन्हें बदनाम करती है या उनके अधिकारों पर पाबंदियां लगाती है तो अपने मतभेदों की परवाह न करते हुए ऐसे सभी नागरिक लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।

उन्हें पता होता है कि सरकारें आती जाती रहती हैं, अगर सरकार चुनने में एक बार गलती भी हो जाए तो अगले चुनाव में उस गलती को दुरुस्त किया जा सकता है, लेकिन एक बार राजनीतिक नेतृत्व को निरंकुशता का चस्का लग गया तो फिर उससे छुटकारा पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। संभावना यही होती है कि नागरिक उस नेतृत्व को बदल दें तो भी उसकी जगह लेने वाला दूसरा नेतृत्व पिछले नेतृत्व की गलतियों से सबक लेते हुए नए तरीकों से निरंकुशता लादने का प्रयास करेगा।

बहरहाल, सवाल यह था कि निर्णायक पलों में हम सरकार को सही मानें या विपक्ष को और कैसे तय करें कि दोनों में से कौन सही है। जाहिर है, इसका कोई एक सर्वमान्य जवाब नहीं हो सकता। लेकिन कुछ ऐसे सूत्र जरूर तलाशे जा सकते हैं जो यह तय करना आसान बना दें। 

सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि विवाद का मुख्य बिंदु क्या है। क्या किसी खास पॉलिसी, किसी एक फैसले के सही या गलत होने का मामला है या इसमें लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों, नागरिक अधिकारों का सवाल भी दांव पर लगा है। एक बार यह प्रक्रिया शुरू करें तो हम पाएंगे कि अक्सर बात शुरू होती है किसी छोटे सवाल से, पर धीरे-धीरे उसमें बड़े मुद्दे भी शामिल हो जाते हैं।

हम मुद्दों की बारीकी से पड़ताल करना जारी रखें और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संवैधानिक नैतिकता की कसौटी को सबसे ऊपर रखते हुए पक्ष-विपक्ष दोनों को निर्ममता से उस कसौटी कसते चलें तो न केवल सही पक्ष को समय रहते पहचान सकते हैं बल्कि राजनीतिक नेतृत्व का लगातार बेहतर होते जाना भी सुनिश्चित कर सकते हैं।

(रेखाचित्र प्रतीकात्मक : एआई की मदद से)

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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