हाल के वर्षों में आर्थिक विकास को गति देने के लिए औद्योगिक विकास को गतिमान करना आवश्यक माना जाने लगा है। कंपनी या कॉर्पोरेट सेक्टर ने भी छलांग लगाना शुरू किया है और साथ ही पूंजीवाद भी अपने चरम मुकाम पर पहुंचने के लिए कुलांचे भरने लगा है। परिणाम क्या हुआ? कॉर्पोरेट की शोषण प्रवृत्ति से विद्रूप हुआ चेहरा अब गुलाम बना कर दिखा रहा है उनको भी, जिनको अभी तक हम सामान्यतः श्रमिक वर्ग के अंतर्गत नहीं मानते थे।
लेकिन हाल के वर्षों में कॉर्पोरेट की गुलामी का एक और रूप उभर कर सामने आया है आईटी कॉर्पोरेट सेक्टर में। सामान्यतया अब कॉर्पोरेट सेक्टर में बहुत कम श्रम और अधिकांश प्रबंधन ही शामिल होने लगे हैं तो मध्यम या निम्न प्रबंधक वर्ग ही अब अपने को कुछ श्रमिकों जैसी स्थिति में पाने लगे हैं। कल तक जिस शोषण की कल्पना मजदूरों के सन्दर्भ में की जाती थी वही शोषण अब इन प्रबंधक वर्ग के साथ भी दिखाई देने लगा है। कॉर्पोरेट द्वारा गुलाम बनाने की प्रवृत्ति अब इससे भी आगे बढ़ कर लगभग पूरी अर्थव्यवस्था को ही अपने जाल में फंसाती हुई लगती है ।
आराम हराम है-दासता बढ़ाने का बना महा मंत्र
प्रबंधक वर्ग की दासता के अनगिनत किस्से रोज ही हम सब के सामने से गुजरते हैं जिसमें कर्मचारी (प्रबंधक) अपने को एक ऐसी कार्य परिस्थिति में फंसा हुआ पाता है जिसमें शोषण ही शोषण है लेकिन उससे निकलने का रास्ता नहीं दिखता है। इस चक्रव्यूह को बनाया है कॉर्पोरेट ने, जिसमें लाभ को उच्चतम स्तर तक बढ़ाना है काम के घंटे को या तो बढ़ा कर या वेतन को घटा कर। काम के घंटे को बढ़ाना आसान है उसके लिए, क्योंकि काम चाहने वालों की एक अंतहीन लाइन खड़ी है। प्रबंधक अपने पीछे खड़े इन बेशुमार बेरोजगार और बेजुबान इंसानों को देख कर खुद भी बेजुबान बन जाना श्रेयस्कर समझता है और रोज बारह से चौदह या सोलह घंटे भी बिना किसी दिन आराम के या छुट्टी के काम करता है। अवकाश जैसे उसके नसीब में होता ही नहीं। जैसे अवकाश शब्द खुद ही लम्बे अवकाश पर चला गया हो इस अभागे इंसान के लिए।
वह काम के दबाव में अपने को पूर्णतः थका हुआ, शक्तिहीन पाता है। अतः कॉर्पोरेट सेक्टर में कॉर्पोरेट ने एक ऐसी शोषणकारी काम की दशा का निर्माण किया है जिसमें कर्मचारी अपने को जैसे एक ऐसे जाल में फंसा हुआ और दबाव में पाता है जिसमें वह अपने वजूद को ही नकारा हुआ देखता है किन्तु कोल्हू के बैल की तरह अपने को काम में लगातार जुटा हुआ भी पाता है। जैसे उसका कोई महत्व नहीं है। और है कुछ उसके लिए, तो है बस काम ही काम ।
सुबह से रात तक काम के दबाव में कब परिवार और बच्चे छूटे और छूटे माँ-बाप, होश ही नहीं।बीमार होना जैसे मना हो और वर्क लाइफ बैलेंस (काम और आराम) की बात करना जैसे गुनाह बन गया हो। सुबह उठना, मेल देखना, दिशा निर्देशों को याद करना, कार्यालय के लिए भागना, मीटिंग में डांट खाना, मिले हुए काम को दिनभर लगलपट कर पूरा करना, पूरा किये काम को दिखाना और घर चलने की जैसे ही तैयारी हुई, नया काम दे दिया जाना इत्यादि उसके जीवन का एकमात्र कार्य व्यवसाय बन और बना दिया गया लगता है।
बॉस की हां में हां मिलाना, काम के बोझ तले जान तो दे देना किन्तु मुक्ति के लिए हाथ पैर भी न हिलाने का प्रयास करना, जैसे कॉर्पोरेट ने उसके भाग्य की लकीर में ही लिख दिया हो। जैसे रोज कोई युद्ध हो रहा हो उत्पादकता और लाभ को उच्चतम स्तर तक ले जाने के लिए। कॉर्पोरेट जोंक बन कर खून चूस रहा है अपने बेजुबान बना दिए गए इन कॉर्पोरेट कर्मियों का। एडीपी रिसर्च, 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 62 प्रतिशत कामगार नियमित रूप से ओवरटाइम करते हैं। डेलॉइट की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि 72 प्रतिशत पेशेवर कर्मचारी बर्न आउट अर्थात शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से थकान के शिकार पाए गए।
ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि वे 6 घंटे का समय नहीं निकाल पा रहे हैं सोने के लिए। वे समय नहीं निकाल पाए अपनी बेटी के नृत्य कार्यक्रम को देखने के लिए या अपनी पत्नी के साथ किसी प्रोग्राम में जाने या कुछ पल बिताने के लिए। उनको याद ही नहीं की कब उन्होंने छुट्टी ली थी काम से ।इतना करने के बाद भी वे घबड़ाये हुए हैं कि कंपनी उनके काम और उत्पादकता के बारे में क्या सोचती है। कल वे नौकरी में होंगे या नहीं, वे मुतमइन नहीं हो सकते हैं। उनका कोई तारणहार नहीं । ऐसी ही कहानी थी 26 वर्ष की अन्ना सेबेस्टियन पेराईल की जो कि एक पेशेवर प्रबंधक थी लेकिन काम के लगातार दबाव को झेल न सकी और दुनिया के पार चली गई । ऐसी ही सच्चाइयां रोज ही उजागर होती हैं और हम सब आँख मूंद लेते हैं ।
आँख तो वित्त मंत्री निर्मला सीता रमण ने भी लगता है मूंद लिया था जब उन्होंने इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि ये तो अभिभावकों का काम है कि वे अपने बच्चों को सिखायें, तालमेल कैसे बैठाया जाता है, कॉर्पोरेट सेक्टर में तनाव को कैसे झेला जाता है । तो ऐसा लगता है कि जैसे वे कह रही हों की कॉर्पोरेट कर्मियों को ज्यादा से ज्यादा घंटे काम करना आना चाहिए । उन्हें तालमेल बैठाना भी आना चाहिए । लेकिन कॉर्पोरेट ने पहले ही सिखा दिया है अपने कॉर्पोरेट प्रबंधकों को तालमेल बैठाने की कला, कि चुप रहिये और काम करिये या बाहर का रास्ता देखिये। वस्तुतः चुप रहिये और काम करिये की कला लाखों लाख कॉर्पोरेट प्रबंधकों ने सीख और अपना लिया है, रोजगार को बचाये रखने के लिए। अत्यधिक काम के घंटे करने से रोकने के लिए या शोषणकारी कार्य दशा से बचाव के लिए कोई कानूनी प्रावधान भी नहीं लगता है। अतः कॉर्पोरेट शोषण तो करेगा ही।
ग्लोबल और कॉर्पोरेट पूंजीवाद-रच बस गया है नसों में
लेकिन क्या कॉर्पोरेट ही एक मात्र जिम्मेदार है प्रबंधकों की बदहाली के पीछे के कारण का। शायद नहीं। वे अपनी नासूर बन गई जिंदगी के लिए स्वयं भी जिम्मेदार हैं। रातों-रात जिंदगी के सभी ऐशो आराम चाहिए उन्हें। क्या-क्या चाहिए? गाड़ी हो, फ्लैट हो, फ्रिज और टीवी हो और हो आई फ़ोन भी। वस्तुतः क्या नहीं चाहिए उनको जिंदगी की शुरुआती दिनों में ही? लेकिन खरीदेंगे कैसे? जेब में पैसा नहीं है तो क्या हुआ, लोन तो मिल ही रहा है, ले लेते हैं। देने वाले बेशुमार जो हैं। सोच तो यही बन गई है। तो ईएमआई का बोझ तो बढ़ेगा ही।जब तक रोजगार है कोई कष्ट नहीं। लेकिन रोजगार गया तो मज़ा भी गया।
आकंठ जो डूबे हैं लोन के दलदल में। नर्क की ही स्थिति होगी परिवार में। तो रोजगार बनाये रखना होगा किसी भी शर्त पर। काम के अपरिमित घंटे भी झेल कर। और यदि नहीं झेल पाए तो स्वर्ग का रास्ता तो है ही बचा। अपना लेंगे। लेकिन बड़े सयाने कह गए हैं और सरकार भी मानती है कि आत्महत्या करना अपराध है। लेकिन कैसे बचें इस अपराध से? क्या ऐशो आराम से रहने की किसी नौजवान प्रबंधक की तमन्ना जिसके लिए वह लोन लेता है इतना बड़ा अपराध है कि उसको अपनी इहलीला ही समाप्त करनी पड़ जाती है? क्या लाभ बढ़ाने की कॉर्पोरेट की अंतहीन इच्छा जिम्मेदार नहीं है?
क्या कॉर्पोरेट कल्चर विषाक्त होता नहीं दिखता जिसमें कर्मचारी से जानवर जैसा व्यवहार हो रहा हो। क्या हम सब गुनहगार नहीं हैं प्रबंधक वर्ग से हो रही नाइंसाफी के लिए? जरा सोचिये कि किसी प्रबंधक का पिता कितना खुश होता है यह बताते हुए कि उसका बेटा कमा रहा है लाखों लाख, अपने बुद्धि बल से। क्या कोई ससुर खुश नहीं होता यह कहते कि दामाद उच्च पदस्थ है और उसने कुछ ही समय में दुनिया की सभी सुख सुविधाएं जमा कर दी हैं अपनी योग्यता से, उसकी बेटी के लिए। लेकिन न तो पिता और न तो ससुर यह बता पाता है कि बहू या बेटी परेशान और नाखुश हैं, पति द्वारा उसको समय न दे पाने से। वे यह भी नहीं बता पाते कि बेटा या दामाद भी नाखुश और दुखी हैं अपनी दुःख भरी जिंदगी से कि वह समय नहीं दे पाता अपने परिवार को। वह क्लांत है, परेशान है और हो गया है बर्न आउट भी। सभी धोखे की टट्टी के शिकार हो रहे हैं।
कॉर्पोरेट और सरकार की बढ़ती जुगलबंदी
इस पूरी व्यवस्था में कोई खुश है तो वो हैं कॉर्पोरेट और सरकार। सरकार खुश है यह बताते हुए कि यदि वह और उसकी नीतियां न होतीं तो न बनता भारत विश्व गुरु, आईटी सेक्टर के बाजार में। यह कमाल हुआ सरकार की कॉर्पोरेट से तालमेल बैठाने की कला के कारण भी। कॉर्पोरेट की कला रही, सरकार पर दबाव बनाया जाए और विभिन्न छूट लिया जाए। सरकार का भी अभी हाल तक का यह तरीका रहा है कि कॉर्पोरेट के दबाव को झेला जाए।
सन 2014 के पश्चात सरकार ने नीतियां बदलीं हैं कॉर्पोरेट सेक्टर के तीव्र विकास के लिए। उसे अनेक रियायतों और सुविधाओं से नवाजा गया है। सन 2019 में कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30 प्रतिशत से घटा कर 22 प्रतिशत कर दिया गया। सरकार के राजस्व में इससे दो वित्तीय वर्षों (20 और 21) में रूपया 1.84 लाख करोड़ का भारी घाटा हो गया था। फिर सन 2019 के बाद से टैक्स में विभिन्न छूट देने की नीति अपनाने के कारण कम्पनियों को रुपया 3 लाख करोड़ की टैक्स बचत हुई।
यही नहीं, सन 2012-13 के पश्चात से कम्पनियों को सरकार द्वारा दिए गए विभिन्न छूटों से सरकार को रुपया आठ से नौ लाख करोड़ की राजस्व हानि हुई। सन 2019 में कॉरपोरेट टैक्स में भारी कमी की गई। इसलिए प्रत्यक्ष कर में कॉरपोरेट का भाग सन 2023-24 में 46.7 प्रतिशत रह गया जबकि सन 2018-19 में कॉरपोरेट टैक्स का भाग 58.3 प्रतिशत हुआ करता था । इसके विपरीत इनकम टैक्स का हिस्सा 41.7 प्रतिशत से बढ़ कर 53.3 प्रतिशत हो गया । इसीलिए तो आम जनता टैक्स की मार से कराह उठी है ।कमर ही टूट गई लगती है उसकी । लेकिन कॉर्पोरेट का दिल बाग बाग हो गया है । ऐसा क्यों ? टैक्स की दर कम होने और विभिन्न छूट मिलने से कॉरपोरेट सेक्टर की लाभदायकता उच्च स्तर पर पहुंच गई बताते हैं।
मार्च सन 2024 में इनका लाभ पिछले 15 साल में सर्वाधिक रहा। श्री अनन्थ नागेश्वरन (सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार) ने बताया है कि कॉरपोरेट सेक्टर की लाभदायकता जो वित्तीय वर्ष 20 में 5.3 लाख करोड़ थी वह वित्तीय वर्ष 23 में बढ़ कर 20.6 लाख करोड़ हो गई थी। कॉर्पोरेट सेक्टर भी यही चाहता था कि छूट मिले और लाभ भी बेतहाशा बढ़े। ऊपर से प्रबंधकों के ऊपर उनका प्रभाव भी बढ़े। तो कॉर्पोरेट सेक्टर को बढ़ावा देने की नीति से लाभ क्या हुआ? न निवेश बढ़ा, न रोजगार, न वेतन और न सरकार का राजस्व। फिर भी सरकार और कॉर्पोरेट की जुगलबंदी बढ़ी है इस काल में और उससे आम आदमी और आम कर्मचारियों (प्रबंधकों) की जान पर बन आई है, किन्तु उनकी बला से। ऊपर से उपदेश भी सुनिए। कैसा उपदेश? कि कॉर्पोरेट कर्मी और आम कामगारों में स्किल (कौशल) का अभाव है।
कोई इनसे पूछे की यदि ऐसा ही अभाव है, जैसा वे बताते हैं तो भारत विश्व बाजार का कैसे एक बड़ा खिलाड़ी बन गया है आज? ऊपर से देशभक्ति का ज्ञान भी सुनिए इनसे। प्रबंधकों, कामगारों और आम आदमी का खून चूस रहे हैं और राष्ट्र भक्ति का गीत भी सुना रहे हैं। आप ने सुना था न नारायण मूर्ति को, जिन्होंने कहा था की नौजवानों को सोचना होगा कि वे माने कि यह देश उनका है (जैसे नौजवान ऐसा नहीं मानता) और उसके लिए उन्हें सत्तर घंटे कार्य करना होगा। लार्सन एंड टूब्रो के चेयरमैन और एमडी एस. एन सुब्रह्मण्यम तो काम के 90 घंटे होने चाहिए, की बात करते हैं ।
इस अमूल्य ज्ञान देने के लिए (जिससे काम के घंटे बढ़ सके और कॉर्पोरेट और शोषण कर सके) उनका पारिश्रमिक वित्तीय वर्ष 2025 में कितना निर्धारित हुआ बताते हैं, रूपया 76.25 करोड़ मात्र । किन्तु हमको आपको को क्या मिला? देशभक्ति का उपदेश, इनकम टैक्स की मार और प्रबंधकों को मिला- बारह से सोलह घंटे का काम अर्थात कॉर्पोरेट स्लेवरी (दासता)।
(लेखक विमल शंकर सिंह डीएवीपीजी कॉलेज, वाराणसी के अर्थशास्त्र विभाग में पूर्व प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे हैं।)